साल में सिर्फ दशहरे के दिन खुलता है ये मंदिर, रावण की विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर मुरादें मांगते हैं लोग

Published Date 2017/09/30 02:03,Updated 2017/09/30 02:19, Written by- FirstIndia Correspondent
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कानपुर। असत्य पर सत्य और बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक पर्व दशहरा पर आज दशानन रावण को देशभर में ​वध किया जाएगा, लेकिन महाज्ञानी रावण के ज्ञान को लेकर इससे पूर्व उसकी पूजा अर्चना भी जाती है। देशभर में भले ही रावण को बुराई का प्रतीक माना जाता हो, लेकिन उसके ज्ञान और महानता के कारण कुछ जगहों पर उसे पूजा भी जाता है। देश में ही एक जगह ऐसी भी है, जहां दशहरे के दिन रावण की विशेष पूजा की जाती है और वो भी उसके मंदिर में। खास बात ये है कि रावण का ये मंदिर पूरे साल में सिर्फ दशहरे के दिन ही खुलता है। 

उत्तर प्रदेश मे कानपुर के शिवाला इलाके में स्थित देश के एकलौते दशानन मंदिर में आज दशहरा के अवसर पर सुबह से ही रावण की पूजा अर्चना करने के लिए भक्त उमड़ रहे हैं। गौरतलब है कि दशानन का यह मंदिर साल में एक बार विजयादशमी के दिन ही खुलता है और लोग सुबह-सुबह यहां रावण की पूजा करते हैं। साथ ही श्रद्धालु अपने लिए मन्नतें मांगते हैं। इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1890 में हुआ था।

इस मंदिर का निर्माण होने के बाद से ही हर साल दशहरे के दिन यहां रावण की पूजा का क्रम लगातार जारी है। विजयदशमी के दिन इस मंदिर में पूरे विधि—विधान से रावण का दुग्ध स्नान और अभिषेक कर श्रंगार किया जाता है। उसके बाद पूजन के साथ रावण की स्तुति कर आरती की जाती है। लोग हर वर्ष इस मंदिर के खुलने का इंतजार करते है और मंदिर खुलने पर यहां पूजा अर्चना बड़े धूमधाम से करते हैं।

कानपुर में मौजूद रावण के इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि यहां मन्नत मांगने से लोगों के मन की मुरादें भी पूरी होती है और लोग इसी लिए यहां दशहरे पर रावण की विशेष पूजा करते हैं। यहां दशहरे के दिन ही रावण का जन्मदिन भी मनाया जाता है। बहुत कम लोग जानते होंगे कि रावण को जिस दिन राम के हाथों मोक्ष मिला, उसी दिन रावण पैदा भी हुआ था।

उल्लेखनीय है कि रावण की नाभि में ब्रह्म बाण लगने के बाद और रावण के धराशाही होने के बीच कालचक्र ने जो रचना की, उसने रावण को पूजने योग्य बना दिया। यह वह समय था, जब राम ने लक्ष्मण से कहा था कि रावण के पैरों की तरफ खड़े होकर सम्मान पूर्वक नीति ज्ञान की शिक्षा ग्रहण करो, क्योकि धरातल पर न कभी रावण के जैसा कोई ज्ञानी पैदा हुआ है और न कभी होगा। रावण का यही स्वरूप पूजनीय है और इसी स्वरुप को ध्यान में रखकर कानपुर में रावण के पूजन का विधान है।

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