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दर्द...! भाग 2

दर्द...! भाग 2

28-Dec-2016, Written by- Anurag Sharma
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अनुराग शर्मा 'रूद्र'. बस, कार, बाइक और लोगों के चीखने चिल्लाने के बीच राहुल की धीमी सी तड़प भरी आवाज किसी तक नहीं पहूं च रही है। वो कहना चाहता है पर आपा-धापी में किसी का इस ओर ध्यान ही नहीं जा रहा है। उसके होंठ जैसे किसी को पुकार रहे हों, शायद किसी को पुकारना चाह रहा है वो। अरे! कोई तो सुन लो, अरे...कोई तो एक बार देखो की वह क्या कहना चाहता है। अरे...कोई सुन क्यों नहीं रहा।


अनुराग शर्मा 'रूद्र'.

बस, कार, बाइक और लोगों के चीखने चिल्लाने के बीच राहुल की धीमी सी तड़प भरी आवाज किसी तक नहीं पहूं च रही है। वो कहना चाहता है पर आपा-धापी में किसी का इस ओर ध्यान ही नहीं जा रहा है। उसके होंठ जैसे किसी को पुकार रहे हों, शायद किसी को पुकारना चाह रहा है वो। अरे! कोई तो सुन लो, अरे...कोई तो एक बार देखो की वह क्या कहना चाहता है। अरे...कोई सुन क्यों नहीं रहा।

 

"छपाक "
पानी की आवाज ओर गीलेपन ने मेरी नींद को तोड़ दिया, घबराहट और चिंता ने जो मेरे माथे पे पसीना बहाया था, वो भी पानी ने अपने अंदर छुपा लिया था। अरे! भाई अब क्या बैठे बैठे भी सोएगा। उठ जा अब तो, क्या हो गया तुझे, जब से घर से आया है नींदों में बड़बड़ाता रहता है। बिलकुल पगला गया है, हुआ क्या है तुझे। बोलेगा, बताएगा कुछ या एक ओर पानी के जग की जरुरत है तुझे। इकबाल की दोस्ताना भरी धमकी ने अब सपनों की दुनिया से लौट आने का इशारा कर दिया।

 

पर क्या करूं जब से बस स्टैंड पे राहुल से मुलाकात हुई है, ना तो चैन से खा पा रहा हूं  और ना ही सो पा रहा हूं । उस दिन के बाद हर पल हर घडी उसी का चेहरा और उसकी बातें दिलो दिमाग में घूम रही है। वो मिला क्यूं था मुझसे, आखिर कहना क्या चाहता था मुझसे। क्या उसका प्यार में असफल होने पे आत्महत्या को ही आखरी रास्ता मानना सही कदम था।

 

इन तमाम सवालों के जाल में उलझा हुआ था कि एक जोरदार लात ने सपनों से मुझे सीधे असलियत कि धरातल पे ला दिया। और ये लात किसी और कि नहीं मेरे रूम पॉर्टर इकबाल की थी। आंखों कि त्यौरी चढ़ा के इकबाल ने झल्लाते हुए कहा इतना बहुत है की और चाहिए। मैंने भी जमीन पे बैठे बैठे उठने के लिए हाथ उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा, 'नहीं बाबा तेरी इस मदद का ही बहुत बहुत शुक्रिया। अब और अहसान मत कर।' 'क्यों ना करू?' व्यंग्य में इकबाल ने कहा। 'तेरा ध्यान है कहां आज कल, किन ख्यालों में डूबा रहता है, कहीं किसी लड़की का चक्कर तो नहीं। कहीं प्यार तो नहीं हो गया किसी से।' उसका ये बोलना ही था कि मेरा दिल घबराने लगा और लडखड़ाती जुबान से बोला 'नहीं रे! तू तो जानता है मेरा इश्क़ और मोहब्बत जैसी चीजों से दूर दूर तक कोई ताल्लुक नहीं है। मैं ठहरा अखड़ और स्पष्टवादी। हम जैसे लोगों को तेरे जैसे मुस्टंडें ही दोस्तों के रूप में मिलते हैं। कोई महिला मित्र हमारी किस्मत में कहां।' बात बीच में ही काटते हुए इकबाल बोला 'अच्छा-अच्छा मेरे भोले भाले इंसान जल्दी तैयार हो जा ऑफिस का टाइम हो गया है और तेरा बॉस.....बॉस है जिसे केवल काम से मतलब है तेरे ख्वाबों से नहीं।

