कौन सी तारीख़ को किस तिथि का श्राद्ध, क्या है श्राद्ध सरल विधि और समय

Published Date 2017/09/05 02:28, Written by- Pandit Mukesh Shastri

इस बार पितृ पक्ष यानि श्राद्ध पक्ष 6 सितंबर बुधवार के दिन से शुरू हो रहा है जो कि 20 सितंबर 2017 बुधवार के दिन तक चलेगा| यह पक्ष आश्विन कृष्ण पक्ष अर्थात प्रतिपदा से अमावस्या तक का 15 दिवसीय पक्ष है। इस पक्ष में पूर्णिमा को जोड़ लेने से यह 16 दिवसीय महालय श्राद्ध पक्ष कहलाता है। पितृपक्ष श्राद्धों के लिए निश्चित पंद्रह तिथियों का एक समूह है। वर्ष के किसी भी मास तथा तिथि में स्वर्गवासी हुए पितरों के लिए पितृपक्ष की उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है। पूर्णिमा पर देहांत होने से भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को श्राद्ध करने का विधान है। इसी दिन से महालय (श्राद्ध) का प्रारंभ भी माना जाता है।  

श्राद्ध करने का सीधा संबंध पितरों यानी दिवंगत पारिवारिक जनों का श्रद्धापूर्वक किए जाने वाला स्मरण है जो उनकी मृत्यु की तिथि में किया जाता हैं। अर्थात पितर प्रतिपदा को स्वर्गवासी हुए हों, उनका श्राद्ध प्रतिपदा के दिन ही होगा।  इसी प्रकार अन्य दिनों का भी, लेकिन विशेष मान्यता यह भी है कि पिता का श्राद्ध अष्टमी के दिन और माता का नवमी के दिन किया जाए। परिवार में कुछ ऐसे भी पितर होते हैं जिनकी अकाल मृत्यु हो जाती है, यानी दुर्घटना, विस्फोट, हत्या या आत्महत्या अथवा विष से। ऐसे लोगों का श्राद्ध चतुर्दशी के दिन किया जाता है। साधु और सन्यासियों का श्राद्ध द्वाद्वशी के दिन और जिन पितरों के मरने की तिथि याद नहीं है, उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाता है।
 
जीवन मे अगर कभी भूले-भटके माता पिता के प्रति कोई दुर्व्यवहार, निंदनीय कर्म या अशुद्ध कर्म हो जाए तो पितृपक्ष में पितरों का विधिपूर्वक ब्राह्मण को बुलाकर दूब, तिल, कुशा, तुलसीदल, फल, मेवा, दाल-भात, पूरी पकवान आदि सहित अपने दिवंगत माता-पिता, दादा ताऊ, चाचा, पड़दादा, नाना आदि पितरों का श्रद्धापूर्वक स्मरण करके श्राद्ध करने से सारे ही पाप कट जाते हैं। यह भी ध्यान रहे कि ये सभी श्राद्ध  पितरों की दिवंगत यानि मृत्यु की  तिथियों में ही किए जाएं।
 
यह मान्यता है कि ब्राह्मण के रूप में पितृपक्ष में दिए हुए दान पुण्य का फल दिवंगत पितरों की आत्मा की तुष्टि हेतु जाता है। अर्थात् ब्राह्मण प्रसन्न तो पितृजन प्रसन्न रहते हैं। अपात्र ब्राह्मण को कभी भी श्राद्ध करने के लिए आमंत्रित नहीं करना चाहिए। मनुस्मृति में इसका खास प्रावधान है। आइये यह भी जान लेते है की आने वाले दिनों मे किस तारीख पर कौनसी तिथिका श्राद्ध कर्म किया जायेगा .....

एक विशेष जानकारी जो मै आपको देना चाहता हूँ वो यह है की इस वर्ष आश्विन कृष्ण पक्ष में पार्वण श्राद्ध निकालने का समय दोपहर 1 बजकर 40 मिनट से दोपहर 4 बजे के लगभग रहेगा | ध्यान रखे इस समय के दौरान आपके पितृ आपके आपके घर पधारेंगे और इस समय के दौरान उन्हें भोजन,तर्पण इत्यादि से तृप्त करे | इस वर्ष दिनांक 5 सितम्बर ,मंगलवार के दिन पूर्णिमा तिथि दोपहर 12-41 मिनट से होने कारण पूर्णिमा और पोष्टपदी का श्राद्ध दिनांक 5 सितम्बर मंगलवार के दिन दोपहर बाद 1.40 मिनट पर किया जायेगा |

