क्या है पितृ पक्ष का महत्त्व ? क्या है श्राद्ध करने की सही विधि ? जानिए ज्योतिषाचार्य पंडित शास्त्री से .....

Published Date 2016/09/16 13:26, Written by- FirstIndia Correspondent

यदि आपको विवाह के कई वर्षो बाद भी संतान सुख प्राप्त नहीं हो पा रहा हो ,वंश वृद्धि नहीं हो पा रही हो ,यदि आपके परिवार में अस्थिरता का वातावरण हो, परिवारजन मानसिक तनाव के दौर से गुजर रहे है , घर मे कलह क्लेश का वातावरण हमेशा बना रहता है , यदि आपको पग पग पर बाधा  का सामना करना पड़ रहा है ,यदि आप किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित है तो मत्स्यपुराण का संकेत यह कहता है कि आपके घर मे पितृ दोष है यानि आपके घर के पितृ अतृप्त हैं| क्या आप अपने घर के पितरो की शांति के लिए साल मे एक बार आने वाले पितृ पक्ष मे पिंड दान, तर्पण और उनके निमित्त किये जाने वाले श्राद्ध श्रदा पूर्वक करते है ? जिस तरह आप अपने और अपने परिवार जनों के जन्म दिन मनाते है, शादी की साल गिरह बड़ी धूम धाम से मनाते है , साल मे आने वाले कई त्योहारों को श्रधा पूर्वक मनाते है और लाखो रुपये खर्च कर देते है  पर क्या आप उतने ही धूम धाम से साल मे सिर्फ 15 दिन चलने वाले पितृ पक्ष पर्व मे अपने पितरो को ,आपके उन परिजनों को जो अब इस दुनिया मे नहीं है के नाम से श्राद्ध करते है, क्या आप पितृ पक्ष मे पिंड दान और तर्पण करके ब्रह्मिनो को भोजन कराते है ?यदि नहीं तो मित्रो,जो मनुष्य अपने पूर्वजों का अंतिम संस्कार, श्रद्धा, तर्पण आदि विधिपूर्वक न करके उसे सिर्फ व्यर्थ व औपचारिक समझते हैं उन्हें पैतृक प्रकोप से शारीरक कष्ट, आंतरिक पीड़ाएँ, बुरे स्वप्न, या स्वप्न में  पूर्वजों का दर्शन, संतानहीनता, अकाल मृत्यु, धन, हानि, परिवार में कलह, दुर्घटना व अपमान प्राप्त होता है। उस घर व उस परिवार का किसी प्रकार का कल्याण नहीं होता है.वही जो मनुष्य पितृ पक्ष मे तत्परता से श्राद्ध आदि कर्म करते हैं, उनके पूर्वजों को गति से सुगति प्राप्त होती हैं। परिणमतः उनकी (श्राद्ध) कर्ता की प्रगति व उन्नति होती है। सुख, शांति, यश, वैभव, स्वस्थ जीवन, पुत्र, धन आदि उसे प्राप्त होते हैं।

 

