बृजभूमि में लोकप्रिय गोवर्धन गिरधारी, इस दिन होगी पूजा

FirstIndia Correspondent Published Date 2018/11/01 05:58

जयपुर। कृष्ण, मनमोहक छवि वाला सबको अपनी ओर आकृषित करने वाले श्याम बृजवासियों के बड़े ही दुलारे हैं। वैसे तो राधे-कृष्ण को क्या देश और क्या विदेश उसके नाम की मस्ती में तो सब झूम उठते हैं। लेकिन आज हम कृष्ण की बात इसलिए कर रहे हैं क्योंकि दीपो का त्यैौहार दीपावली आ गया है। दीपावली को कई जगहों पर दिवाली भी कहा जाता है। लेकिन खासतैौर पर तमिलनाडू में इसे सभी दीपावली के नाम से जानते हैं। सबसे खास बात तमिलनाडू में दीपावली सुबह के करीब 4 बजे से 6 बजे के बची मनाई जाती है जबकि देश के बाकी हिस्सों में शाम के समय दिवाली पूजन होता है। कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को अन्नकूट-गोवर्धन पूजा की जाती है। 

दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजन किया जाता है। कहते हैं जब कन्हैया धरती पर आए थे तो उन्होंने यादव कुल में वृज में जन्म लिया। यहां के लोग पहले अच्छी वर्षा हो इसके लिए इन्द्र देवता की पूजा करते थे। लेकिन जब कृष्ण इस धरा पर आए तो उन्होंने भगवान गिरिराज की पूजा शुरु करवाई। कृष्ण के कहने पर वृजवासी जब पूजा करने लगे तो उन्हें गोवर्धन में कृष्ण का ही स्वरुप नज़र आने लगा। लोग कृष्ण को भगवान मानने लगे। भगवान कृष्ण ने वृजभूमि पर अपनी लीलाएं की। इसलिए वृजवासी राधे-कृष्ण को सबसे प्रिय मानते हैं।

बतादें कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को अन्नकूट-गोवर्धन पूजा की जाती है। दीपावली की तरह इसमें भी दीपोत्सव का विधान है। इस बार गोवर्धन पूजा दिवाली के दूसरे दिन यानि 8 नवंबर को होगी। कहते हैं गुजरात, महाराष्ट्र राज्यों में इसी दिन से नव वर्ष की शुरूआत होती है। यह वैष्णवों का मुख्य पर्व है और इसका आयोजन कृष्ण मन्दिरों एंव विष्णु मन्दिरों और आस्तकि गृहस्थों के घर में किया जाता है। यह पर्व वृज भूमि में अधिक लोकप्रिय है। इस पर्व को दो भागों में विभक्त किया गया है।इस दिन घर के आंगन में गोबर से गोवर्धन का चित्र बनाकर उसकी पूजा रोली, चावल, खीर, बताशे, चावल, जल, दूध, पान, केसर, पुष्प आदि से दीपक जलाने के बाद की जाती है। गायों को स्नानादि कराकर उन्हें सुसज्जित कर उनकी पूजा करनी चाहिए । गायों को मिष्ठान खिलाकर उनकी आरती कर परिक्रमा भी करनी चाहिए।

इस त्यैौहार को अन्नकुट के नाम से भी जाना जाता है अन्नकूट शब्द का अर्थ होता है अन्न का समूह। विभिन्न प्रकार के अन्न को समर्पित और वितरित करने के कारण ही इस उत्सव या पर्व का नाम अन्नकूट पड़ा है। इस दिन अन्नकूट के रूप में अन्न और शाक-पक्वानों को भगवान को अर्पित किया जाता है। अन्नकूट और गोवर्धन की यह पूजा आज भी कृष्ण और बिष्णु मन्दिरों में बहुत ही उत्साह से की जाती है।

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