रंगों से कहीं ज्यादा गहरा है होली का रहस्य

Published Date 2017/03/12 14:32, Written by- FirstIndia Correspondent

भारत त्योहारो का देश है और होली सबसे प्राचीन त्योहारो में से एक है| होली कितना पुराना त्योहार है, इस बात का अंदाजा तो ठीक-ठीक लगाना कठिन है लेकिन पौराणिक शास्त्रों में मिली जानकारी के अनुसार असत्य पर सत्य की विजय और दुराचार पर सदाचार की विजय के रूप में होली का त्यौहार मनाया जाता रहा है| होली के साथ हमें ढुण्ढा नामक राक्षसी की पौराणिक कथा का भी जिक्र मिलता है| इस कहानी के अनुसार ढुण्ढा नामक राक्षसी गांव-गांव में घुसकर बालकों को कष्ट देती थी। उन्हें रोग व व्याधि से ग्रस्त करती थी|

 

उसे गांव से भगाने के लिए लोगों ने अनेक प्रयास किए परंतु वे सफल नहीं हुए अंत में लोगों ने उसे अपमानित और गालियां देकर गांव से भगा दिया| उत्तर भारत में ढुण्ढा राक्षसी की बजाय होली की रात पूतना को जलाया जाता है। होली के पूर्व तीन दिन भगवान कृष्ण के बाल रूप को पालने में सुलाकर उनका उत्सव मनाते हैं चैत्र पूर्णिमा पर पूतना का दहन करते हैं|  दक्षिण भारत के लोग कामदेव से विजय के प्रतीक के रूप में होलिका रंगोत्सव मनाते हैं|

 

शास्त्रानुसार भगवान शंकर जब तप करने में मग्न थे, उस समय मदन अर्थात कामदेव ने उनके अंत: करण में प्रवेश किया| उन्हें कौन चंचल कर रहा है? यह देखने हेतु शंकर ने नेत्र खोले और मदन को देखते ही क्षणभर में भस्मसात कर दिया अर्थात कामदेव को भस्म कर धुल में मिला दिया| इसलिए होली अर्थात स्वयं के काम, द्वेष, घमंड को समाप्त करने के भाव के साथ हम होलिका दहन करते है और प्रेम व भाईचारे की भावना के साथ होली के इस रंगों से सराबोर त्यौहार को मनाते है|

 

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