कैद में जकड़ी जवानी : इलाज के लिए आंसू बहा रही एक विधवा माँ 

Published Date 2018/06/13 02:36, Written by- FirstIndia Correspondent

श्रीगंगानगर। दिन-रात चिल्लाना, अचानक ही तोड़ फोड़ शुरू कर देना, कोई सामने आ जाए तो मार पिटाई शुरू करना, ऐसे में लोग उसे पागल समझने लगते हैं। एक ही बेटा है जो घर में कैद है, जिसे देख कर विधवा माँ की आँखों में आंसू आते हैं। बाइस साल का यह बेबस बेटा रामकुमार पिछले तीन सालों से घर में कैद है। 

मामला लालगढ़ जाटान पंचायत समिति के गाँव सरदारपुरा जीवन का है। इस गाँव की विधवा महिला नानूदेवी मेघवाल अपने पुत्र के इलाज के लिए आंसू बहा रही है। विधवा महिला नानूदेवी ने बताया कि उसके तीन संतान है, दो लड़कियां व एक लड़का है। 20 वर्ष पूर्व उसके पति की मौत हो गई। इसके बाद सारी जिम्मेदारी उसके कंधों पर आ गई। चार पांच साल पहले पुत्र रामकुमार की शादी हुई घर में खुशियां आयी, लेकिन कुदरत को कुछ और ही मंजूर था। शादी के एक वर्ष बाद पुत्र की मानसिक हालत खराब हो गई और वह पागलों जैसी हरकते करने लगा। 

जंजीरों में तो कभी कमरे के अंदर बंद

खुद विधवा औरत नानूदेवी लोगों के घरों में गोबर-भारी का काम कर अपने परिवार का पेट पाल रही है। रामकुमार की माँ के अनुसार जब उसके बेटे की हालत खराब हो जाती है तो उसे सांकलों में बांधना पड़ता है। इस खराब हालत के चलते उसने कमरा भी बुरी तरह से तोड़ फोड़ दिया है। मानसिक हालत को देखकर एक मां बहुत ही दुखी होकर अपने बेटे को कभी जंजीरों में कभी कमरे के अंदर बंद कर गांव में काम करने जाती है। खुद को नुकसान पहुंचाने की हरकतों के चलते माँ हर समय चिंतित रहती है। परिचितों व अन्य के कार्यक्रमों मे आ-जा भी नहीं सकते। रामकुमार की निगरानी के लिए एक सदस्य की बारी-बारी से डयूटी लगाई जाती है। 

महिला के अलावा नहीं है कोई कमाने वाला 

माँ सारा दिन मजदूरी का काम करती है जो कमा के लाती है, शाम को वही चूल्हे पर पकता है। माँ को रामकुमार के स्वस्थ होने का विश्वास तो है लेकिन घर पर गरीबी का साया होने के कारण रामकुमार का इलाज नहीं हुआ। यह परिवार गरीबी रेखा से बहुत नीचे जीवन यापन कर रहा है, लेकिन इस परिवार को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। बीपीएल कार्ड की सुविधा नहीं है, विधवा और व्रद्धावस्था पेंशन नहीं है, घर में शौचालय बनाने के लिए भी सरकारी सुविधा नहीं मिल पा रही है। 

इस घर में कई जिंदगियां तड़पती नजर आती है। पुत्र के मानसिक तनाव के बाद पत्नी भी छोड़ कर चली गई है, उधर ससुराल वालों ने बहन को भी घर से निकाल दिया। एक मां अपने बेटे की यह हालत देखकर रो रही है कि कोई आर्थिक मदद मिल जाए तो मेरा बेटा ठीक हो जाए। 

प्रशासन ने नहीं ली सुध 

प्रशासन को जानकारी होने के बावजूद आज तक कोई भी नुमाइंदा परिवार की सुध नहीं ले रहा। हर बात पर राय रखने वाले समाज के लोगों ने इस और ध्यान तक नहीं दिया है। गरीबों के इलाज की योजनाएं भी यहाँ से भटक गयी। इस बेबस माँ के बेटे का इलाज मुमकिन हैं, लेकिन इस परिवार की कुछ जरूरतें हैं। जरूरत है कुछ हाथों को आगे आने की। शासन प्रशासन के प्रयास से कई सालों से गम के अँधेरे में जी रहे इस परिवार को रोशनी की किरण दिखाई जा सकती है। 

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