तो क्या तेज बहादुर ने अपनी पीड़ा जाहिर कर गलत किया?

तो क्या तेज बहादुर ने अपनी पीड़ा जाहिर कर गलत किया?

12-Jan-2017, Written by- Ashwani Pareek
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हाल ही में भारतीय थल सेना बीएसएफ के एक जवान तेज बहादुर यादव द्वारा सोशल साइटस पर डाले गए वीडियो को लेकर देशभर में कई तरह की बातें सामने है ​रही है। इन वीडियो को लेकर कोई तेज बहादुर की पीड़ा में उसका समर्थन कर रहा है, तो कोई उसके ऐसा करने को अनुशासनहीनता बता रहा है।


हाल ही में भारतीय थल सेना बीएसएफ के एक जवान तेज बहादुर यादव द्वारा सोशल साइटस पर डाले गए वीडियो को लेकर देशभर में कई तरह की बातें सामने है ​रही है। इन वीडियो को लेकर कोई तेज बहादुर की पीड़ा में उसका समर्थन कर रहा है, तो कोई उसके ऐसा करने को अनुशासनहीनता बता रहा है। हालांकि इन परिस्थितियों में क्या कहा जाना चाहिए, इसके बारे में शायद ही कोई सही और सार्थक बात कह पाए। लेकिन इतना जरूर है कि तेज बहादुर के इन वीडियो ने जिम्मेदार लोगों को इस ओर सोचने के लिए जरूर मजबूर कर दिया है। ऐसे में जब देशभर में कई तरह की बातें हो रही है और तेज बहादुर ने जब वीडियो को पोस्ट ही सोशल साइट्स पर किया है तो फिर भला सोशल मीडिया इन वीडियो पर आने वाली टिप्पणियों से अछूता कैसे रह सकता है। वाट्सऐप, यू—ट्यूब और फेसबुक पर भी इन वीडियो को लेकर कई प्रकार की टिप्पणियां की जा रही है।


इसी बीच आज की शाम फेसबुक पर अपने लिखे एक कमेंट पर वरिष्ठ साथी प्रशांत पाण्डे जी और मित्र अनुज जी की फेसबुक वॉल पर उनके मन की बात को पढ़ा। दोनों ने सीमा सुरक्षा बल के एक जवान की खराब खाने की शिकायत को जायज नहीं बताया। प्रशांत जी बता रहे थे कि सेना और अर्दसैनिक बलों का काम स्वैच्छिक है, ऐसे में सबको इस बात का इल्म होना चाहिए कि मुश्किल हालात में काम करना ही सैनिक और सेना का काम होना चाहिए। अनुज जी ने लिखा कि एनसीसी के स्तर तक खाने की गुणवत्ता में खराबी को हम देख सकते हैं। दोनों की बातों का मतलब था कि ऐसा होता आया है, क्या नया है और जिस जगह का चुनाव किया गया, वहां ऐसा होना लाजिमी है। कोई ऐतराज हो तो मंच सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए, इसके लिये सिस्टम है। शायद इन हाउस फोरम भी होगा, पर मैं सोच रहा था कि अगर ये क्वालिटी और खाने की गुणवत्ता में शायद एक महीने से ही गिरावट आई है और रोजाना की शिकायत का समाधान नहीं है, तो बात कहां पर रखी जाएगी...?


