पारंपरिक कलाओं के संरक्षण का हो रहा अनूठा प्रयास

Published Date 2017/08/12 12:56,Updated 2017/08/12 01:37, Written by- FirstIndia Correspondent

जैसलमेर | देश विदेश में राजस्थानी लोक संगीत व लोक वाद्यो के रिदम से श्रोताओं को दीवाना बनाते हुवें झूमने का मजबूर करने वाली इस पारंपरिक लोक कलाओ को बचाये रखने व नई पीढ़ी को इसमें पारंगत करने के इसमें अनुठे प्रयास शुरु किये गए हैं। जैसलमेर में लंगा मांगणियार से जुड़ी हुई एक नामी गिरामी लोक संस्थान गुणसार लोक संगीत संस्थान द्वारा क्लब महेन्द्रा के सहयोग से लंगा मंगणियार जाति के 40 बच्चों का एक वर्कशाॅप शुरु किया हैं। प्रतिदिन चलने वाले महेन्द्रा गुणसार लोक संगीत स्कूल में चल रहे इस प्रशिक्षिण शिविर में लुप्त हो रहे पारंपरिक लोक वाद्यो को बजाने व लोक गीतो को गाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा हैं। इसमें खासकर ऐसे गीत गवाये जा रहे हैं निका प्रचलन धीमे-धीमे कम होता जा रहा हैं।

जैसलमेर के लोक संगीत की गूँज सात समंदर पार तक पहुँच चुकी है। हर साल लाखों की संख्या में देसी विदेशी सैलानी पारम्परिक लोक कलाओं को देखने संगीत को सुनने यहाँ आते हैं। जैसलमेर के लोक संगीत को बचा कर रखने वाली जातियां लंगा और मांगनियार इस संगीत को बचा कर रख बैठी है मगर आज की पीढ़ियों में इस लोक संगीत का मोह धीरे धीरे ख़त्म हो रहा है। इस संगीत को संरक्षण देने व आने वाली पीढ़ियों में इसे जागृत रखने के लिए जैसलमेर की एक संस्थान गुणसार लोक संगीत संस्थान द्वारा क्लब महेन्द्रा के सहयोग से लंगा मंगणियार जाति के 40 बच्चों का एक वर्कशाॅप शुरु किया हैं। जिसमे बच्चों को अपनी लोक कला को सिखाया जा रहा है उन्हें रूबरू करवाया जा रहा है ताकि इस लोक संगीत का संरक्षण हो सके।

असल  में जैसलमेर सहित पश्चिमी राजस्थान में कई क्षेत्रो में बजाये जाने वाले लोक वाद्य जिसमें सारंगी, कमायचा, शहनाई आदि प्रमुख हैं का उपयोग धीमे-धीमे काफी कम होता जा रहा हैं। इसके बजाने वाले कलाकार भी काफी गिने चुने रह गए हैं। अब केवल हारमोनियम व ढोलक आदि वाद्ययंत्र कलाकारो द्वारा बजाया जा रहा हैं। इसी तरह कई प्राचीन लोक गीत लुप्त होने के कगार पर हैं। स्थिति यहां तक पहुंच गए हैं कि इनके लिरिक्स भी वर्तमान की नई पीढ़ी को याद नही हैं, इसको देखते हुवें इस लोक गीतो व लोक वाद्ययो को बचाने के लिए हमने महेन्द्रा गुड़सार संगीत स्कूल शुरु किया हैं जिसमें लंगा मंगणियार व अन्य जातियों के छोटे-छोटे बच्चों को इन लोक गीतो व वाद्य यंत्रों में पारंगत किया जा रहा हैं।

स्कूलो में पढ़ाई के बाद छुट्टी होने पर प्रतिदिन ढाई बजे से लेकर 5 बजे तक चलने वाले इस प्रशिक्षण वर्कशाॅप में प्रथम बैच में करीब 40 बच्चो को प्रशिक्षण दिया जा रहा हैं। करीब 6 महिने तक इन बच्चों को ट्रेनिंग दी जाएगी, उसके बाद नया बैच शुरु किया जायेगा। इस वर्कशाॅप में करीब 9 प्रसिद्ध मांगणियार जाति के लोक कलाकर बच्चों को अलग-अलग वाद्य यंत्रो को बजाने व गायन की टेªनिंग दे रहे हैं। इसमें फिरोज खान द्वारा मोरचंद व खड़ताल बजाने, रफीक द्वारा ढोलक, खेते खान द्वारा खड़ताल व चंग, सतार खान द्वारा सारंगी, सच्चू खांन द्वारा कमायचा, अमीन खांन द्वारा हारमोनियम, डालूदास द्वारा मंजीड़ा व वीणा, रसूल खांन द्वारा गायन व अली खान द्वारा गायन व बाकी वाद्य यंत्रो को बजाने की टेªनिंग दी जा रही हैं।

बख्स खान ने बताया कि वर्कशाॅप में सभी प्रकार के वाद्ययंत्र जिसमें तबला, नगाड़ा, चंग, ढोल, ढोलक हारमोनियम तबला, सिंधी सारंगी, खंजरी, मुरली, तासा, मदिरा, भपंग, अलगोजा, शहनाई, मोरचंग, वीणा आदि वाद्य यंत्रो को क्लब महेन्द्रा के सहयोग से खरीदा गया हैं। इन वाद्ययंत्रो को बच्चे बजाना सीख रहे हैं व इनके साथ गायन भी कर रहे हैं। उन्होने बताया कि इसके अलावा ऐसे कई प्राचीन गीतो के गायन की ट्रेनिंग दी जा रही हैं जो लुप्त हो रहा हैं। इनमें जेडर, मूमल महेन्द्रा, काची गुड़लो, राणी कस्बाई व राणूजी शामिल हैं। इन बच्चो को सीखने पर इन्हें राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मंच प्रदान करने व इन्हें आगे लेजाये जाने का प्रयास किया जाएगा। इनमें कही बच्चे कुछ ही समय में इतने पारंगत हो गए हैं कि विदेशो में लोक संगीत में कार्यक्रम प्रस्तुत करने जा रहे कई मांगणियार गु्रप कुछ बच्चो को अपने साथ ले जा रहे हैं।

लोक संगीत का प्रशिक्षण देने वाले शिक्षक रसूल खान बताते हैं की बच्चों में भी अपने लोक संगीत को लेकर जूनून है और वे स्कूल के बाद यहाँ आकर सीखते हैं जिससे उनको खुद को सुकून मिलता है। वहीँ प्रशिक्षण लेने वाले एक छात्र एक सुंदर गीत सुनाकर ये बता दिया की वो भी इस कला में माहिर नहीं है।

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