EXCLUSIVE : नासूर बना नहरों का पानी

Published Date 2018/05/22 05:28,Updated 2018/05/22 08:00, Written by- FirstIndia Correspondent

बीकानेर। प्रदेश की नहरों में आ रहा प्रदूषित पानी अब पूरे इलाके के लिए नासूर बन गया है, जिसका कोई समाधान नजर नही आ रहा है। सरकारों के नाकाम रहने पर पंजाब के फैक्ट्री मालिक अब बेखौफ होते जा रहे हैं। पहले नहरों में आ रहा प्रदूषित पानी दिखने में साफ नजर आता था लेकिन अब औद्योगिक कचरा इस कदर बढ़ता जा रहा है कि नहरों का पानी काला नजर आने लगा है।

ताजा मामला पंजाब के बटाला क्षेत्र में शुगर मिल का शीरा सीधे व्यास नदी में डालने से जुड़ा है। जिसने नहरों का पानी इस कदर जहरीला हो गया है कि मछलियां और अन्य जलीय जीव खुद पानी से बाहर आकर मरने को मजबूर हो रहे हैं। हालांकि ये नजारा पंजाब में आम है। ठीक इसी तरह गन्दे पानी के हजारों नाले सतलुज और व्यास के स्रोतों में गिरते हैं। इन छोटे-छोटे जल स्त्रोतों का प्रदूषित पानी सतलुज और व्यास में मिल जाता है और आखिरकार आईजीएनपी, भाखड़ा और गंगनहर से होते हुए हमारे गिलास में पहुंचता है।

इस गन्दे पानी के सिर्फ रंग को मत देखिए, इसमें जो केमिकल हैं उनके नाम आपके होश उड़ा देंगे। खुद पंजाब पॉल्यूशन बोर्ड की रिपोर्ट कहती है कि पानी मे सेलेनियम, आर्सेनिक जैसे जहरीले तत्व घुले हैं जिन्होंने पंजाब की मालवा बेल्ट के बाद हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर को कॅन्सर का गढ़ बनाकर रख दिया है। यह बात आम आदमी भी जानता है लेकिन जानलेवा प्रदूषित पानी पीना अब उनकी नियति ही बन गया है।

ऐसा भी नहीं है कि लोग जहरीले पानी से बचाव के प्रयास नहीं कर रहे। हनुमानगढ़ की पूर्व उपजिला प्रमुख शबनम गोदारा ने अन्य लोगों के साथ मिलकर एनजीटी में भी गुहार लगाई लेकिन इसे सिस्टम की नाकामी कहें या सरकारों की संवेदनहीनता कि यह मामला पिछले चार साल से एनजीटी में ही लटका हुआ है। पंजाब के अधिकारी सुनवाई में आते नहीं हैं और खुद हमारी सरकार कोई प्रयास नहीं करती। अब तो हालत यह है कि संघर्ष करने के लिए चले कदम भी थकते से नजर आते हैं।

एनजीटी में सिर्फ तारीख मिल रही है और जिम्मेदार जैसे सोए हुए हैं। पानी से होने वाली मामूली बीमारियों की अब ज्यादा परवाह नहीं होती। दुख तब होता है जब कोई अपना कैंसर जैसी बीमारी से तिल तिलकर मरता है और व्यवस्था ऐसी कि जिम्मेदारी किसी की भी तय नहीं होती। लोगों को इंतजार है उस दिन का जब कोई जनप्रतिनिधि उनके दर्द को समझे और कैंसर ट्रेन को अपनी छाती पर झेलने के भार इस पूरे इलाके को न झेलना पड़े।

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