अजमेर लोकसभा उपचुनाव से तय होगा वसुंधरा-पायलट का सियासी कद

Published Date 2017/08/11 08:15,Updated 2017/08/14 08:03, Written by- Dinesh Kumar Dangi

जयपुर (दिनेश डांगी/पवन टेलर)। कद्दावर किसान और भाजपा नेता सांवरलाल जाट के निधन के चलते अगले छह माह में अजमेर लोकसभा सीट पर उपचुनाव होना अब तय है। उम्मीद है कि गुजरात विधानसभा के साथ अजमेर लोकसभा उपचुनाव होगा। भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के लिए चुनाव परिणाम बेहद अहम होंगे, क्योंकि उसके बाद राजस्थान विधानसभा चुनाव होंगे। ऐसे में हार जीत के परिणाम दोनों दलों के लिए सियासी नजरिए से बेहद खास हो जाएंगे।

उपचुनाव में भाजपा सांवरलाल के किसी परिजन या फिर सीबी गैना को मैदान में उतार सकती है तो वहीं कांग्रेस के मुखिया सचिन पायलट खुद इस सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ते आए हैं। लेकिन चुनावी वर्ष से पहले होने इस उपचुनाव को लेकर पायलट कई रणनीतियों और विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। मसलन वो खुद चुनाव लड़ेंगे या नहीं। पायलट का लड़ना नहीं लड़ना यह सब कुछ खुद उनके विवेक और आलाकमान के फैसले पर निर्भर करेगा। हालांकि पायलट को उनके रणनीतिकार फिलहाल चुनाव नहीं लड़ने की ही सलाह दे रहे हैं।

इन समीकरणों के चलते सियासी गलियारों में पायलट के चुनाव नहीं लड़ने की संभावनाओं की ज्यादा कयास लगने शुरु हो गए हैं। लेकिन सूत्रों के मुताबिक, फिलहाल पायलट सभी से राय मशविरा करने में जुटे हुए हैं। अगर पायलट चुनाव नहीं लड़ते हैं तो फिर किसी जाट या गुर्जर नेता को मौका दिया जा सकता है।

भाजपा के लिए हार-जीत के सियासी मायने :
अजमेर लोकसभा उपचुनाव जीतने के लिए सत्तारुढ़ दल भाजपा कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगी। भाजपा ने अंदरखाने इसके लिए सारी कवायद शुरु भी कर दी है। क्योंकि अगर भाजपा चुनाव हार जाती है तो उसकी मुश्किलें बढ़ जाएगी। क्योंकि हार से विधानसभा चुनाव से पहले जनता में यह मैसेज चला जाएगा कि भाजपा की हालत राजस्थान में पतली है। वहीं अगर उपचुनाव में भाजपा परचम लहराने में कामयाब हो जाती है तो उसकी बल्ले बल्ले होना तय है, क्योंकि फिर विधानसभा चुनाव में राजस्थान में भाजपा की लहर चलने का दावा करती हुई जोश से विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुट जाएगी। साथ ही जीत से सीएम वसुंधऱा राजे का जलवा भी हो जाएगा। केन्द्रीय नेतृत्व के सामने फिर राजे का कोई विकल्प नहीं औऱ नेतृत्व परिवर्तन जैसी चर्चाओं पर विराम लग जाएंगे। लेकिन हारने पर व्यक्तिगत सीएम राजे के सियासी भविष्य पर संकट के बादल छा सकते हैं।

भाजपा के संभावित प्रत्याशी :
अब भाजपा के उपचुनाव के संभावित उम्मीदवारों पर चर्चा करते हैं। जिस तरह से सीएम वसुंधरा राजे ने सांवरलाल जाट के बीमार होने से लेकर अंतिम संस्कार तक अपनत्व औऱ स्नेह दिखाया, उससे पूरी संभावना यह दिख रही है कि भाजपा सांवरलाल जाट के किसी परिजन को मौका दे सकती है। इनमें बेटे रामस्वरुप, बेटी सुमन औऱ पत्नी तीनों के नाम चर्चाओं में है। परिजन को टिकट देने पर भाजपा को मोदी लहर के साथ सहानुभूति फैक्टर के बलबूते आसानी से जीत मिलने की उम्मीदें रहेगी। वहीं पार्टी अगर सांवरलाल के परिजनों को टिकट नहीं देने का फैसला करती है तो फिर एक मजबूत नाम सीबी गैना का उभरकर सामने आ रहा है। सीबी गैना बीकानेर यूनिवर्सिटी के कुलपति रह चुके हैं औऱ पूर्व जिला प्रमुख सरिता गैना के ससुर भी हैं। इलाके में सीबी गैना की साफ और मिलनसार छवि है औऱ हर वर्ग में अच्छी पकड़ है। सीबी गैना एक बार फिर सरिता गैना को भी टिकट दिलाने का प्रयास कर सकते हैं, लेकिन नसीराबाद से उपचुनाव हारने पर सरिता की दावेदारी कमजोर पड़ती दिख रही है। इनके अलावा कांग्रेस से भाजपा में आए डेयरी राजनीति से जुड़े रामचंद्र चौधरी का नाम भी दावेदारों में चल रहा है।