मैं सेना से जुड़ा नहीं हूं, पर आस-पास में ऐसे कई लोगों और किस्सों को मैने देखा-सुना है, जिन्होंने सेना की कैंटीन में मिलने वाले रियायती सामान को गलत तरीके से भोगा है, जिसके घर में अगर सेना से जुड़ा अफसर है, तो पूछिए ही मत। रिश्तेदार से लेकर आस-पड़ौसी को रियायती दर पर मिलने वाले तेल-साबुन और ब्रान्डेड सामान के साथ-साथ न जाने क्या कुछ नहीं मिलता। बीते दो-तीन साल में यहां व्यवस्था बदली, कार्ड्स पर लिमिट तय की गई, नई शर्ते बनाई गई, पर गैरसैनिक आज भी दोस्ती-यारी में ऐसी सुविधाओं का पूरा लुत्फ उठा लेते हैं। खैर मैं मुद्दे पर आता हूं... क्या सेना में गुणवत्ता का खाना मिलता है और नहीं मिलता है, तो क्या किसी सैनिक को शिकायत करनी चाहिए? मेरे नजरिये से अगर सिस्टम से बात नहीं बन रही है, तो फिर सिस्टम की खामी को उजागर किया जाना चाहिए। कब तक अफसरशाही की चंद जोक भ्रष्टाचार रूपी वायरस से हमारी सेना को खोखला करती रहेगी। अगर बोफोर्स कांड गलत था, तो सेना में खाना घोटाला भी गलत है। 


इतिहास गवाह है कि भूखे पेट या आधी भूख के साथ जंग लड़ी जा सकती है, मगर जीतना मुश्किल है। हथियार में घोटाला अगर घोटाला है, तो फिर सेना के खाने पर डाका इससे कहीं ज्यादा बड़ा अपराध है और ऐसे में सिस्टम से दगाबाजी करने वालों पर एक्शन लेना चाहिए। सेना ऑटोनोमस बॉडी हो सकती है, पर क्या इसके आंतरिक प्रशासन में होने वाले करप्शन को नहीं रोका जाना चाहिए। अगर किसी राष्ट्र में भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग हो रही है, तो क्या इस जंग में सेना को करप्शन फ्री नहीं बनाया जाये। आप ही बतायें अगर आपको कोई दफ्तर नौकरी पर दो वक्त के खाने के साथ जॉब ऑफर कर रहा है, वहीं दफ्तर तीन दिन से आपको हल्दी वाली दाल और जली हुई आधी कच्ची रोटी खिलाये, तो आप उसके खिलाफ आवाज उठाएंगे या नहीं। मैं सच में हैरत में हूं, सच्चाई के उन पक्षधर लोगों के, जो मानते हैं कि सेना के आंतरिक सिस्टम में सालों से खाने की आड़ में घोटाले हो रहे हैं। देश के लिये जान देने वाले सैनिक के हक का राशन बाहर बेचकर बड़े शहरों में अफसरशाही के बंगले बन रहे हैं, पर इसके खिलाफ आवाज देश के खिलाफ आवाज है। समझ से परे है। 


राष्ट्र और सेना सबके लिये सम्मानीय है, तो क्या सम्मान सिर्फ नाम के लिये, मकान की ईंट से सरोकार रखे बिना क्या मकान मजबूत बनाया जा सकता है, कई दिन हो गये थे। भोपू को लगा कि ऊंची आवाज शायद पसंद नहीं आती है, आज लग रहा है कि ऊंचा बोले बिना कोई सुन नहीं सकता है। मैं फिर कहूंगा अगर तेज बहादुर की जगह मैं होता, तो मेरी पहली शिकायत मैस में, दूसरी शिकायत कंपनी के अफसर से, तीसरी शिकायत किसी आलाधिकारी से होती। अगर रास्ता नहीं निकलता, तो फिर सैनिक को सिखाया जाता है कि अधिकार के लिये जंग करनी चाहिए। महाभारत ने सिखाया है कि अधर्म के खिलाफ लड़ा जाना चाहिए। रामायण ने सिखाया है कि धर्म की रक्षा करनी चाहिए। अगर भ्रष्टाचार मेरे राष्ट्र रूपी धर्म को खत्म करेगा, तो मेरी जंग वहां भी होगी। उम्मीद करता हूं कि कोई भी बयानबाजी से पहले सेना के खाना घोटाले में दोषी अफसरों का कोर्टमार्शल करेंगे, ना की ये पैरवी करेंगे कि BSF के एक जवान को प्लंबर बनाकर बाकी लोगों की आवाज दफन कर दें, क्योकि चोरी छोटी है या बड़ी, चोरी ही होती है।


— अश्विनी पारीक
लेखक वरिष्ठ समाचार प्रस्तोता है।

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