26/11 : गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच दिल पर नश्तर चला रही थी 'प्लीज बचाओ' की आवाजें

Published Date 2017/11/26 08:19,Updated 2017/11/26 08:52, Written by- FirstIndia Correspondent
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बयाना (भरतपुर)। '9 साल पहले मुंबई पर हुए 26/11 के हमले ने देश को हिलाकर रख दिया था। आज भी मैं उसे 60 घंटे का एक दिन मानता हूं, क्योंकि बच्चे जवान बुजुर्गों की चित्कार हर जुबां की आवाज आ रही थी, 'प्लीज बचाओ' गोलियों की तड़तड़ाहट की ऐसी आवाज आ रही थी, मानो कोई मेरे अपनों की छाती पर गोलियां बरसा रहा है। दिल कांप नहीं रहा था, बल्कि आग की तरह सुलग रहा था। उन दहशतगर्दों के लिए जो कि न तो हमको दिखाई दे रहे थे और न ही हमको पता था कि कहां किस ओर छिपकर गोलियां बरसा रहे हैं, लेकिन वो हमको देख पा रहे थे।'

दरअसल, ये कहना है उस कमांडो का, जो 26/11 के हमले में चले रेस्क्यू ऑपरेशन में शामिल था। मुंबई पर 26 नवंबर 2008 के हदन हुए हमले को भला कौन भूला सकता है। जिस तरह 10 हमलावरों ने मुंबई को खून से रंग दिया था, और इसमें 167 लोग मारे गए थे। इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा बल की ओर से चले रेस्क्यू ऑपरेशन ब्लैक टोरनेडो में सम्मिलित रहे बयाना के कमांडो केशव गुर्जर की आंखें उस समय की घटना बताते हुए लाल हो उठी।

केशव ने कहा कि एक कमांडो देश के लिए जितना लड़ता है, उतने ही उसके दिल के टुकड़े उस वक्त हो जाते हैं, जब उसके सामने उसके साथी शहीद होते हैं। उन लोगों को मरता देखता है। कमांडो ने इस बात पर दु:ख जताया कि इतनी बड़ी घटना के बाद भी सिस्टम में जो सुधार होना चाहिए, वह नहीं हुआ। सेना को पूरी तरह से राजनीति से दूर रखा जाना चाहिए।

कमांडो केशव फौजी ने बताया कि आज भी ब्रिटिश हुकूमत की तरह आर्मी में परंपरा बनी हुई है। जो फौजी दुश्मन से लड़ने के लिए सेना में भर्ती होते हैं, उसे किसी अफसर के सहायक के रूप में काम करना पड़ता है। अंग्रेजों के समय अधिकारी अंग्रेज थे और भारतीय जवानों को दुरुपयोग करते थे, लेकिन अब समय के साथ सिस्टम में भी बदलाव लाने की जरूरत है।

केशव ने कहा कि सेना के कामकाज में राजनीतिक हस्तक्षेप को हटाया जाना बेहद जरूरी है। गौरतलब है कि सेना से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के बाद केशव किसानों की समस्या, सामाजिक कुरीतियों और इन दिनों संत हरिगिरी के शराबबंदी अभियान से जुड़े हुए हैं।

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