धारा 377: सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती नहीं देगी केंद्र सरकार

Published Date 2018/07/11 01:00,Updated 2018/07/11 01:02, Written by- FirstIndia Correspondent

नई दिल्ली। समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में रखा जा सकता है या नहीं, इस पर सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच में बुधवार को दूसरे दिन भी सुनवाई जारी है। सुनवाई के दौरान दोनों ही पक्ष अपनी-अपनी तरफ से दलीलें पेश कर रहे हैं। धारा 377 पर केंद्र सरकार ने बुधवार को कोई पक्ष न रखते हुए पूरा फैसला सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ दिया। केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता सबसे पहले अपनी बात रखी। तुषार मेहता ने केंद्र सरकार की ओर से इस मामले में हलफनामा पेश किया है। जिसमें उन्होंने जिक्र किया कि केंद्र सरकार ने इस पर सहमति जताई है कि धारा 377 पर सुप्रीम कोर्ट अपने विवेक से फैसला लें।

केंद्र सरकार की ओर से कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट बच्चों के खिलाफ हिंसा और शोषण को रोकना सुनिश्चित करें। तुषार मेहता ने अपील की कि ऐसा कुछ न कहा जाए जिससे गलत व्याख्या हो। केंद्र सरकार ने कहा कि समलैंगिकों के बीच शादी विवाह या लिव इन को लेकर सुप्रीम कोर्ट कोई फैसला ना दे। तुषार मेहता ने कहा कि पशुओं के साथ या सगे संबंधियों के साथ यौन संबंध बनाने की इजाजत नहीं होनी चाहिए। इस पर संविधान पीठ ने संकेत दिए कि दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति के आधार पर समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया जा सकता है।

सीजेआई दीपक मिश्रा ने कहा कि इस मामले को समलैंगिकता ही सीमित न रखकर वयस्कों के बीच सहमति से किए गए कार्य जैसी व्यापक बहस तक ले जाया जा सकता है। वहीं, जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि हम यौन व्यवहारों के बारे में नहीं कह रहे, हम ये चाहते हैं कि अगर दो गे मरीन ड्राइव पर एक-दूसरे का हाथ पकड़कर टहल रहे हैं तो उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए धारा-377 के तहत समलैंगिकता को अपराध माना था।

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