 

जैसे तैसे घर से बाहर रह रहे लोगों की तैयार होने कि प्रक्रिया निपटा के ऑफिस कि ओर निकल गया। पर ना जाने क्यूं रास्ते भर राहुल की बातें और चेहरा मेरी आंखों के आगे से जा ही नहीं रहा था। ऑफिस पंहुचा, पूरा दिन काम किया। पर बस स्टैंड की मुलाकात मेरे दिमाग पे इतनी हावी थी कि मैंने शाम को ऑफिस से घर जाने के बजाए राहुल के गांव कि ओर जाना तय किया और निकल पड़ा।

 

3 घंटे की कमर तोड़ सरकारी बस के सफर से परेशान हो कर जैसे ही मैंने गांव की घरती पे कदम रखा ......अंदर से कुछ हलचल हुई। ऐसा लगा जैसे मैं अकेला नहीं हु या तो कोई मेरे पीछे है या मेरे आस पास, बस मुझे दिख नहीं रहा। जैसे कोई मेरा पीछा कर रहा हो, हर कदम हर पल मेरे साथ कोई कदम से कदम मिला रहा हो। पर मैंने भी जैसे तैसे राहुल के घर कि ओर रुख किया।

 

जैसे जैसे मेरे कदम राहुल के घर की ओर बढ़ते जा रहे थे, वैसे वैसे मेरे सपनों के काल्पनिक दृश्य, वास्तविक दृश्यों में तब्दील होते जा रहे थे। ऐसा लगा जैसे इस रास्ते के हर एक मोड़, मिटटी, हवा सब चीजों से मेरा कोई पुराना नाता है। जैसे ये सभी चीजें मेरी जिंदगी में बहुत पहले से हैं। सपनों के भंवर में उलझा हुआ ही था कि लम्बी लम्बी मूछों वाले हट्टे कट्टे एक ग्रामीण कि आवाज आई।

 

'गांव में नए हो क्या? कहां इधर उधर आंखें घूमा रहे हो। किसी को खोज रहे हो क्या। बेमन से मैंने भी गर्दन हिला के कह दिया 'राहुल के घर जा रहा हूं , शहर से आया हूं ।' चौंकने के भाव चेहरे पे ले कर ग्रामीण ने खट ही पूछ लिया। 'अच्छा! वो वाला जिसने बस स्टैंड पे जहर खाके आत्महत्या कर ली थी। आगे से उल्टे हाथ पे चौथा मकान है उसका। दोस्त हो क्या उसके, कांहे मर खप गया वो प्यार मोहब्बत में।'

 