कांग्रेस के लिए हार-जीत के सियासी मायने :
सत्ता में वापसी की राह देख रही और उसके लिए प्रयासों में जुटी कांग्रेस के लिए तो यह चुनाव हर एंगल से जीवन और मरण का हो गया है। हारने औऱ जीतने पर कांग्रेस के पास बहुत कुछ खोने और बहुत कुछ पाने की स्थिति हो जाएगी। खुद कांग्रेस के साथ व्यक्तिगत पीसीसी चीफ सचिन पायलट के लिए भी यह उपुचनाव परिणाम बेहद मायने रखेंगे। जवाबदेही पायलट की यहां पर ज्यादा हो गई है, क्योंकि पायलट यहां से दो बार सांसद का चुनाव लड़ चुके हैं, जिनमेें से एक बार जीत औऱ एक बार हार का स्वाद भी चख चुके हैं। ऐसे में पायलट की पूरी कोशिश किसी भी तरह सिर्फ और सिर्फ जीत दर्ज करने की होगी। कांग्रेस के जीतने पर इसे वह विधानसभा चुनाव से पहले राजस्थान में भाजपा की उल्टी गिनती शुरु होने के रुप में भुनाएगी।

सचिन पायलट चुनाव लड़ेंगे या नहीं :
सियासी गलियारों में इन दिनों उपचुनाव में पीसीसी चीफ सचिन पायलट क्या चुनाव लड़ेंगे या नहीं।यह चर्चा तेजी से अचानक शुरु होने लगी है। चुनाव लड़ने या नहीं लड़ने की चर्चाओं को पायलट विरोधी गुट के नेता अंदरखाने हवा दे रहे हैं। अब हम आपको गहराई से औऱ सटीकता से इस संभावना-थ्यौरी को बताते हैं कि पायलट आखिर क्या करेंगे। सूत्रों के मुताबिक चर्चाएं फिलहाल तो सही है, क्योंकि खुद पायलट यह राय लेने में जुटे हुए हैं कि क्या किया जाए। चुनाव लड़ने या नहीं लड़ने के फैक्टर पर पायलट बारीकी से कईं विकल्पों और संभावनाओं को जानने की कोशिश कर रहे हैं।

पायलट को यह बखूबी पता है कि हारने और जीतने पर उनकी भविष्य की सियासत पर क्या फर्क पड़ेगा। अगर जीत गए तो फिर बहुत कुछ हासिल कर लेंगे, लेकिन दुर्भाग्य से चुनाव हार गए तो फ्यूचर पॉलिटिक्स पर विपरित असर भी पड़ना तय है। पायलट अगर चुनाव नहीं लड़ने का फैसला करते हैं तो इस बारे में कईं सवालों और आरोपों का जवाब भी देना पड़ेगा, क्योंकि जैसे ही पायलट मैदान में नहीं उतरेंगे तो भाजपा पहले ही दिन से उन पर हार के डर से भागने का आरोप लगाते हुए घेर लेगी और चुनाव में इस इश्यू को भुनाने से जरा भी पीछे नहीं हटेगी। वहीं नहीं लड़ने पर पार्टी में भी गलत मैसेज चला जाएगा और जाहिर सी बात है कि पार्टी का विरोधी धड़ा भी इस मुद्दे को हवा देगा। ऐसे में दूसरे किसी प्रत्याशी को मानसिक तौर से चुनाव लड़ने के लिए तैयार करना भी पायलट के लिए चुनौती साबित हो सकता है। खैर फिलहाल तो ये तमाम बातें कयास हैं। आखिर में पायलट चुनाव लड़ेंगे या नहीं लड़ेंगे, यह खुद पायलट और आलाकमना पर निर्भर होगा। लेकिन पायलट के समर्थक तो यही दावा कर रहे हैं कि चुनाव लड़ेंगे तो अच्छे वोटों से वो जीत दर्ज करेंगे, लेकिन पायलट के करीबी उन्हें चुनाव नहीं लड़ने की सलाह दे रहे हैं।

कांग्रेस के संभावित उम्मीदवार :
अगर सचिन पायलट खुद चुनाव लड़ते हैं तो फिर दूसरे प्रत्याशी का तो नाम पर चर्चा करना ही गलत होगा, लेकिन पायलट चुनाव नहीं लड़ते हैं तो फिर पार्टी किसी जाट या गुर्जर नेता को मौका दे सकती है। जाट नेताओं में पूर्व विधायक नाथूराम सिनोदिया औऱ पूर्व जिला प्रमुख रामस्वरुप चौधरी में से एक को चुनाव लड़ाया जा सकता है। अगर गुर्जर नेता को मैदान में उतारा जाता है तो सांवरलजाट को हराने वाले पूर्व विधायक महेन्द्र गुर्जर को मौका दिया जा सकता है। हालांकि नसीराबाद विधायक रामनारायण गुर्जर को भी उतारने की चर्चाएं चल रही है। एक संभावना फिर मुस्लिम प्रत्याशी नसीम अख्तर को भी मौका देने की बन रही है।

