अभिभावकों पर भारी पड़ता 'कमीशन का खेल'

Published Date 2018/06/02 07:47, Written by- FirstIndia Correspondent

टोंक। भले ही सरकार निजी स्कूलों द्वारा बच्चों पर थोपे जाने वाले खर्चाे पर अंकुश लगाने की बात कहती हो, लेकिन निजी स्कूलों की कपडों और बुकसेलर की दुकानों से सांठ-गाठ अभिभावकों पर भारी पडती नजर आती है। इससे अछूता टोंक जिला भी नही है। निजी स्कूल संचालकों की मनमानी इस कदर बढी हुई है, कि बच्चों को एक्जाम खत्म होते ही स्लीप पकडा दी जाती है। इसी दुकान से आपकों ड्रेस से लेकर कोर्स और अन्य सामग्री लेनी है।

स्कूल संचालक या 'शिक्षा माफिया'

छूट्टिया खत्म हुई नही कि अभिभावकों के चेहरों पर चिंता की लकीरें साफ दिखाई देने लगती है। ना चाहते हुये भी दुकानों से मिलीभगत कर बैठे स्कूल संचालकों की कमीशन की मार उन्हे झेलनी पडती है। एडमिशन से लेकर किताबे, ड्रेस खरीदने में उनकों अपनी जेबें ढिली करनी पडती है। बात अगर टोंक की करें तो यहां भी हालात प्रदेश के अन्य क्षेत्रों की तरह ही है। निजी स्कूल संस्थान सुविधाओं के नाम पर मनमानी फीस वसूलने के साथ ही अपनी फिक्स की गई दुकानों से किताबे और ड्रेस खरीदवाकर अभिभावकों को आर्थिक चुना लगा रहे है। किताबों पर अंकित मूल्य भी अभिभावकों के लिये सिरदर्द होते है, क्योंकि पतली-पतली किताबें 300 से लेकर 600 रूपये मे खरीदनी पडती है। यही कारण है लोग निजी स्कूल संचालको को शिक्षा माफिया कहने से भी नही चूकते।

दूसरी दुकानों पर नहीं मिलता कोर्स 

कमीशन की भेंट चढती अपनी खून-पसीने की कमाई के जाने से आक्रोशित अभिभावकों का तो यहां तक आरोप है कि एक ही दुकान से दर्जनों स्कूल अपना कमीशन फिक्स कर लेते है। बच्चों को उसी दुकान से सामग्री खरीदने को कहते है और मजबूरन अभिभावकों को दुगुने-तीगुने दामों पर पुस्तक और अन्य सामग्री खरीदनी पडती है।  हम आपकों बता दे निजी स्कूल संचालकों द्वारा बताई गई दुकानों की जगह अगर दूसरी दुकानों से खरीददारी करने अभिभावक कोशिश करते है तो उन्हे वहां ना तो स्कूल का कोर्स मिल पता है, और ना ही ड्रेस। जिससे थक-हारकर उन्हे स्कूल द्वारा बताई दुकान से ही खरीददारी करनी पडती है। 

 सरकार की बंदिशों का नहीं है असर 

अब आप खुद अंदाजा लगा सकते है, कि बुकसेलर से लेकर कपडों की दुकानदारों से कमीशन लेने वाले स्कूल संचालकों ने सरकार की बंदिशों के बावजूद किस तरह से अभिभावकों को लूटने के लिये हथकंडे तैयार कर रखे है।  एडमिशन मे 15 हजार से 20 हजार की वसूली और कमीशन की दुकान से शिक्षा सामग्री दिलवाने के बाद आये-दिन शिक्षण भ्रणम और परीक्षाओं के नाम पर मनमर्जी से राशि वसूली जाती है।  लोगों का कहना है कि सरकार अगर सरकारी स्कूलों मे व्यवस्थाओं मे इजाफा कर सरकारी शिक्षकों को नियमित शिक्षण कार्य करने के लिये पाबंद करे तो निजी स्कूलों मे अपने बच्चों को पढाने की बजाय अभिभावक अपने बच्चों को सरकारी स्कूल मे भेंजेंगे। लेकिन व्यवस्थाओं की कमी के चलते लगातार अभिभावकों पर दुकानों से स्कूलों को मिलने वाला कमीशन भारी पडता नजर आता है।

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