पितृपक्ष के दौरान वैदिक परंपरा के अनुसार ब्रह्म वैवर्त पुराण में यह निर्देश है कि इस संसार में आकर जो सद्गृहस्थ अपने पितरों को श्रद्धा पूर्वक पितृपक्ष के दौरान पिंडदान, तिलांजलि और ब्राह्मणों को भोजन कराते है, उनको इस जीवन में सभी सांसारिक सुख और भोग प्राप्त होते हैं। वे उच्च शुद्ध कर्मों के कारण अपनी आत्मा के भीतर एक तेज और प्रकाश से आलोकित होते है। मृत्यु के उपरांत भी श्राद्ध करने वाले सदगृहस्थ को स्वर्गलोक, विष्णुलोक और ब्र्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।भारतीय वैदिक वांगमय के अनुसार प्रत्येक मनुष्य को इस धरती पर जीवन लेने के पश्चात तीन प्रकार के ऋण होते हैं। पहला देव ऋण, दूसरा ऋषि ऋण और तीसरा पितृ ऋण। पितृ पक्ष के श्राद्ध यानी 16 श्राद्ध साल के ऐसे सुनहरे दिन हैं, जिनमें हम उपरोक्त तीनों ऋणों से मुक्त हो सकते हैं.. श्राद्ध प्रक्रिया में शामिल होकर। महाभारत के प्रसंग के अनुसार, मृत्यु के उपरांत कर्ण को चित्रगुप्त ने मोक्ष देने से इनकार कर दिया था। कर्ण ने कहा कि मैंने तो अपनी सारी सम्पदा सदैव दान-पुण्य में ही समर्पित की है, फिर मेरे उपर यह कैसा ऋण बचा हुआ है? चित्रगुप्त ने जवाब दिया कि राजन, आपने देव ऋण और ऋषि ऋण तो चुका दिया है, लेकिन आपके उपर अभी पितृऋण बाकी है। जब तक आप इस ऋण से मुक्त नहीं होंगे, तब तक आपको मोक्ष मिलना कठिन होगा। इसके उपरांत धर्मराज ने कर्ण को यह व्यवस्था दी कि आप 16 दिन के लिए पुनः पृथ्वी मे जाइए और अपने ज्ञात और अज्ञात पितरों का श्राद्धतर्पण तथा पिंडदान विधिवत करके आइए। तभी आपको मोक्ष यानी स्वर्ग लोक की प्राप्ति होगी|

 

जो लोग दान श्राद्ध, तर्पण आदि नहीं करते, माता-पिता और बडे बुजुर्गो का आदर सत्कार नहीं करते, पितृ गण उनसे हमेशा नाराज रहते हैं। इसके कारण वे या उनके परिवार के अन्य सदस्य रोगी, दुखी और मानसिक और आर्थिक कष्ट से पीड़ित रहते है। वे निःसंतान भी हो सकते हैं ।मित्रो इस बार पितृ पक्ष यानि श्राद्ध पक्ष 17 सितंबर शनिवार के दिन से शुरू हो रहा है जो की 30 सितंबर 2016 शुक्रवार के दिन तक चलेगा . यह पक्ष आश्विन कृष्ण पक्ष अर्थात् प्रतिपदा से अमावस्या तक का 15 दिवसीय पक्ष है। इस पक्ष में पूर्णिमा को जोड़ लेने से यह 16 दिवसीय महालय श्राद्ध पक्ष कहलाता है।पितृपक्ष श्राद्धों के लिए निश्चित पंद्रह तिथियों का एक समूह है। वर्ष के किसी भी मास तथा तिथि में स्वर्गवासी हुए पितरों के लिए पितृपक्ष की उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है। पूर्णिमा पर देहांत होने से भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को श्राद्ध करने का विधान है। इसी दिन से महालय(श्राद्ध) का प्रारंभ भी माना जाता है।

 

