नियमों के जाल में उलझा "प्रोजेक्ट मरुस्थल"

FirstIndia Correspondent Published Date 2018/06/30 05:29

जैसलमेर। भारत को डिजीटल इंडिया बनाने को लेकर भले ही केन्द्र सरकार द्वारा बड़े बड़े दावे किये जाते हो और सूचनाओं के साथ सुविधाओं के ऑनलाईन उपयोग की नसीहत दी जाती हो। लेकिन सीमावर्ती जिले जैसलमेर के लिये आज भी मोबाईल नेटवर्क की सुविधा दूर की कौड़ी ही बनी हुई है। जी हां, आज सूचनाओं के विस्फोटक माहौल और संचार क्रांति के युग में भी सीमावर्ती जिले जैसलमेर के सैकडों गांव व ढाणियों में बसने वाले लोग दूरसंचार सेवाओं से लगभग वंचित है। 

उन्हें मोबाईल पर बात करने के लिये कई किलोमीटर दूर का सफर तय करना पडता है तो इंटरनेट सेवाएं आज भी उनकी पहुंच से दूर ही हैं। निजी मोबाईल नेटवर्क प्रदाताओं के लिये इन दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में सेवाएं पहुंचाना आर्थिक दृष्टि से फायदेमंद नहीं होने के चलते वे भी इन ग्रामीण इलाकों में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं। वहीं सरकार की दूरसंचार कंपनी बीएसएएनएल द्वारा इन इलाकों में मोबाईल नेटवर्क पहुंचाने को लेकर बनाये गये ‘‘प्रोजेक्ट मरुस्थल’’ को भी केन्द्र सरकार की तरफ से सकारात्मक पहल का इंतजार ही है।

प्रोजेक्ट मरुस्थल को अमलीजामा पहनाने के लिए एक व्यवहारिक अड़चन आ रही है। दरसल सरकारी कंपनी के नॉर्म्स के अनुसार टावर उन्ही गांवो में लगाए जा सकते है, जिनकी आबादी दो हजार से ज्यादा है। जबकि जैसलमेर जिले के अधिकांश दूरस्थ क्षेत्र में आबादी छितरी हुई भौगोलिक परिस्थितियों में निवास करती है। गांवो के पास आई ढाणियों में एक-दो अथवा तीन चार परिवार ही निवास करते है। वैसे अधिकांश लोग मुख्य गांव से दूर जाकर 3 से 10 किमी की बसावट में बसे हुए है। ऐसे में दूर- दूर इलाकों में टावर लगाकार सुविधा उपलब्ध करवाना पेचीदा है। इसी प्रोजेक्ट के तहत सीमवर्ती गावो घोटारू, जालूवाला, बोला, डिगा, हरिहार, डीयू में बीएसएनएल के टावर लगाने का प्रस्ताव भेजा है।  

जानकारी के अनुसार क्षेत्रीय सांसद कर्नल सोनाराम चौधरी द्वारा इन इलाकों में दूरसंचार सेवाओं को लेकर संसद में सवाल उठाया गया था जिसके बाद केन्द्र ने बीएसएनएल को इस संबंध में प्रस्ताव बनाकर भेजने के निर्देष दिये थे। बीएसएनएल जैसलमेर कार्यालय द्वारा तीन साल पहले ही इस आशय का प्रस्ताव बना कर भेज दिया गया लेकिन जैसलमेर जिले के ग्रामीण इलाकों में आबादी के छितरे रूप में निवास करने के चलते केन्द्र द्वारा इस प्रस्ताव को फिलहाल ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया है। केन्द्र सरकार का कहना है कि मोबाईल टावर लगाने के लिये उस गांव या ढाणी में कम से कम 2 हजार की आबादी होनी चाहिये लेकिन जैसलमेर जिले की भौगोलिक परिस्थितियां कुछ ऐसी है कि यहां लोग पशुपालन के चलते छोटी छोटी ढाणियों में निवास करते हैं जो कि आपस में 2 से 5 किलोमीटर की दूरियों में है। ऐसे में किसी एक स्थान पर 2 हजार की आबादी मिल पाना संभव नहीं हो पा रहा है। 

जैसलमेर बीएसएनएल के दूरसंचार अभियंता रमेशचन्द्र व्यास की मानें तो प्रोजेक्ट मरुस्थल पर विभाग की प्रत्येक बैठक में चर्चा होती है लेकिन केन्द्र सरकार से इस योजना को अबतक मंजूरी नहीं मिलने के चलते इस पर कोई काम नहीं हो पाया है। उन्होंने बताया कि इस संबंध में केन्द्र सरकार से लगातार पत्राचार किया जा रहा है और जैसे ही केन्द्र सरकार इस प्रोजेक्ट को मंजूरी देगा विभाग तत्काल इस पर कार्य आरम्भ कर देगा।
 

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