क्या है जल झुलनी एकादशी, क्यों निकला जाता है लड्डू गोपाल का डोला

Published Date 2017/09/02 01:42, Written by- FirstIndia Correspondent

कहा जाता है कि एकादशी से बढ़कर कोई व्रत नहीं है। एकादशी के दिन शरीर में जल की मात्र जितनी कम रहेगी, व्रत पूर्ण करने में उतनी ही अधिक सात्विकता रहेगी। जन्मष्टामी के बाद आने वाली एकादशी जलझूलनी एकादशी के नाम से जानी जाती है| एक दिन शाम होते ही मंदिरों में विराजमान भगवान के विग्रह चांदी, तांबे, पीतल के बने विमानों में बैठकर गंधीगर के टपरा पर ढोल नगाढ़ों और बैंड की भक्ति धुनों के बीच एकत्र होने लगते हैं। अधिकांश विमानों को श्रद्धालु कंधों पर लेकर चलते हैं।

मान्यता है कि वर्षा ऋतु में पानी गंदा हो जाता है। लेकिन एकादशी पर भगवान के जलाशयों में जल बिहार के बाद उसका पानी निर्मल होने लगता है। शोभायात्रा में सभी समाजों के मंदिरों के विमान निकलते है। कंधों पर विमान लेकर चलने से मूर्तियां झूलती है। ऐसे में एकादशी को जल झूलनी कहा जाता है। श्रीकृष्ण मंदिरों से धूमधाम के साथ राम रेवाड़ियां निकलेंगी। इस बार गुरु-शुक्रवार को दशमी तिथि हाेने के कारण असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है

शुक्रवार को दशमी सुबह 7.36 बजे तक रहेगी, इसके बाद एकादशी शुरू हो जाएगी, जो शनिवार को सुबह 9.38 बजे तक रहेगी। ऐसे में एकादशी पर्व शनिवार को सूर्योदय की तिथि के दिन ही मनाया जाएगा। वैसे भी व्रत अगली तिथि की विद्धा के दिन ही रखने की मान्यता है।

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