जातिगत समीकरण :
सियासी समीकरणों के बाद अब जातिगत समीकरणों पर एक नजर डालते हैं। अजमेर लोकसभा सीट पर जब पिछले चुनाव हुए तब यहां 16 लाख 83 हजार 261 वोट थे। उपचुनाव तक फाइनल वोटरलिस्ट अपडेट होने पर वोटों की संख्या बढ़कर करीब 18 लाख होने की उम्मीद की जा रही है। पिछली बार साल 2014 में 11 लाख 56 हजार 314 वोट पड़े थे, जिसमें पायलट को 1 लाख 72 वोट से हार का सामना करना पड़ा था। इस सीट पर जाट, गुर्जर, मुस्लिम और SC के प्रत्येक के दो-दो लाख वोट बराबर बताए जा रहे हैं। हालांकि हर जाति 25-25 हजार दो लाख से ज्यादा वोट बताने का दावा करती है। इनके बाद राजपूत औऱ रावणा राजपूत के करीब एक लाख 80 हजार वोट हैं। ब्राह्मण औऱ वैश्य समाज के भी करीब एक लाख वोटर्स हैं, तो सिंधी 60 हजार औऱ ईसाई भी 13 हजार के करीब मतदाता है और रावत वोटर्स 52 हजार के करीब हैं। हालांकि परिसीमन से पहले रावत मतदाता एक लाख बीस हजार से ज्यादा थे, लेकिन परिसीमन के बाद ब्यावर राजसमंद लोकसभा में जाने से 70 हजार वोट कम हो गए। अन्य मतदाताओं की संख्या ढ़ाई से तीन लाख बताई जा रही है। कांग्रेस को पायलट के चलते गुर्जर वोट, मुस्लिम, आनंदपाल प्रकरण के चलते राजपूत औऱ रावणा वोट अच्छी संख्या में मिलने की उम्मीदें हैं। वहीं भाजपा को जाट, रावत, वैश्य, सिंधी, माली, ब्राह्मण, SC और अन्य जातियों के वोट मिलने की उम्मीद के चलते जीतने का पूरा भरोसा है, लेकिन जातिगत समीकरण दोनों दल किस जाति के नेता को मौका देगी, इस पर ही ज्यादा निर्भर करेंगे।

कब होंगे चुनाव :
अजमेर लोकसभा उपचुनाव संवैधानिक बाध्यता के चलते 6 माह में कराने जरुरी है। ऐसे में संभावना है कि दिसम्बर में उपचुनाव कराया जा सकता है। दिसम्बर में गुजरात विधानसभा चुनाव के साथ निर्वाचन आय़ोग उपचुनाव के लिए अधिसूचना जारी कर सकता है। हालांकि सत्तारुढ़ दल अपनी सुविधा और समीकरणों के अनसुार चुनाव कराने की पूरी कोशिश करेगा।

कौन कितनी बार रहा सांसद :

नाम साल पार्टी
ज्वाला प्रसाद शर्मा 1951-57 कांग्रेस
मुकुट बिहारी भार्गव (लगातार 2 बार) 1957-67 कांग्रेस
बीएन भार्गव (लगातार 2 बार) 1967-77 कांग्रेस
श्रीकरण शारदा 1977-80 जनता पार्टी
भगवानदेव आचार्य 1980-84 कांग्रेस
विष्णुकमार मोदी 1984-89 कांग्रेस
रासासिंह रावत (लगातार 3 बार) 1989-98 भाजपा
प्रभा ठाकुर 1998-99 कांग्रेस
रासासिंह रावत (लगातार 2 बार) 1999-2009 भाजपा
सचिन पायलट 2009-2014 कांग्रेस
सांवरलाल जाट  2014-17 तक भाजपा

रासासिंह रावत ने भाजपा को पहली बार इस सीट से जीत का स्वाद चखाया। रावत करीब पांच बार यहां से सांसद चुने गए। रावत के बाद जाट भाजपा से जीतने वाले दूसरे प्रत्याशी बने। टोटल 16 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 9 बार, भाजपा छह बार औऱ एक बार जनता दल यहां से जीत दर्ज कर चुकी है।

First India News से जुड़े अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करे!
हर पल अपडेट रहने के लिए अभी डाउनलोड करें First India News Mobile Application
लेटेस्ट वीडियो के लिए हमारे YOUTUBE चैनल को विजिट करें

Stories You May be Interested in


Most Related Stories


-------Advertisement--------


अमित शाह के जयपुर विजिट पर ओम विड़ला से खास बातचीत | Jaipur News

अमित शाह के जयपुर विजिट पर अरुण अग्रवाल से खास बातचीत | Jaipur News
अमित शाह के जयपुर विजिट पर अविनाश राय खन्ना से खास बातचीत | Jaipur News
अमित शाह के जयपुर आगमन पर राजकुमारी दिया द्वारा भव्य स्वागत | Jaipur News