Heavy duty was collected on the name of books and other activities in private school

निजी स्कूल हुए बेलगाम, फीस बढ़ोतरी समेत किताबों व अन्य गतिविधियों के नाम पर वसूल रहे भारी दाम

Published Date-03-Apr-2017 07:58:02 PM,Updated Date-03-Apr-2017, Written by- Priyank Sharma

अजमेर। निजी स्कूलों की मनमानी सरकार की बेरुखी की से परवान चढ़ी हुई है। हालात यह है कि सरकार को होश नहीं है और बेलगाम हुए निजी स्कूल शिक्षा को न केवल व्यवसाय बनाए हुए हैं, बल्कि मोटा मुनाफ़ा कमाने के लिए सरकार के नियम—कायदों को भी पैरो तले रौंदने से गुरेज नहीं कर रहे हैं। गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा के नाम पर फीस, किताबों और अन्य गतिविधियों के नाम पर खुली लूट मची हुई है।


यूपीए सरकार ने गरीब के बच्चे को बेहतर स्कूल में शिक्षा मिले, इसलिए आरटीई कानून बनाया। गरीब बच्चों को कुछ साल बेहतर स्कूलों में पढ़ने का मौका भी मिला, मगर इस बीच सरकार ने आरटीई कानून के तहत बच्चों की फीस स्कूल को नहीं दी तो गरीबों के बच्चों को फीस नहीं चुका पाने पर जिल्लत झेलनी पड़ी। ऐसे कई मामले कोर्ट में भी गए। खैर, बात करें आरटीई से बाहर यानी माध्यम परिवारों की तो निजी स्कूलों के सबसे ज्यादा शोषण के शिकार यही लोग हैं।


गरीब के लिए आरटीई और अमीर फीस की कोई टेंशन नहीं तो फिर टेंशन में जो है, आज उनकी बात की जाए। बच्चों को बेहतर शिक्षा मिले, यह हर मां बाप का ख्वाब होता है। लिहाजा, बच्चों के लिए अपनी ख्वाइशों का दम घौंटकर भी लोग उन्हें अच्छी स्कूलो में दाखिला दिलवाते हैं। लोगों की इस सोच और मजबूर का फायदा निजी स्कूल काफी अच्छी तरीके से उठाते हैं।


अजमेर की बात करें तो 2300 से 3000 रुपए तक प्राइमरी में पढ़ने वाले बच्चे की औसतन फीस है। इसके अलावा वैन, स्कूल बस 800 रुपए, किताबें साढ़े तीन हजार और अन्य गतिविधियों के नाम पर वसूली अलग है। यानी सरकार का कोई अंकुश ऐसे स्कूलों में नहीं है। क्यों शहर के जनप्रतिनिधि और सरकार में राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त जनप्रतिनिधि खुद ऐसी निजी स्कूलो के वार्षिक समारोह में शिरकत करते हैं। ऐसे में आमजन अपना दुखड़ा किसको सुनाए।


देश में एक समान फीस का कोई प्रवधान नहीं है। निजी स्कूल अभिभावको की मजबूरी को भांपकर अपने अनुसार स्कूल फीस का पैकेज फिक्स करती है और जमकर मुनाफा बटौरती है। अब जरा इस निजी स्कूल की सच्चाई भी देखें। स्कूल में बच्चों को किताबें नहीं मिल रही है। यह महज दिखवा है। स्कूल से महज चंद कदमों की दूरी पर एक पुराने बंगले में स्कूल ने लोकल पब्लिशर से कमीशन तय करके अभिभावकों के लिए किताबें खरीदने की व्यवस्था की है। 10 वर्ष पहले चार कमरों से शुरू हुई इस स्कूल की चार बड़ी इमारतें शहर में है, जिनमें एक स्कूल में लगभग 2 से तीन हजार बच्चे अध्यन करते हैं। 10 साल में स्कूल प्रबंधन को अलादीन का चिराग मिल गया कि रुपए की आवक थम ही नहीं रही।


खैर, रुपए कैसे बरस रहे हैं यह आप भी देख रहे हैं, मगर जिनको वोट और भरोसा देकर सरकार में भेजा, उन्हें यह सब दिखाई नहीं देता। सीबीएसई और एनसीआरटी बस सर्कुलर जारी करते हैं, मगर निजी स्कूलों पर नकेल कसने की हिम्मत किसी सरकार ने नहीं दिखाई। रही बात ऊंचे दामों पर बिक रही शिक्षा और पुस्तकों पर अंकुश लगना तो छोड़िये, फीस भरने और महंगी किताबें खरीदने वाले मजबूर अभिभावकों को नियमों तक की जानकारी नहीं है।


हर बार की तरह सीबीएसई निजी स्कूलों में एनसीआरटी की पुस्तकों को ही बच्चों को पढ़ाने के लिए सर्कुलर जारी करती है, मगर अफ़सोस की इस सर्कुलर की पालना नहीं होती। निजी स्कूलों की यूनियन के पदाधिकारियों की मानें तो एनसीआरटी की किताबों से बच्चों को उतना ज्ञान बच्चों को नहीं मिल पाता। इसलिए बाहरी पब्लिशर्स की किताबों को निजी स्कूलों में पढ़ाया जा रहा है। एनसीआरटी पाठ्यक्रम का स्तर सुधारें और सरकार सख्ती से लागू करवाएं।


निजी स्कुलों की मनमानी, खुली लूट और अभिभावकों की मजबूरी पर सरकार वर्षों से कभी गंभीर नहीं रही। वर्तमान सरकार का भी शिक्षा के भारी व्यवसायीकरण पर किसी तरह के अंकुश लगाने का बयान अभी तक नहीं है। जाहिर है ऐसे में अभिभावकों को अपनी मजबूरी की भारी भरकम कीमत चुकानी ही पड़ रही है।

 

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