गुस्सा तो बहुत आया पर ना जाने क्या सोच के चुपचाप वहां से राहुल के घर की ओर हो लिया। जैसे ही राहुल के घर के सामने पहूं च के गेट खटखटाया। एक मीठी और दबी हुई आवाज आई 'कौन है बाहर?' धीरे धीरे आवाज एक दुखी और थका हुआ चेहरा लेकर सामने आई। वो एक महिला थी जिसने बहुत ही साधारण कपड़े पहन रखे थे। उन्हें देख ना जाने क्यूं आवाज ही नहीं निकल रही थी। पर हिम्मत कर के बोला 'मां मैं राहुल का........' वाक्य पूरा कर पता उससे पहले ही बोली 'अच्छा तो राहुल के दोस्त हो.... बताओ कैसे आना हुआ।' फिर खुद ही कुछ सोचते हुई बोली 'अच्छा पहले अंदर तो आ जाओ।' मैं भी अंदर चला गया। बैठा ही था कि उन्होंने हाथ में पानी का गिलास पकड़ाते हुए कहा 'हां! अब बोलो कैसे आना हुआ।' समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे क्या शुरआत करूं? क्या कहूं ? क्या पूछूं? पर अचानक ही महसूस हुआ कि हवा के झोंके ने मेरे कंधे पे जैसे हाथ रखकर मुझे बोलने की हिम्मत दी हो। जैसे तैसे मैंने हिम्मत कर के पूछा 'मां! अख़बार में खबर पड़ी कि राहुल ने खुदखुशी कर ली। क्यों? आपसे कोई बात हुई थी क्या उससे, इस कदम से पहले।' इतना सुनते ही गीली आंखों और भर्राई आवाज के साथ उन्होंने कहा 'बेटा! मैं भी इन सवालों के जवाब आज भी खोज और पूछ रही हूं  कि ऐसा क्या हुआ कि एक बेटे को पल भर के लिए भी अपनी बूढ़ी मां का ख्याल नहीं आया। वह वो प्यार भूल गया जो उसके पैदा होने से लेकर अब तक मैं उससे करती हूं  और आखरी श्वांस तक करती रहूंगी। तुम्हें पता है जब राहुल छोटा था तो बहुत ही शांत और मासूम बच्चा था। ज्यादा किसी से कुछ बोलता नहीं था, डरता था कि कहीं कोई उसे नुकसान न पहूं चा दे। डर और सहम के मारे मुझसे आके लिपट जाता था। कोई भी परेशानी होती थी मुझे हर बात बताता था कि मैं उसकी मदद करुंगी और करती भी क्यूं नहीं आखिर मेरा ही तो हिस्सा था वो। जन्म के समय केवल उसका शरीर मेरे से अलग हुआ था ना कि वो। वो हमेशा ही मेरे अंदर मेरी श्वांसों कि तरह रहता था। उसको तकलीफ का मतलब था कि मुझे ही दर्द। पर शायद उसके लिए ये सब किसी मलतब का नहीं था। उसे तो केवल वह लड़की और उसका प्यार चाहिए था।......पर ......' बोलते बोलते रोने से आवाज पूरी तरह से बंद हो गई थी। मैंने थोड़ा ढांढस बंधाते हुए कहा कि 'अब क्या कर सकते हैं मां! जो होना था वो तो हो गया।' माँ ने सुबुकते हुए बोला कि 'पर अगर एक बार वो ये कदम उठाने से पहले मुझ से बात कर लेता तो शायद मेरा लाल जिन्दा होता और उसके प्यार के लिए मैं पूरे समाज और दुनिया से लड़ जाती। पर क्या करूं ये 'पर' और 'काश' शब्द ऐसे हैं जो केवल तकलीफ और दर्द के अलावा कुछ नहीं देते। ये ऐसा दर्द है जिसका इलाज़ किसी नीम हकीम के पास नहीं है। शायद मां हूं  ना इसलिए केवल मुझे ही उससे प्यार था, उसे मुझसे प्यार नहीं था। उसके कदम से नफरत है मुझे ऐसा काम मेरा बेटा कर ही नहीं सकता वो बेटा था ही नहीं मेरा। कोई और था वो, खैर छोड़ो! अब क्या हो सकता है।'

 

'ओह! मैं तो भूल ही गई, तूने भी बातों में लगा लिया, दूर से आया है तुझे भूख लगी होगी। तुझे खाने को तो पूछा ही नहीं। तू ठहर तेरे लिए कुछ खाने को लाती हूं।' ये कह के वो रसोई की ओर चली गई। बैठे बैठे मेरी आंखें ना जाने क्या ढूंढ रही थी। ...........शायद समय काट रही थी कि अचानक सामने के कमरे से कुछ गिरने कि आवाज आई। उत्सुकतावश न चाहते हुए भी मैं उस कमरे की ओर चला गया। कमरे का दरवाजा खोल के देखा तो सामने आलमारी के पास एक डायरी गिरी हुई थी। आस पास एक नजर घुमाकर जैसे ही मैंने डायरी उठाई। पीठ पे हाथ के अहसास ने मुझे चौंका दिया। देखा तो पीछे मां खड़ी थी। वो बोली 'ये राहुल का कमरा है। उसकी मौत की खबर के बाद से ये कमरा ऐसे ही बंद है। मैंने भी खुद को संभालते हुए कहा कि ये डायरी यहां गिरी हुई है, शायद राहुल की है। क्या मैं इसे पढ़ सकता हूं ? या आपने इसे पढ़ा?' 'नहीं!' आश्चर्य के साथ उन्होंने कहा। आओ, तुम ही पढ़ दो क्या लिखा है क्योंकि इन बूढी आंखों से अब पढ़ना नहीं हो पाता।

 

