75 की हुई बॉलीवुड की 'सायोनारा', इंडस्ट्री की जुबली गर्ल थीं आशा पारेख

Published Date 2017/10/02 04:23, Written by- FirstIndia Correspondent
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60 और 70 के दशक की मशहूर अदाकारों में शुमार आशा पारेख सोमवार को अपना 75वां जन्मदिन मना रही हैं। आशा ने 10 साल की उम्र में ही फिल्म इंडिस्ट्री में कदम रख दिया था। शुरूआत में असफलता हाथ लगी। फिल्म डायरेक्टर विजय भट्ट ने उन्हें यह कह कर फिल्म से निकाल दिया था कि उनमें अभिनेत्री बनने के गुण नहीं है। वह निराश जरूर हुई लेकिन उन्हांने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने बतौर बाल कलाकार के रूप में फिल्म ‘आसमान’ 1952 से काम करना शुरू किया। इसके बाद उन्हें बिमल रॉय ने एक नृत्य शो में देखा और फिल्म ‘बाप-बेटी’ 1954 में आशा को पेश किया। लेकिन फिल्म फ्लॉप रहीं। और आज एक मशहूर अदाकारा के रूप में इंडस्ट्री में याद किए जाते हैं।

आशा  का जन्म 2 अक्टूबर 1942 को बेंगलुरू में एक गुजराती परिवार में हुआ था। वैसे इनकी मां मुस्लिम और पिता हिंदू थे। आशा की मां ने उन्हें छेटी उम्र से ही शास्त्रीय नृत्य की शिक्षा दिलाने लगी थीं। इसके बाद उन्होंने कई देश-विदेश में शोज़ भी किए है। बचपन में वह डॉक्टर बनना चाहती थी, जिसके बाद उन्होंने आईपीएस अधिकारी बनने की सोची। लेकिन किस्मत में कुछ और ही लिखा था। अपनी पढ़ाई को ध्यान में रखते हुए उन्होंने कुछ समय के लिए फिल्मी दुनिया से ब्रेक ले लिया। फिर 16 साल की उम्र में वापसी की।

1959 में उन्हें फिल्म ‘गूंज उठी शहनाई’ से यह कह कर निकाल दिया कि वह एक्टिंग नहीं कर सकती। इसके कुछ दिनों बाद सुबोध मुखर्जी और निर्देशक नासिर हुसैन ने आशा को शम्मी कपूर के आपोजिट कास्ट किया फिल्म ‘दिल देके देखों’ में। इस फिल्म की सक्सेस के साथ आशा रातोंरात मशहूर एक्ट्रेस बन गई थी। इसके बाद हुसैन ने आशा के साथ कई फिल्में बनाई|

जैसे – ‘जब प्यार किसी से होता है’ 1961, ‘फिर वही दिल लाया हूं’ 1963, ‘तीसरी मंजिल’ 1966, और ‘कारवां’ 1971। फिल्म कटी पतंग के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्म फेयर पुरूस्कार मिला। एक समय पर आशा जी का जब करियर झुकने लगा था तो डायरेक्टर नासिर हुसैन के कहने पर कई टीवी सीरियलों का निर्माण किया, जिनमें ‘पलाश के फूल,’ ‘कोरा कागज’, व कॉमेडी सीरियल ‘दाल में काला’।

पुरस्कार:
-1992 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
-2001 में फिल्म फेयर लाइफटाइम पुरस्कार से नवाजा गया।
-2006 में अंतराष्ट्रीय भारतीय फिल्म अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया।

1998 से 2001 तक वह सेंसर बोर्ड की पहली महिला अध्यक्ष रहीं। आशा पारेख ने वहां कभी वेतन नहीं लिया लेकिन उनके सख्त रवैये के कारण उन्हें आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। अभिनेत्री के सम्मान में आशा पारेख अस्पताल भी खोला गया है। और आज वह डांस एकेडमी कारा भवन पर क्लास चलाती है।

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