श्राद्ध करने का सीधा संबंध पितरों यानी दिवंगत पारिवारिक जनों का श्रद्धापूर्वक किए जाने वाला स्मरण है जो उनकी मृत्यु की तिथि में किया जाता हैं। अर्थात पितर प्रतिपदा को स्वर्गवासी हुए हों, उनका श्राद्ध प्रतिपदा के दिन ही होगा।  इसी प्रकार अन्य दिनों का भी, लेकिन विशेष मान्यता यह भी है कि पिता का श्राद्ध अष्टमी के दिन और माता का नवमी के दिन किया जाए। परिवार में कुछ ऐसे भी पितर होते हैं जिनकी अकाल मृत्यु हो जाती है, यानी दुर्घटना, विस्फोट, हत्या या आत्महत्या अथवा विष से। ऐसे लोगों का श्राद्ध चतुर्दशी के दिन किया जाता है। साधु और सन्यासियों का श्राद्ध द्वाद्वशी के दिन और जिन पितरों के मरने की तिथि याद नहीं है, उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाता है।जीवन मे अगर कभी भूले-भटके माता पिता के प्रति कोई दुर्व्यवहार, निंदनीय कर्म या अशुद्ध कर्म हो जाए तो पितृपक्ष में पितरों का विधिपूर्वक ब्राह्मण को बुलाकर दूब, तिल, कुशा, तुलसीदल, फल, मेवा, दाल-भात, पूरी पकवान आदि सहित अपने दिवंगत माता-पिता, दादा ताऊ, चाचा, पड़दादा, नाना आदि पितरों का श्रद्धापूर्वक स्मरण करके श्राद्ध करने से सारे ही पाप कट जाते हैं। यह भी ध्यान रहे कि ये सभी श्राद्ध  पितरों की दिवंगत यानि मृत्यु की  तिथियों में ही किए जाएं।यह मान्यता है कि ब्राह्मण के रूप में पितृपक्ष में दिए हुए दान पुण्य का फल दिवंगत पितरों की आत्मा की तुष्टि हेतु जाता है। अर्थात् ब्राह्मण प्रसन्न तो पितृजन प्रसन्न रहते हैं। अपात्र ब्राह्मण को कभी भी श्राद्ध करने के लिए आमंत्रित नहीं करना चाहिए। मनुस्मृति में इसका खास प्रावधान है।

 
आइये यह भी जान लेते है की आने वाले दिनों मे किस तारीख पर कौनसी तिथिका श्राद्ध कर्म किया जायेगा .....

 

प्रतिपदा तिथि का श्राद्ध 17 सितम्बर शनिवार को मनाया जायेगा  .

द्वितीया तिथि का श्राद्ध 18 सितम्बर ,रविवार को मनाया जायेगा

एक विशेष जानकारी जो मै आपको देना चाहता हूँ वो यह है की इस वर्ष आश्विन कृष्ण पक्ष में दिनांक 19 सितम्बर ,सोमवार तीज और चतुर्थी तिथि दोनों ही अपराह्न व्यापिनी है और चतुर्थी तिथि अपराह्न काल से पहले ही समाप्त हो रही है अतः तृतीया और चतुर्थी तिथि का श्राद्ध 19 सितंबर को ही संपन्न किया जाना चाहिए । विशेष तौर पर

तृतीया तिथि का श्राद्ध 19 सितंबर सोमवार के दिन दोपहर 1.33 मिनट मिनट से दोपहर 3.07 मिनट के मध्य में करना चाहिए

चतुर्थी तिथि का श्राद्ध 19 सितंबर सोमवार के दिन ही दोपहर 3.07 मिनट दोपहर 3.58 मिनट के मध्य काल में करना चाहिए 

पंचमी तिथि और भरणी का श्राद्ध 20 सितम्बर ,मंगलवार के दिन मनाया जायेगा

षष्ठी तिथि और कृतिका का श्राद्ध 21 सितंबर ,बुधवार के दिन मनाया जायेगा

 सप्तमी तिथि का श्राद्ध 22 सितंबर, गुरुवार के दिन मनाया जायेगा

 अष्टमी तिथि का श्राद्ध 23 सितंबर, शुक्रवार के दिन मनाया जायेगा

नवमी तिथि और मातृ नवमी का श्राद्ध 24 सितंबर ,शनिवार के दिन मनाया जायेगा

 दशमी तिथि का 25 सितंबर। रविवार के दिन मनाया जायेगा

 एकादशी तिथि का श्राद्ध 26 सितंबर ,सोमवार के दिन मनाया जायेगा

बारस तिथि और सन्यासियों का श्राद्ध 27 सितंबर ,मंगलवार के दिन मनाया जायेगा

त्रयोदशी तिथि का श्राद्ध 28 सितंबर ,बुधवार के दिन मनाया जायेगा

चतुर्दशी तिथि का श्राद्ध 29 सितंबर ,गुरुवार के दिन मनाया जायेगा

सोमवती अमावस/सर्वपितृ श्राद्ध 30 सितंबर ,शुक्रवारके दिन मनाया जायेगा

 

आइये जानते है की किसका श्राद्ध कौन करे?