  • प्रतिपदा तिथि का श्राद्ध 6 सितम्बर बुधवार को दोपहर को 12-33 मिनट के बाद किया जायेगा |    .
  • द्वितीया तिथि यानि दोज  का श्राद्ध 7  सितम्बर ,गुरूवार को दोपहर 11- 53 मिनट के बाद मनाया जायेगा
  • तृतीया तिथि का श्राद्ध 8 सितंबर शुक्रवार के दिन दोपहर 10-44 मिनट के बाद मनाया जायेगा   
  • चतुर्थी तिथि का श्राद्ध 9 सितंबर शनिवार के दिन प्रातः 9 -13 के बाद मनाया जायेगा    
  • पंचमी तिथि और भरणी का श्राद्ध 10 सितम्बर ,रविवार  के दिन मनाया जायेगा
  • षष्ठी तिथि और कृतिका का श्राद्ध 11 सितंबर ,सोमवार  के दिन मनाया जायेगा
  • सप्तमी तिथि का श्राद्ध 12 सितंबर, मंगलवार  के दिन मनाया जायेगा
  • अष्टमी तिथि का श्राद्ध 13 सितंबर, बुधवार के दिन मनाया जायेगा
  • नवमी तिथि और मातृ नवमी का श्राद्ध 14 सितंबर ,गुरुवार के दिन मनाया जायेगा
  • दशमी तिथि का श्राद्ध 15 सितंबर,शुक्रवार  के दिन मनाया जायेगा
  • एकादशी तिथि का श्राद्ध 16 सितंबर ,शनिवार के दिन मनाया जायेगा

दिनांक 17 सितम्बर ,2017,रविवार  के दिन अपराह्न काल दोपहर 1-35 मिनट से दोपहर 4 बजे  में द्वादशी और तेरस दोनों तिथि मौजूद रहेगी अतः दोपहर 1-35 मिनट से दोपहर 2-43 मिनट के मध्य द्वादशी /बारस/सन्यासियों का श्राद्ध किया जायेगा| दिनांक 17 सितम्बर 2017 के दिन ही दोपहर 2-43 मिनट से दोपहर 4 बजे के मध्य त्रयोदशी तिथि का श्राद्ध किया जायेगा | आप सभी इसका ध्यान रखे और लाभ उठाये | चतुर्दशी तिथि और मघा का श्राद्ध 18 सितंबर ,सोमवार  के दिन दोपहर 1 बजे बाद मनाया जायेगा| सर्वपितृ अमावस - सर्वपितृ श्राद्ध 19  सितंबर ,मंगलवार के  दिन दोपहर 12 बजे बाद मनाया जायेगा|

आइये जानते है की किसका श्राद्ध कौन करे?
पिता के श्राद्ध का अधिकार उसके पुत्र को ही है किन्तु जिस पिता के कई पुत्र हो उसका श्राद्ध उसके बड़े पुत्र, जिसके पुत्र न हो उसका श्राद्ध उसकी स्त्री, जिसके पत्नी नहीं हो, उसका श्राद्ध उसके सगे भाई, जिसके सगे भाई न हो, उसका श्राद्ध उसके दामाद या पुत्री के पुत्र (नाती) को और परिवार में कोई न होने पर उसने जिसे उत्तराधिकारी बनाया हो वह व्यक्ति उसका श्राद्ध कर सकता है। पूर्वजों के लिए किए जाने वाले श्राद्ध शास्त्रों में बताए गए उचित समय पर करना ही फलदायी होता है।

आइये जानते हैं शास्त्रों में बताया गया तर्पण और श्राद्धकर्म के लिए श्रेष्ठ समय क्या है:
पितृ शांति के लिए तर्पण का श्रेष्ठ समय संगवकाल यानी सुबह 8 से लेकर 11 बजे तक माना जाता है। इस दौरान किया गया जल से तर्पण पितरों को तृप्त करने के साथ पितृदोष और पितृऋण से मुक्ति भी देता है। इसी प्रकार शास्त्रों के अनुसार तर्पण के बाद बाकी श्राद्ध कर्म के लिए सबसे शुभ और फलदायी समय कुतपकाल होता है। ज्योतिष गणना के अनुसार यह समय हर तिथि पर सुबह 11.36 से दोपहर 12.24 तक होता है। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि इस समय सूर्य की रोशनी और ताप कम होने के साथ-साथ पश्चिमाभिमुख हो जाते है। ऐसी स्थिति में पितर अपने वंशजों द्वारा श्रद्धा से भोग लगाए कव्य बिना किसी कठिनाई के ग्रहण करते हैं।

