मोहर्रम विशेष : पीढ़ियों पुरानी है मन्नती बनने की परंपरा

Published Date 2016/10/09 14:00,Updated 2016/10/09 14:00, Written by- FirstIndia Correspondent

नई दिल्ली| उत्तर प्रदेश के कानपुर में मोहर्रम के मौके पर एक खासतौर का जलसा होता है। यूं तो ऐसा हैदराबाद और वाराणसी में भी होता है, लेकिन कानपुर में मोहर्रम के मौके पर जब शहर में अपनी खास पोशाक में कमर में घंटियां बांधे लाखों पैकी (मन्नती) जब तलवार लेकर नंगे पैर कर्बला कूच करते हैं, तो यह मंजर दिलों की धड़कन बढ़ा देता है। पैकी बनने की परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है। 

 

जानकार बताते हैं कि हैदराबाद और वाराणसी में पैकी बनने की परंपरा तो है, लेकिन कानपुर में इसकी तस्वीर ही अलहदा होती है। इन पैकियों की कमान खलीफा के पास होती है। पहले एक ही खलीफा हुआ करता था, लेकिन एक दशक पहले विवादों के चलते दो खलीफा हो गए, पर निशान (झंडा जिसके पीछे पैकी दौड़ते हैं) एक ही रहा। 

 

कानपुर में निशान-ए-पैक कासिदे हुसैन और तंजीमुल पैक कासिदे हुसैन नाम की दो तंजीमें पैकी (मन्नती) बनाने का अधिकार रखती हैं। इसे कमर बंधाई कहते हैं। पैकी ज्यादातर सफेद कपड़े पहनते है। कमर में रंग-बिरंगी और कंधों से बंधी डोरी होती है। सामने पैड होता है, ताकि कमर में बंधी पीतल की घंटियां घाव न कर दें।

 

पैकी के हाथों में चमकती चलवार होती है। कलावा बंधा होता है। सिर पर ऊंची खास टोपी होती है। पैकी की कोई उम्र नहीं होती।  पैकी एक तरह से मन्नती होते हैं, यानी अपने परिवार के सदस्यों की या खुद की मन्नत पूरी होने पर बनते हैं। पैकी ज्यादातर सुन्नी मुसलमान बनते हैं। कभी विदेश से भी पैकी बनने आते थे, लेकिन माहौल बदलने से अब परहेज लोग आने से परहेज करते हैं। पैकी पांचों दिन पैदल चलते हैं। जमीन पर सोते हैं। किसी भी तरह का नशा करना मना होता है।

 

पैकी बनने के बाद छोटी-छोटी टुकड़ियों में क्षेत्रवार दौड़ते हैं। घरों पर पूरी टुकड़ियों को दावत या चाय पर बुलाया जाता है। सातवीं मोहर्रम की रात इनकी टुकड़ियों में संख्या बढ़ जाती है। नौवीं मोहर्रम की रात इनकी टुकड़ी एक ही हो जाती है, जिसमें दो लाख से ज्यादा पैकी होते हैं। आखिरी गश्त इनकी बड़ी कर्बला के लिए होती है।

 

इमाम चौक और दादा मियां चौराहा के अलावा कैंट में पैकी किट यानी पैकी बनने के लिए सामान की बिक्री होती है। एक पैकी बनने में 300 से 3000 रुपये तक का खर्च आता है। इसके अलावा चढ़ावा भी चढ़ाया जाता है।

 

हुसैनी फेडरेशन के प्रवक्ता मुंसिफ अली रिजवी ने इस संदर्भ में बताया कि हजरत इमाम हुसैन की बेटी हजरते सुगरा बीमार थीं। उन्हें इमाम मदीने में छोड़ आए थे। उन्हें कर्बला से संदेश देने और संदेश लाने का काम कासिदे पैक व कासिदे हुसैन करते थे। पैकी बनने की परंपरा वहीं से शुरू हुई। हालांकि इसको लेकर कई दूसरी बातें भी कही जाती हैं। खलीफा शकील के मुताबिक, पैकी बनने की परंपरा कई पीढ़ियों से है। यह अकीदत से जुड़ी है। मोहर्रम में पैकी अकीदत की निशानी होती है।

 

Moharram, Old, Generations, Tradition, Being, Mnnti

First India News से जुड़े अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करे!
हर पल अपडेट रहने के लिए अभी डाउनलोड करें First India News Mobile Application
लेटेस्ट वीडियो के लिए हमारे YOUTUBE चैनल को विजिट करें

Stories You May be Interested in

Most Related Stories

Anand pal escaped after firing on policemen along

Know Who is this crook Anand pal | Dial
Why Anand pal is not found even after 5 days of
Home Minister said no clue but DGP claimed some