प्रवासी परिंदों ने डीडवाना में जमाया डेरा

Published Date 2017/01/07 13:11, Written by- FirstIndia Correspondent

डीडवाना\नागौर। सुदूर स्थित ठंडे देश साईबेरिया से उडक़र हजारों मीलों का सफर तय कर भारत आने वाले प्रवासी पक्षी फ्लेमिंगों कई दशकों से डीडवाना में अपना डेरा बनाने लगे हैं। इन परिंदों की परवाज डीडवाना की नई पहचान बनती जा रही है। इन पक्षियों को डीडवाना शहर की आबोहवा इतनी रास आने लगी है कि बीते कुछ दशकों से यह पक्षी डीडवाना में नियमित पड़ाव डालने लगे हैं। 

 

संगमरमर सा सफेद बदन, लम्बी गर्दन, लम्बी टांगे, सुर्ख लाल रंगों से सराबोर पंख और नुकीली लाल चोंच। कुछ ऐसी ही खूबसूरती है हमारे मेहमान बनकर हर साल आने वाले प्रवासी परिंदे फ्लेमिंगों की। यह परिंदे हमारे मुल्क के नहीं है, लेकिन जब ‘पावणे’ बनकर जब यह पंछी यहां आते हैं तो इसी वतन के होकर रह जाते हैं। अपने लाल पंखों को फडफ़ड़ाते हुए यह परिंदे जब डीडवाना के आसमान में ‘परवाज’ भरते है तो लगता है जैसे कोई अपना ही नीले आसमान की बेपनाह ऊंचाईयों में उड़ान भर रहा हो। 

 

फ्लेमिंगों मूल रूप से साईबेरिया, उत्तरी अमरिका, दक्षिणी अमरिका, यूरोप व एशिया व अफ्रीका के ठंडे क्षेत्रों के मूल निवासी होते हैं। लेकिन सर्दी का मौसम शुरू होते ही यह अपने वतन को छोडक़र डीडवाना शहर के आस-पास हजारों की तादाद में पहुंच गए हैं। हजारों फ्लेमिंगों का यहां कलरव, विचरण और परवाज लोगों को आकर्षित कर रहा है। 

 

इनके यहां आने का सबसे बड़ा कारण मौसम की अनुकूलता है। डीडवाना शहर का मौसम इन पक्षियों के लिए पूरी तरह अनुकूल है। साईबेरिया जैसे देशों में सर्दी के मौसम में कड़ाके की ठंड में जब झीलें जम जाती है, तब यह पक्षी उष्ण इलाकों यानि नम भूमि (वैडलैंड) की ओर रुख कर लेते हैं। डीडवाना की वैडलैंड भूमि, यहां का मौसम और तापक्रम इन पक्षियों के अनुकूल होने से वे यहां डेरा डालते हैं। इसके अलावा पर्याप्त मात्रा में भोजन की उपलब्धता, प्रवासन और सुरक्षा भी उनके यहां लम्बे समय तक रूकने की बड़ी वजह है।

 

इन पक्षियों ने अपना डेरा सिंगी तालाब के समीप झील, मेला मैदान, नमक झील क्षैत्र, रामसाबास रोड आदि क्षैत्रों में डाला है। इससे डीडवाना की झील और सिंगी सरोवर की रौनक लौट आई है। ग्लोबल वार्मिंग से दुनियाभर में हो रहे जलवायु परिवर्तन भी इन पक्षियों के यहां आने की एक बड़ी वजह है। उनका यहां रहवास निश्चित समयावधि के लिए ही होता है। 

 

लेकिन पिछले करीब 5-6 सालों में यहां उनकी उपस्थिति बढी है। गत दो दशकों से भी अधिक समयावधि से हर वर्ष अक्टूबर-नवम्बर के बीच यह पक्षी यहां आते हैं तथा करीब 4 माह से अधिक समय का प्रवास करने के बाद फरवरी-मार्च के बीच यहां से लौट जाते हैं। 

 

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