Glory of god Baijnath temple devghar of jharkhand

जानिए क्या है वैद्यनाथ धाम की महिमा, क्यों कहा जाता है इसे रावणेश्वर धाम

Published Date-26-Oct-2016 06:18:58 PM,Updated Date-26-Oct-2016, Written by- FirstIndia Correspondent

बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक पवित्र वैद्यनाथ धाम मंदिर में ज्योतिर्लिंग की स्थापना हुई है| यह शिवलिंग झारखंड के देवघर में स्थित है| कहते हैं भोलेनाथ यहां आने वाले की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं| इसलिए इस शिवलिंग को 'कामना लिंग' भी कहते हैं और इस जगह को लोग बाबा बैजनाथ धाम के नाम से भी जानते हैं|

 

वैद्यनाथ धाम का इतिहास यह है कि एक बार राक्षसराज रावण ने हिमालय पर जाकर शिवजी की प्रसन्नता के लिये घोर तपस्या की और अपने सिर काट-काटकर शिवलिंग पर चढ़ाने शुरू कर दिये| एक-एक करके नौ सिर चढ़ाने के बाद दसवाँ सिर भी काटने को ही था कि शिवजी प्रसन्न होकर प्रकट हो गए|

 

फिर शिव जी ने उसके दसों सिर वैसे ही दुबारा कर दिये और बदले में वरदान मांगने को कहा| रावण ने लंका में जाकर उस लिंग को स्थापित करने के लिए उसे ले जाने की आज्ञा माँगी| शिवजी ने अनुमति तो दे दी, पर इस चेतावनी के साथ दी कि यदि मार्ग में इसे पृथ्वी पर रख देगा तो वह वहीं अचल हो जाएगा| इधर भगवान शिव की कैलाश छोड़ने की बात सुनते ही सभी देवता चिंतित हो गए| इस समस्या के समाधान के लिए सभी भगवान विष्णु के पास गए| तब श्री हरि ने लीला रची| भगवान विष्णु ने वरुण देव को आचमन के जरिए रावण के पेट में घुसने को कहा| रावण शिवलिंग ले कर चला पर मार्ग में एक चिताभूमि आने पर उसे लघुशंका निवृत्ति की आवश्यकता हुई|

 

ऐसे में रावण एक ग्वाले को शिवलिंग देकर लघुशंका करने चला गया| कहते हैं उस बैजू नाम के ग्वाले के रूप में भगवान विष्णु थे| इस वहज से भी यह तीर्थ स्थान बैजनाथ धाम और रावणेश्वर धाम दोनों नामों से विख्यात है| पौराणिक ग्रंथों के मुताबिक रावण कई घंटो तक लघुशंका करता रहा जो आज भी एक तालाब के रूप में देवघर में है| इधर बैजू ने शिवलिंग धरती पर रखकर को स्थापित कर दिया|

 

जब रावण लौट कर आया तो लाख कोशिश के बाद भी शिवलिंग को उठा नहीं पाया| तब उसे भी भगवान की यह लीला समझ में आ गई और वह क्रोधित शिवलिंग पर अपना अंगूठा गढ़ाकर चला गया| उसके बाद ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओं ने आकर उस शिवलिंग की पूजा की| शिवजी का दर्शन होते ही सभी देवी देवताओं ने शिवलिंग की उसी स्थान पर स्थापना कर दी और शिव-स्तुति करके वापस स्वर्ग को चले गए|

 

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