आइये अब यह जानते है की किस विधि से या कैसे करे श्राद्ध:

  • जिस तिथि को आपको घर मे श्राद्ध करना हो उस दिन प्रात: काल जल्दी उठ कर स्नान आदि से निवर्त हो जाये| पितरो के निम्मित भगवन सूर्य देव को जल अर्पण करे और अपने नित्य नियम की पूजा करके अपने रसोई घर की शुद्ध जल से साफ़ सफाई करे और पितरो की सुरुचि यानि उनके पसंद का स्वादिष्ट भोजन बनाये भोजन को एक थाली मे रख ले और पञ्च बलि के लिए पांच जगह 2-2  पुड़ी या रोटी जो भी आपने बनायीं है उस पर थोड़ी सी खीर रख कर पञ्च पत्तलों पर रख ले|
  • एक उपला यानि गाय के गोबर का कंडे को गरम करके किसी पात्र मे रख दे| अब आप अपने घर की दक्षिण दिशा की तरफ मुख करके बैठ जाये| अपने सामने अपने पितरो की तस्वीर को एक चोकी पर स्थापित कर दे| एक महत्वपूर्ण बात जो है कि पितरो की पूजा मे रोली और चावल वर्जित है। रोली रजोगुणी होने के कारण पितरों को नहीं चढ़ती, चंदन सतोगुणी होता है अतः भगवान शिव की तरह पितरों को भी चन्दन अर्पण किया जाता है।
  • इसके अलावा पितरों को सफेद फूल चढ़ाए जाते हैं तो आप भी अपने पितरो को चन्दन का टिका लगाये और सफ़ेद पुष्प अर्पण करे| उनके समक्ष 2 अगरबत्ती और शुद्ध घी का दीपक जलाये| हाथ जोड़ कर अपने पितरो से प्रार्थना करे और जाने अनजाने मे हुई गलती के लिए माफ़ी मांगे| अपने घर की सुख शांति और समृद्धि का आशीर्वाद मांगे और उन्हें भोजन का निमंत्रण दे| भोजन की थाली और पांच जगह जो आपने पितरो की बलि रखी है उसे पितरो की तस्वीर के सामने रख दे|
  • गरम उपला यानि कंडे पर आप शुद्ध घी और भोजन की थाली मे से थोडा-थोडा समस्त पकवानों को लेकर शुद्ध घी मे मिलाकर उपले (कंडे ) पर अपने पितरो को भोग अर्पण करे जिसे हम धूप भी कहते है| मुख्य बात यह ध्यान रखने की है कि जब तक आप इस प्रकार अपने पितरो को इस प्रकार धूप नहीं देंगे तब तक आपके घर के पितृ देवता भोजन ग्रहण नहीं करते है| उस धुप से उठने वाली सुगंध से ही वो भोजन को ग्रहण करते है| धूप देने के बाद अपने सीधे हाथ मे जल लेकर भोजन की थाली के चारो और तीन भर घुमा कर अगुठे की तरफ से जल जमीन पर छोड़ दे|
  • आप मे से बहुत से दर्शक ऐसे होंगे जीने यह नहीं पता होगा कि जब हम अंगुलियों की तरफ से जल छोड़ते है तो वो जल देवता ग्रहण करते है और जब हम अंगूठे की तरफ से जल छोड़ते है तो वह जल आपके पितृ ग्रहण करते है| बहुत छोटी सी किन्तु आपक सभी के लिए बहुत ज्ञानवर्धक बात है यह| तो अगर आप चाहते है ही आपके पितृ आपका दिया हुआ भोजन और जल ग्रहण करे तो इस विधि से धुप दे और जल को अंगूठे की तरफ से छोड़े| एक बार पुन: उनसे मंगल आशीर्वाद की कामना करे|
  • पांच बलि मे से एक एक बलि क्रमश गाय को, कुत्ते को, कौए को, एक किसी भी मांगने वाले को और एक चींटी को दे दे| भोजन की थाली घर मे बुलाये ब्राह्मिन के सामने रखे| उसे आत्मीयता से भोजन करवाए . भोजन के पश्चात ब्राह्मिन देवता के चरण छूकर आशीर्वाद प्राप्त करे और ब्राह्मिन देवता को यथा शक्ति दक्षिणा, वस्त्र आदि दे कर विदा करे|

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