 

पिता के श्राद्ध का अधिकार उसके पुत्र को ही है किन्तु जिस पिता के कई पुत्र हो उसका श्राद्ध उसके बड़े पुत्र, जिसके पुत्र न हो उसका श्राद्ध उसकी स्त्री, जिसके पत्नी नहीं हो, उसका श्राद्ध उसके सगे भाई, जिसके सगे भाई न हो, उसका श्राद्ध उसके दामाद या पुत्री के पुत्र (नाती) को और परिवार में कोई न होने पर उसने जिसे उत्तराधिकारी बनाया हो वह व्यक्ति उसका श्राद्ध कर सकता है।पूर्वजों के लिए किए जाने वाले श्राद्ध शास्त्रों में बताए गए उचित समय पर करना ही फलदायी होता है।

 

आइये जानते हैं शास्त्रों में बताया गया तर्पण और श्राद्धकर्म के लिए श्रेष्ठ समय क्या है -

 

पितृ शांति के लिए तर्पण का श्रेष्ठ समय संगवकाल यानी सुबह 8 से लेकर 11 बजे तक माना जाता है। इस दौरान किया गया जल से तर्पण पितरों को तृप्त करने के साथ पितृदोष और पितृऋण से मुक्ति भी देता है। इसी प्रकार शास्त्रों के अनुसार तर्पण के बाद बाकी श्राद्ध कर्म के लिए सबसे शुभ और फलदायी समय कुतपकाल होता है। ज्योतिष गणना के अनुसार यह समय हर तिथि पर सुबह 11.36 से दोपहर 12.24 तक होता है।ऐसी धार्मिक मान्यता है कि इस समय सूर्य की रोशनी और ताप कम होने के साथ-साथ पश्चिमाभिमुख हो जाते है। ऐसी स्थिति में पितर अपने वंशजों द्वारा श्रद्धा से भोग लगाए कव्य बिना किसी कठिनाई के ग्रहण करते हैं।

 

आइये अब यह जानते है की किस विधि से या कैसे करे श्राद्ध .....

 

जिस तिथि को आपको घर मे श्राद्ध करना हो उस दिन प्रात: काल जल्दी उठ कर स्नान आदि से निवर्त हो जाये . पितरो के निम्मित भगवन सूर्य देव को जल अर्पण करे और अपने नित्य नियम की पूजा करके अपने रसोई घर की शुद्ध जल से  साफ़ सफाई करे, और पितरो की सुरुचि यानि उनके पसंद का स्वादिष्ट भोजन बनाये | भोजन को एक थाली मे रख ले और पञ्च बलि के लिए पांच जगह 2 - 2  पुड़ी या रोटी जो भी आपने बनायीं है उस पर थोड़ी सी खीर रख कर पञ्च पत्तलों पर रख ले| एक उपला यानि गाय के गोबर का कंडे को गरम करके किसी पात्र मे रख दे| अब आप अपने घर की दक्षिण दिशा की तरफ मुख करके बैठ जाये| अपने सामने अपने पितरो की तस्वीर को एक चोकी पर स्थापित कर दे| एक महत्वपूर्ण बात जो मै  बताना चाहता हू वो यह है की पितरो की पूजा मे रोली और चावल वर्जित है। रोली रजोगुणी होने के कारण पितरों को नहीं चढ़ती, चंदन सतोगुणी होता है अतः भगवान शिव की तरह पितरों को भी चन्दन अर्पण किया जाता है। इसके अलावा पितरों को सफेद फूल चढ़ाए जाते हैं तो आप भी अपने पितरो को चन्दन का टिका लगाये और सफ़ेद पुष्प अर्पण करे| उनके समक्ष 2 अगरबत्ती और शुद्ध घी का दीपक जलाये. हाथ जोड़ कर अपने पितरो से प्रार्थना करे और जाने अनजाने मे हुई गलती का|

 

VidhiShradh, Pandit Mukesh ShastriPitru Paksha

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