जानिए, गोवर्धन पूजा से जुड़ी कहानी, विधि और महत्व

FirstIndia Correspondent Published Date 2018/11/01 04:51

नई दिल्ली। हिन्दू पंचांग के अनुसार गोवर्धन पूजा दिपावली के दूसरे दिन अर्थात कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाई जाती है। इस बार गोवर्धन पूजा 8 नवम्बर गुरुवार को पूजा की जाएगी। गोर्वधन की पूजा के अलावा लोग इस दिन 56 या 108 तरह के व्यंजन बनाकर, उसे भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित करते है।

गोवर्धन पर्वत से जुड़ी कहानी: 
मान्यताओं के अनुसार भगवान कृष्ण ने ब्रजवासियों को गोवर्धन पर्वत की पूजा करने की सलाह दी। एक बार जब माता यशोदा भगवान इंद्र की पूजा की तैयारी कर रही थी। तो उस समय कृष्ण ने माता यशोदा से पूछा कि वो इंद्र की पूजा क्यों कर रही है? तब माता यशोदा ने कृष्ण को समझाते हुए कहा कि, सारे गांव वाले और वो इंद्र भगवान की पूजा इसलिए करते है, जिससे बारिश अच्छी हो। अच्छी बारिश होने से फसल और घास की पैदावार होगी। जिससे गायों के लिए चारा और भोजन के लिए अन्न पैदा होगा। तब कृष्ण ने कहा फिर तो हमें इंद्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि गायों को वहां पर ही घास मिलती है। कृष्ण की इस बात को सुनकर माता यशोदा और बाकी के गांव वालों ने इंद्र भगवान की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा आरंभ कर दी। 

जब इंद्र ने देखा की लोग उनकी जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा कर रहे है, तो उन्हें क्रोध आया और उन्होंने मूसलाधार बारिश करना शुरू कर दिया। जिससे लोगों के घरों में पानी भर गया और उन्हें परेशानी की सामना करना पड़ा। इस पर वे सहायता के लिए कृष्ण के पास गये। तब कृष्ण ने लोगों रक्षा के लिए उन्होंने अपनी कनिष्ठा (सबसे छोटी अंगुली) पर गोवर्धन पर्वत को उठा लिया और सभी ब्रजवासी व पशु-पक्षी उसके नीचे आकर खड़े हो गये। भगवान कृष्ण ने एक सप्ताह तक गोवर्धन पर्वत को उठाये रखा। जब इंद्र को ज्ञात हुआ कि भगवान विष्णु ने कृष्ण के रूप में अवतार लिया है, तो उन्हें अपनी गलती का आभास हुआ और बारिश को रोक दिया। बारिश रुकने के बाद भगवान कृष्ण ने गोर्वधन पर्वत को नीचे रख दिया और ब्रजवासियों से हर वर्ष गोवर्धन पूजा करने का आदेश दिया।

गोवर्धन पूजा की विधि:
इस दिन प्रात: गाय के गोबर से गोवर्धन बनाया जाता है। अनेक स्थानों पर इसके मनुष्य के आकार का बनाकर फूलों से सजाया जाता है। शाम को गोवर्धन की पूजा की जाती है। पूजा में धूप, दीप, नैवेद्य, जल, फल, फूल, खील, बताशे का प्रयोग किया जाता है।

गोवर्धन पूजा में ओंगा (अपामार्ग) अनिवार्य रूप से रखा जाता है।

पूजा के बाद गोवर्धनजी के 7 परिक्रमाएं करते हुए जय बोला जाता है। परिक्रमा के समय एक व्यक्ति हाथ में जल का लोटा और खील (जौ) लेकर चलता है। व्यक्ति पानी की धारा गिराता हुआ खील बोते हुए परिक्रमा पूरी करता हैं।

गोवर्धनजी गोबर से लेटे हुए पुरुष के रूप में बनाए जाते हैं। इनकी नाभि के स्थान पर मिट्टी का दीपक रखा जाता है। फिर इसमें दूध, दही, गंगाजल, शहद, बताशे पूजा करते समय डाले जाते हैं और बाद में इसे प्रसाद के रूप में बांट दिया जाता हैं।

इस दिन चंद्र-दर्शन अशुभ माना जाता है। 

इस दिन प्रात:तेल मलकर स्नान करना चाहिए।

इस दिन संध्या के समय दैत्यराज बलि का पूजन भी किया जाता है।

गोवर्धन पर्वत भगवान के रूप में माने जाते हैं और इस दिन उनकी पूजा करने से धन, धान्य, संतान की वृद्धि होती है।

दस्तकार और कल-कारखानों में कार्य करने वाले कारीगर इस दिन भगवान विश्वकर्मा की पूजा करते है साथ ही सभी कल-कारखाने पूर्णत: बंद रहते हैं। घर पर कुटीर उद्योग चलाने वाले कारीगर भी काम नहीं करते। भगवान विश्वकर्मा, मशीनों एवं उपकरणों का दोपहर के समय पूजन किया जाता है।

गोवर्धन पूजा का महत्व: 

गोवर्धन पूजा में गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाती है। जो यह संदेश देता है कि हमारा सम्पूर्ण जीवन प्रकृति पर निर्भर करता है। इसलिए हमें प्रकृति का धन्यवाद देना चाहिए। इस दिन विशेष रुप से गाय माता की पूजा की जाती है। कहा जाता है कि इस दिन कोई दुखी है तो साल भर दुखी रहेगा। मनुष्य को इस दिन प्रसन्न होकर इस उत्सव को मनाना चाहिए। इस दिन स्नान से पूर्व तेला लगाना चाहिये। इससे आयु, आरोग्य की प्राप्ति होती है और दु:ख दारिद्र का नाश होता है। इस दिन जो शुद्ध भाव से भगवान के चरण में सादर समर्पित, संतुष्ट, प्रसन्न रहता है वह सालभर सुखी और समृद्ध रहता है।

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