संरक्षित होगी प्राचीन सभ्यता की गवाह स्थली

Published Date 2016/07/22 17:44, Written by- FirstIndia Correspondent

डीडवाना। विश्व की प्राचीन सभ्यताओं में अब डीडवाना का नाम भी शामिल होने की उम्मीद दिखाई देने लगी है। एशूलियन काल खंड अर्थात करीब 8 लाख वर्ष पूर्व मानव सभ्यता के गवाह रहे डीडवाना का नाम अब इतिहास के पन्नों में दर्ज होगा। इसके लिए प्रागैतिहासिक काल खंड के गवाह स्थल ‘16 आर’ को सरंक्षित करने की कवायद शुरू हो गई है, जो उस दौर के मानव ‘होमो इरेक्टस’ की विकास गाथा से जुड़ा है।


‘16 आर’ नामक यह टीला लाखों वर्ष पुराने इतिहास का गवाह है। यह रेत का टीला डीडवाना से महज कुछ ही दूरी पर स्थित है, जहां प्राचीन मानव ‘होमो इरेक्टस’ आबाद थे। अगर सब ठीक रहा तो वह दिन दूर नहीं, जब ‘16 आर’ नामक यह रेतीला टीला पुरातत्व विभाग की एक अनमोल धरोहर बन जाएगा और प्राचीन सभ्यता के गवाह स्थल के रूप में भी जाना जाएगा। इसके तहत भारतीय पुरातत्व विभाग के निर्देश पर जोधपुर मंडल कार्यालय के अधिकारियों ने गत दिवस इस महत्वपूर्ण साईट का भ्रमण कर जायजा लिया।

 
विभाग के अधीक्षक पुरातत्वविद् पी. एस. श्रीरामन ने डीडवाना पहुंचकर 16 आर का दौरा किया। इस दौरान बांगड महाविद्यालय के भूवैज्ञानिक डॉ. अरूण व्यास ने श्रीरामन को पुरातत्व दृष्टि से महत्वपूर्ण 16 आर स्थित रेतीले टीलों का मौका मुआयना करवाया। अब इस रिपोर्ट को भारतीय पुरातत्व विभाग के मुख्यालय को भेजी जाएगी।


विश्व में सबसे प्राचीन सभ्यता सिंघु, हड़प्पा और मोहनजोदड़ो को माना जाता है, लेकिन डीडवाना में इससे भी हजारों साल पहले मानव सभ्यता का विकास हुआ था। डीडवाना क्षेत्र एशूलियन काल खंड अर्थात करीब 8 लाख वर्ष पूर्व का साक्षी रहा है। उस दौर में यहां ‘होमो इरेक्ट्स’ यानि वर्तमान मानवों के पूर्वज आबाद थे। मानव ने यहां अपनी विकास गाथा के कई महत्वपूर्ण अध्याय देखे है। डीडवाना क्षेत्र में पेलियोलिथिक काल से सम्बन्धित ‘एशूलियन कल्चरल ट्रेडीशन्स’ संकेत मिले हैं, जो प्रमाणित करते है कि इस क्षेत्र में आठ लाख वर्ष पूर्व ‘होमो इरेक्ट्स’ आबाद थे। 


डीडवाना क्षेत्र में ‘होमो इरेक्ट्स’ के प्रमाण स्वरूप अनेक मानव निर्मित आकृतियां पाई गई है, जिनमें मुख्यत: पत्थरों से बने हथियार है। डीडवाना में बांगड़ नहर के निकट बालू स्तूप में  ‘16 आर’ स्थान पर वैज्ञानिकों द्वारा पुरातात्विक स्तरों की ‘थर्मोलुमिनेसेंस’ व ‘युरेनियम/थोरियम डेटिंग’ द्वारा आयु करीब साढ़े आठ लाख वर्ष पूर्व आंकी गई है।


आपको बता दें कि इस साईट को भूवैज्ञानिक दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। इसके लिए यहां समय-समय पर विभिन्न शोधकर्ताओं द्वारा शोध एवं खुदाई कार्य किए गए हैं, जिनमें मानव निर्मित आकृतियां, एशूलियन के हस्तकुल्हाड़, छोटे-बड़े काटने के औजार जैसे चौपर, पोलीहेण्ड्रोस, स्पेरोइडस, पोलियोलिथिक टूल्स, क्वार्ट्ज स्फाटिक के क्रिस्टल आदि मिले थे। 


डेक्कन कालेज, पुणे के दल द्वारा डॉ. वी.एन. मिश्रा व डॉ. एस. एन. राजगुरू के निर्देशन में 1980 के दशक में सिंघी तालाब व आस-पास के क्षेत्रों में ‘एशूलियन इण्डस्ट्रीज’ की खुदाई की गई, जिसमें मानव निर्मित आकृतियां (आर्टिफेक्ट्स) भूसतह से 40 व 80 सेंटीमीटर नीचे पाए गए। निचले स्तर में ‘एशूलियन’ के बड़े हस्त कुल्हाड़ मिले।

 
इसके अलावा फ्रांस की वैज्ञानिक क्लेरी गेलार्ड व हेमा अच्युतानन ने भी यहां खुदाई कर 1300 आर्टिफेक्ट्स खोजे थे। यह आर्टिफेक्टस छोटे औजार, बड़े काटने के औजार जैसे ‘चौपर’, पोलीहेण्ड्रोस’ व ‘स्पेरोइड्स’ इत्यादि थे। इसके बाद ‘16 आर’ के सरंक्षण को लेकर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने रूचि दिखाई है। ‘16 आर’ मानव विकास व सभ्यता की गवाह स्थली रही है। ऐसे में इस स्मारक की बेहद प्रासंगिकता है। यह स्थान स्मारक व राष्ट्रीय धरोहर के रुप में सरंक्षित करने की दरकार जरूरत है, लोग मानव विकास व सभ्यता के इस स्थान को देख सके और शोधार्थी उस पर शोध कर सके।

 

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