रथयात्रा के द्वारा भक्तों को दर्शन देने खुद खुद चलकर आए भगवान जगन्नाथ

Published Date 2017/06/25 16:11, Written by- FirstIndia Correspondent

शनिवार की शाम भगवान जगन्नाथ स्वामी एकांतवास से लौट आए है| आपको बता दे 15 दिन पहले यानि 9 जून को गर्भगृह में गए प्रभु श्री हरि एकांतवास के जब लौटे तो भक्त भाव विह्वल हो गए। जगन्नाथपुर मंदिर में शाम में जैसे ही मंदिर के पट खुले, भगवान के दर्शन कर श्रद्धालु निहाल हो गए। अवसर था  भगवान जगन्नाथ के नेत्रदान अनुष्ठान का। गर्भगृह से बाहर निकले प्रभु के विग्रह को देख भक्त जयकारे लगाने लगे। जगन्नाथपुर मंदिर जगन्नाथ स्वामी के मंगल गान से गूंज उठा। शाम पांच बजे गर्भगृह से बाहर आने के बाद मुख्य पुजारी ब्रजभूषण नाथ मिश्रा ने जगन्नाथ भगवान के नेत्रदान का अनुष्ठान संपन्न कराया।

 


वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विद्वान पुरोहितों ने नेत्रदान कराया। इसके बाद शाम पांच बजे से श्रद्धालुओं के लिए विग्रहों का दर्शन सुलभ हुआ। इसके बाद 108 दीपों से भगवान श्री जगन्नाथ, सुभद्रा एवं बलराम की आरती उतारी गयी। इस मौके पर मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। रात की आरती के बाद भगवान जगन्नाथ, बलराम एवं सुभद्रा शयन करने चले गए।  नेत्रदान अनुष्ठान में एचईसी के सीएमडी अभिजीत घोष, सांसद रामटहल चौधरी, पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय, जगदीश महंती, रामेश्वर पाढ़ी, सरयू नाथ सिंह, पंचानन नाथ सिंह, मनोज तिवारी, सुरेंद्र तिवारी, चंद्रकांत रायपत, ज्ञानप्रकाश बुधिया, रामअवतार नारसरिया, चितरंजन नाथ शाहदेव, मेधा उरांव समेत सैकड़ों भक्तों की भागीदारी रही।

 


भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा से बंग समुदाय की कई लोक परंपराएं जुड़ी हुई हैं। रथयात्रा के दिन से शुभ कार्य की शुरुआत हो जाती है। एक प्रचलित विश्वास है कि भगवान इस दिन भक्तों से मिलने निकलेंगे, तो उनका मुंहमांगा कुछ-न-कुछ देकर ही जाएंगे। बंगाल, उड़ीसा व जहां भी कृष्णभक्ति का प्रभाव है, वहां रथयात्रा के दिन से नई शुरुआत की जाती है। चाहे खेतों में फसलों की रोपाई हो, या दुर्गा पूजा के लिए मां की प्रतिमा का ढांचा बांधने का काम। यह विश्वास भी है कि भगवान के रथ की डोर को खींचने से मनुष्य को जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है।

 


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