बाहर आके मां के लाए खाने को खत्म कर के जैसी थी डायरी को खोला तो पहले ही पन्ने पे लिखा था। ''एक सच्चाई मां के नाम'' पन्ना पलट के मैंने पढ़ना शुरू किया....... 'मां शायद यही शब्द थे जो पैदा होने के बाद मैंने पहली बार पुकारे होंगे। मां ही थी जिसने मुझे लाड और प्यार से पाला। अपने से ज्यादा प्यार किया, सब दर्द सहते हुए भी मझे मुस्कुराने कि वजह देती रही। मां मैं आपसे बहुत प्यार करता हूं , चाहे में जहां रहूं या ना रहूं पर एक बात जो हमेशा सच रहेगी वो ये कि आपका बेटा आपसे उतना ही प्यार करता है जितना इंसान अपने आपसे। मैं चाहे जो करूं, मुझे यकीन है आप मुझपे हमेशा भरोसा करेंगी और अपने बेटे के हर कदम को समझेंगी। मां आज मैं आया ही आपसे एक बात करने हूं । कुछ कहना चाहता हूं  आपसे, पर पापा और ना जाने किस डर से कह नहीं पा रहा। इस लिए इस डायरी में लिख रहा हूं । मां मैं एक लड़की से प्यार करता हूं  और उसके साथ ही अपनी जिंदगी बिताना चाहता हूं। वो लड़की मेरे शहर के मकान मालिक कि बेटी है। शुरू शुरू में मैं उन्हें मामा और मामी कहता था पर ना जाने कब मुझे उनकी बेटी से प्यार हो गया और उसे मुझसे। बहुत ही अच्छी लड़की है वो बिल्कुल आप ही की नक़ल है वो। जब भी उसे देखता हूं आपका चेहरा याद आ जाता है। पर अब ना जाने क्यूं डर लगा रहा है। वो तो मुंह बोले रिश्ते से मेरी बहन हुई, ये कैसा पाप कर दिया मैंने। अपनी ही बहन से प्यार कर बैठा हूं मैं। किस तरह का इंसान हूं मैं। रिश्तों का दायरा कैसे भूल गया मैं। कैसे? कैसे? अंदर ही अंदर घुट रहा हूं मैं मां। मां मुझे संभाल ले बहुत दर्द हो रहा है। लिखते हूए भी बहुत कांप रहा हूं। मां मुझे संभाल ले तेरा बेटा बुरा नहीं है, उस से गलती हो गई है मुझे बचा ले। पर उस लड़की को भी नहीं भूल पा रहा हूं मैं, क्या करूं मां। बहुत तड़प और दर्द हो रहा है मां, कुछ तो बोल......'

 

पढ़ते पढ़ते पता नहीं चला कि कब आखिरी पन्ना आ गया, आखिर में लिखा था '..तेरे बेटे ने एक फैसला लिया है शायद तुझे उससे बहुत दुःख हो पर मुझसे नफरत मत करना। हमेशा याद रखना तेरा बेटा तुझे हमेशा ऐसे ही प्यार करेगा, मरने के बाद भी।'

 

ये सब पढ़ के जैसे ही मैंने डायरी बंद करके मां के हाथों में दी। मां के दिल का दर्द आंसू और रोने में बाहर आने लगा, मां तो डायरी को अपने सीने से लगा के रोए जा रही थी। शायद उसके सवालों के जवाब आंसुओं के जरिए बाहर आ रहे थे। मैं भी भीगी आंखों से वापस जाने के लिए मुड़ गया, तब मां कि पीछे से आवाज आई। सदा खुश रहना मेरे बेटे। मैं भी प्रणाम कर के वहां से निकल आया।

 

आते हुए रास्ते में ये ही सोचता रहा कि मैं आखिर क्यूं यहां तक आ गया। मेरा तो कोई रिश्ता ही नहीं था राहुल से। आखिर मैं ही क्यूं? पर शायद मेरे आने से एक मां को उसके जवाब और एक बेटे को अपनी अंतिम अनुभूति आपस में सांझा करने का मौका मिल गया। ये सब सोच ही रहा था कि अचानक ही ऐसा लगा कि कोई मेरे कान के पास धीमे से शुक्रिया कह गया है। इधर उधर देखा पर कोई नहीं था शायद मेरा मन का वहम था। खैर! मैं भी वापस घर की ओर निकल पड़ा इस सोच के साथ कि शायद राहुल अपने मन कि बात डायरी की बजाए मां को बोल पाता तो.....जिंदगी कुछ और ही होती। तब जिंदगी में ये दर्द न होता।

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