Lakkhi Fair held in Anjani Mata Temple

यहां देव उठनी एकादशी के अवसर पर अंजनी माता के मंदिर में आयोजित होता है लक्खी मेला

Published Date-11-Nov-2016 05:32:20 PM,Updated Date-12-Nov-2016, Written by- FirstIndia Correspondent

करौली। जन-जन की आस्था का केन्द्र एवं राजस्थान का एक मात्र अंजनी माता के मंदिर पर शुक्रवार को देव उठनी एकादशी के अवसर पर आयोजित हुए वार्षिक लक्खी मेले के दौरान हजारों श्रद्धालुओं ने दर्शन कर मनौतियां मांगी व सुख समृद्धि की कामना की। गौरतलब है कि करौली के त्रिकूट पर्वत पर हनुमानजी की मां अंजनी माता का प्रदेश का इकलौता मंदिर हैं जहां हर वर्ष कार्तिक मास की एकादशी पर वार्षिक लक्खी मेला का आयोजन होता है।  इस दौरान लोगों की कान से संबधी बीमारियों का उपचार भी माता की भभूती लगाकर किया जाता है।

 

मान्यता है कि अंजनी माता के मंदिर पर पहुंचकर दर्शन करने एवं माता की भवूती लगाने से अब तक हजारों मरीजों का उपचार हो चुका है और वर्ष भर में जितने मरीजों का उपचार होता वो सब इस लक्खी मेले में जात करने के लिए पहुंचते हैं एवं माता को प्रसादी चढाते हैं। कान का उपचार कराने वाले श्रृद्धालू माता के दरबार में जात कर सरकण्डे का तीर और पान बताशे का प्रसाद चढा कर मनौती पूरी करतें है।

 

बताया जाता है कि अंजनी माता करौली नरेश की कुल देवी हैं तथा हनुमान जी का जन्म भी इस त्रिकूट पर्वत पर हुआ बताया जाता है। इस स्थान पर मन्दिर का निर्माण आज से सात सौ बर्ष पूर्व अशोक देव राजा ने कराया बताया जाता है। उन्होने ही पॉचना नदी पर आवागमन के लिए एक पुल का निर्माण भी कराया था। जमीन से 200 मीटर उंचाई पर स्थित अंजनी माता के मंदिर में सदियों से मेले का आयोजन होता है। इस दौरान क्षेत्र की सबसे बडी कुश्ती दंगल का भी आयोजन स्थानीय लोगो द्वारा किया जाता है।

 

त्रिकूट पर्वत पर य़ूं तो वर्ष भर अंजनी माता के मंदिर में श्रद्धालुओं का आना-जाना रहता है लेकिन लक्खी मेले में आसपास के क्षेत्र करीब 60 हजार से अधिक श्रद्धालु पहुंचते हैं।माता के दर्शन से पूर्व श्रद्धालु मंदिर के नीचे स्थित पांचना नदी तट पर स्नान करते हैं एवं उसके पश्चात माता के दर्शन करते हैं। मान्यता है कि अंजनी माता के मंदिर से प्रसादी लेकर श्रद्धालु अपने घर जाते हैं और उसके बाद देवताओं की पूजन कर उन्हे जगाते है।  हिन्दू मान्यता के अनुसार शादी विवाह एवं अन्य शुभ कार्य देव उठनी एकादशी पर देवताओं की पूजा करने के बाद ही प्रारंभ होते हैं।

 

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