अव्यवस्था की भेंट ना चढ़ जाए दागी उम्मीदवारों पर कसा शिकंजा

Dr. Rituraj Sharma Published Date 2018/11/07 09:55

जयपुर। दागी उम्मीदवारों पर भारत निर्वाचन आयोग इस बार शिकंजा तो कर रहा है लेकिन आयोग की यह पहल कहीं अव्यवस्था की भेंट नहीं चढ़ जाए। सभी प्रत्याशियों के आपराधिक रिकॉर्ड को प्रमुख अखबारों और वेबसाइट्स में प्रकाशन की मॉनिटरिंग को लेकर खासतौर पर सवाल उठ रहे हैं  पिछली बार 34 फीसदी दागी प्रत्याशी विधायक बने थे इसलिए भी यह चिंता लाजमी मानी जा रही है।

2008 से 2013 की तुलना करें तो प्रत्याशियों के घोषित आपराधिक रिकॉर्ड के आंकड़ों में बढ़ोतरी हुई है । लेकिन चिंताजनक यह भी है की चुनाव दर चुनाव आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के चुनाव लड़ने की संख्या भी बढ़ रही है।

2008 में जहां 31 विधायकों ने आपराधिक मामले घोषित किए थे वहीं 2013 के विधानसभा चुनाव में यह संख्या 34 हो गई।
 इसका प्रतिशत 2008 में 16 प्रतिशत तो 2013 में यह 17% हो गया।

-विधायकों की ओर से घोषित गंभीर आपराधिक मामले 2008 के आठ के मुकाबले 2013 में 18 हो गए।
-यह कुल 5 फ़ीसदी की बढ़ोतरी है 2008 में यह आंकड़ा 4% था तो 2013 में 9% हो गया

आइए अब जानते हैं गंभीर आपराधिक मामलों के लिए मापदंड क्या हैं-
- 5 साल या उससे अधिक सजा वाले अपराध गैर जमानती अपराध चुनाव से जुड़े अपराध।
 धारा 171 या रिश्वतखोरी सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाने से जुड़े अपराध।
- हमला,हत्या, अपहरण, बलात्कार से जुड़े अपराध।
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8 के तहत उल्लिखित अपराध।
-भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम कानून के तहत अपराध महिलाओं के खिलाफ अत्याचार से जुड़े अपराध।

2013 में अभ्यर्थियों की ओर से घोषित गंभीर आपराधिक मामलों पर नजर डालें तो स्थिति गंभीर सामने आती है।

 इनमें निर्दलीयों का आपराधिक मामला घोषित करने का प्रतिशत सबसे ज्यादा 29 आ रहा है। 
-निर्दलीय के 7 विश्लेषित विधायकों में दो ने आपराधिक मामले घोषित किए हैं जो कि 29 फ़ीसदी है।
- इनमें गंभीर आपराधिक मामले भी दो हैं कुल मिलाकर निर्दलीय में 29 फीसदी गंभीर आपराधिक मामले वाले विधायक हैं।
- भारतीय जनता पार्टी के विश्लेषित 157 विधायकों में 25 विधायकों ने घोषित आपराधिक मामलों की जानकारी दी है जो कि 16 फ़ीसदी है।
- इसमें विधायकों द्वारा घोषित गंभीर आपराधिक मामले 16 हैं जो कि 10 फीसदी है कांग्रेस के विश्लेषित 25 विधायकों में छह विधायकों ने आपराधिक मामले घोषित किए हैं जो कि 24 फ़ीसदी है।
-कांग्रेस के विधायकों में गंभीर आपराधिक मामले वाले एक भी विधायक नहीं है।
- राजपा के विश्लेषित चार विधायकों में एक विधायक ने आपराधिक मामला घोषित किया था जो कि 25 फीसदी  है ...वहीं अन्य में विश्लेषित चार विधायकों में एक भी आपराधिक रिकॉर्ड का विधायक नहीं है।
-इसमें खास बात यह है कि बीजेपी के दो विधायकों चुरू के राजेंद्र राठौड़ और उदयपुर के गुलाब चंद कटारिया ने खुद पर हत्या यानी आईपीसी 302 से जुड़े मामले घोषित किए हैं।
-अपहरण से जुड़े मामले घोषित करने वाले तीन विधायक हैं यह मामले आईपीसी की 364 365 और 368 की धाराओं में है।
इस बार भारत निर्वाचन आयोग ने  इन दागी उम्मीदवारों के खिलाफ दर्ज मामलों की जानकारी आम जनता को हो इसलिए यह प्रावधान किया है-
-चुनाव आयोग ने फॉर्म 26 में किया संशोधन
-सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर किया है संशोधन
-अब अभ्यर्थी को पर्चा दाखिल करते समय  आपराधिक  मामलों की जानकारी देनी होगी
दर्ज और लंबित केसेस की जानकारी देनी होगी।
-अभ्यर्थियों को नामांकन के दौरान मोटे अक्षरों में आपराधिक मामलों की जानकारी दर्शानी होगी। 
-दोषसिद्ध हो जाए या उसके विरूद्ध कोई भी आपराधिक मामला दर्ज या लंबित हो, तो अभ्यर्थियों को ऐसे प्रकरणों की जानकारी तीन अलग-अलग तिथियों में नामांकन वापसी और मतदान तिथि से 2 दिन पूर्व 12 साइज के फाॅन्ट में अपनी विधानसभा क्षेत्र के प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित करवानी होगी। 
-आपराधिक मामलों की जानकारी प्रिन्ट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में व्यापक तौर पर कम से कम 3 बार प्रकाशित और प्रसारित करवानी होगी।
-केन्द्रीय कानून एवं न्याय मंत्रालय ने इसमें संशोधन किया है। 
संशोधन के तहत सभी राजनैतिक दलों को चुनाव सम्पन्न होने से 30 दिनों के भीतर राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को सभी आवश्यक दस्तावेजों के साथ रिपोर्ट प्रस्तुत करने के भी निर्देश दिए गए हैं कि जिसमें इस बात का स्पष्ट उल्लेख हो कि उनके द्वारा निर्देशों की पालना कर दी गई है। साथ ही पार्टी द्वारा समाचार पत्रों की कटिंग्स भी लगा दी गई हैं। इसके अलावा उम्मीदवारों द्वारा प्रकाशित और प्रसारित सूचना को जिला निर्वाचन अधिकारी को चुनाव व्यय के ब्योरे के साथ भी प्रस्तुत करना होगा।
इस कवायद के बावजूद अब यह सवाल उठ रहा है -
-नामांकन दाखिल करते समय किसी अभ्यर्थी ने आपराधिक केसेस की जानकारी कम दर्शाया नहीं दर्शाई तो इसकी मॉनिटरिंग किस तरह से की जाएगी?
- क्या महज शिकायत होने पर ही कोई कार्यवाही अमल में लाई जाएगी?

समाचार पत्रों में प्रकाशित करने का प्रावधान तो किया गया है लेकिन अपेक्षाकृत कम प्रसार वाले या छोटे अखबारों में यह जानकारी दी गई तो इसकी रोकथाम कैसे की जाएगी?

इन सवालों को उठाते हुए एडीआर के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सीईओ आनन्द कुमार से सघन मॉनिटरिंग की मांग की है।
जिस तरह से चुनाव लड़ने वाले आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेता बढ़ रहे हैं उसे देखते हुए मॉनिटरिंग में खासी कठिनाई होगी।
 

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