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350th prakash parv of Guru Gobind Singh

कबीर के दोहों में भी बसे है 'गुरु गोबिंद', हर तीर पर लगा था एक तोला सोना

Published Date-05-Jan-2017 02:18:05 PM,Updated Date-05-Jan-2017, Written by- FirstIndia Correspondent

आज यानि 5 जनवरी को सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह का 350वां जन्मदिन है| गुरु गोबिंद को प्रकाश पर्व के नाम से मनाया जाता है| गुरु गोबिंद एक महान कर्मप्रणेता, अद्वितीय धर्मरक्षक, ओजस्वी वक्ता, वीर रस के कवि के साथ ही संघर्षशील वीर योद्धा भी थे। इनका जन्म सन् 1666 को पटना में माता गुजरी जी तथा पिता श्री गुरु तेगबहादुर जी के घर हुआ। उस समय गुरु तेगबहादुर जी बंगाल में थे। उन्हीं के वचनोंनुसार गुरुजी का नाम गोविंद राय रखा गया।


 
गुरु गोबिंद सिंह जी चाहते तो अपने जीवन को बेहद सुख-सुविधाओं के साथ बिता सकते थे। उन्होंने आनंदपुर के सुख छोड़े, मां की ममता छोड़ी, बच्चों के मोह को आसानी से धर्म की रक्षा के लिए त्याग दिया। एक योद्धा की वीरता और मानवता का समन्वय गुरु गोबिंद सिंह के चरित्र को अद्भुत बनाया था। उन्होंने हर तीर पर एक तोला सोना लगवाया हुआ था। जब इस सोने का कारण सिखों ने उनसे पूछा कि मरते तो इससे दुश्मन होते है फिर ये सोना क्यों?


इस पर उनका उत्तर था, 'मेरा कोई दुश्मन नहीं है। मेरी लड़ाई जालिम के जुल्म के खिलाफ है। इन तीरों से जो कोई घायल होंगे वो इस सोने की मदद से अपना इलाज करवा कर अच्छा जीवन व्यतीत करें और अगर उनकी मौत हो गई तो उनका अंतिम संस्कार हो सके।' उन्होंने सिख गुरुओं के सभी उपदेशों को गुरु ग्रंथ साहिब में संगृहीत किया और भविष्य के लिए गुरु ग्रंथ साहिब को गुरु का दर्जा दे दिया। गुरु का काम होता है, अंधेरे से उजाले की ओर ले जाने वाला... एक गुरु के रूप में खालसा पंथ के लोगों को एक नई दिशा दी।

 

 गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय |
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय ||

 

कबीर दास ने अपने शब्दों में गुरु गोविंद का बखान किया है। इसमे कहा गया है- गुरु और भगवान दोनों आकर खड़े हो जाएँ तो पहले किसके चरण स्पर्श करें? सचमुच यह यक्ष प्रश्न है | लेकिन गुरु के चरण-स्पर्श करना ही श्रेष्ठतर है, क्योंकि वे ही भगवान तक पहुंचने का मार्ग बताते हैं।

 

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