उद्देश्य से भटका 'ग्राम', कैसे होगी किसानों की आय दोगुनी?

Dinesh Kumar Dangi Published Date 2018/05/24 12:13

जयपुर। सरकार ने अन्नदाताओं की आय दोगुनी करने के लिए ग्लोबल एग्रीटेक मीट यानि 'ग्राम' जैसे आयोजन की शुरुआत की, लेकिन किसानों के सपने पूरे करने के दावे हकीकत से एकदम जुदा दिखाई दे रहे हैं। अब तक तीनों ग्राम में हुए 78 एमओयू में से सिर्फ 9 एमओयू ही धरातल पर उतरे हैं, जबकि 18 एमओयू अभी भी पाइपलाइन में है। बाकि 51 निवेशकों के बैरंग लौटने से अब बाकी निवेश की आने की संभावना ना के बराबर है। यानि 5957.22 करोड़ रुपए के एमओयू में से सिर्फ 2464.37 करोड़ रुपए निवेशकों ने निवेश किए हैं।

जी हां, ये बिल्कुल सच है कि मेहनतकश किसानों के लिए सियासी दल और सियासतदार सदन से लेकर सड़क तक खूब हो—हल्ला मचाते हैं, लेकिन जब बात उनकी फसलों के उचित दाम दिलाने की हो या फिर समर्थन मूल्य की, तो सब खामोशी धारण कर लेते हैं। राजस्थान सरकार ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के किसानों की आय डबल करने के मकसद से ग्लोबल एग्रीटेक मीट जैसे भव्य आयोजन का आगाज किया। इसके तहत जयपुर, कोटा और उदयपुर में ग्राम का आयोजन किया गया।

सरकार ने दावा किया कि ग्राम में निवेशकों के साथ हजारों करोड़ो रुपए के एमओयू करके किसानों की आय डबल करने के प्रयास किए जाएंगे, लेकिन तीनों ग्राम में हुए एमओयू को खंगाला जाए तो दावों का दम निकलता नजर आ रहा है। अब तक के ग्राम में हुए 78 एमओयू में से सिर्फ 9 ही धरातल पर उतर पाए। 18 अभी भी फाइलों में चल रहे हैं, जबकि 51 एमओयू तो निवेशकों के लौटने से सिर्फ कागजों में ही घूम रहे हैं। बावजूद इसके कृषि विभाग के मुखिया दावों के बजाय अब जितने हुए उन्हीं से शेखी बघारने में जुटे हैं।

जयपुर में हुए ग्राम में 38, कोटा में 22 और उदयपुर में 18 एमओयू हुए थे। ये एमओयू टोटल 5957.22 करोड़ रुपए के हुए थे, जिसमें सिर्फ 27 निवेशकों ने 2464.37 करोड़ रुपए निवेश कृषि सेक्टर में राजस्थान में निवेश किए। दरअसल, एमओयू को लेकर सरकार ने कड़े प्रयास नहीं किए, जिससे निवेशकों को लैंड देने और बैंकों से फाइनेंस कराने में दिक्कत हुई।

विभाग के मुखिया ने अपने स्तर पर कईं बार निवेशकों के साथ बैठकें करते हुए उनकी दिक्कतें दूर करने का प्रयास किया, लेकिन रेवन्यू और अन्य विभागों से तालमेल नहीं बैठने से निवेशकों की समस्याएं नहीं सुलझी। लिहाजा 51 निवेशकों ने एमओयू को लेकर अब विभाग से बातचीत करना ही बंद कर दिया है।

अगर तमाम एमओयू धरातल वक्त पर उतरते तो यकीनन अन्नदाताओं की किस्मत बदलती। अब भी सरकारी कारिन्दें चाहे तो निवेशकों की बेरुखी दूर करके किसानों को फायदा पहुंचा सकते हैं। लेकिन चुनावी साल में अब सबका ध्यान टिकट और फिर जीत के जतन करने में लग गया है।

पहले ग्राम में सारा फोकस सरकार का सिर्फ निवेश पर था, लेकिन बाद में हुए ग्राम में सरकार का ध्यान एमओयू से हट गया, जिसके चलते एमओयू लगातार घटते गए। अब ग्राम का आयोजन कह सकते हैं कि सिर्फ किसानों के सैर—सपाटे तक सीमित हो गया है। जोधपुर ग्राम के रद्द होने के पीछे निवेशकों की बेरुखी भी माना जा सकता है, लेकिन यह तय है कि अन्नदाता कि किस्मत में संघर्ष करना ही लिखा है।

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