न्याय आपके द्वारा अभियान में लगातार तीसरी बार अव्वल रहा झालावाड़

Published Date 2018/07/11 08:48,Updated 2018/07/12 01:16, Written by- Naresh Sharma

जयपुर। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का कर्मक्षेत्र झालावाड़ न्याय आपके द्वारा अभियान में लगातार तीसरी बार अव्वल रहा है। एक मई से 30 जून तक आयोजित इस अभियान में इस साल करीब 48 लाख मामलों का निस्तारण हुआ। इनमें से सबसे ज्यादा चार लाख 71 हजार मामले झालावाड़ के थे। वर्ष 2016 व 2017 में भी झालावाड़ ने ही बाजी मारी थी। 

गौरतलब है कि राज्य सरकार की महत्वपूर्ण फ्लेगशिप योजना राजस्व लोक अदालत अभियान, न्याय आपके द्वार 2018 का आयोजन एक मई से शुरू किया गया । राज्य में सभी ग्राम पंचायत मुख्यालयों पर शिविर आयोजित किए जा रहे हैं। 30 जून तक चले इस कार्यक्रम में 15 विभागों की भागीदारी रही। राजस्व विभाग को इस अभियान का नोडल विभाग बनाया गया है। अभियान के तहत राजस्व लोक अदालतों में राजस्थान काश्तकार अधिनियम 1955 की धारा 53, 88, 188 एवं 183 के तहत दर्ज मुकदमों एवं इजराय के प्रार्थना पत्रों पर कार्यवाही की गई। 

इसी तरह पत्थरगढ़ी एवं सीमाज्ञान, भू राजस्व अधिनियम की धारा 136 के तहत लम्बित प्रार्थना पत्र एवं नामांतरकरण तथा धारा 91 की कार्यवाही के संबंध में लम्बित अपील, विभिन्न तरह के लम्बित वाद एवं प्रार्थना पत्रों के परिपे्रक्ष्य में अन्य प्रकार के प्रकरण, बंद रास्ते को खुलवाने, सकड़े रास्तों का अतिक्रमण हटाने, नए रास्ते दर्ज कराने, रास्ता संबंधी समस्याओं का निराकरण, पारिवारिक कृषि भूमि का सहमति से विभाजन, लम्बित गैर खातेदारी के प्रकरणों में खातेदारी दिया जाना, राजस्व अभिलेखों में लिपिकीय त्रुटी का शुद्धिकरण एवं नवीन राजस्व ग्रामों के प्रस्ताव आदि कार्य अभियान के दौरान किए जा रहे हैं। 

मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे की ग्रामोत्थान की मंशा से आयोजित न्याय आपके द्वार अभियान ने गांवों की समस्याओं का हमेशा-हमेशा के लिए निराकरण करते हुए पारिवारिक एवं सामाजिक सौहार्द की बहाली की दिशा में ऎतिहासिक उपलब्धियां हासिल की है। बरसों से अटके कामों का हाथों-हाथ निस्तारण हो रहा है। भीषण गर्मी के दौर में भी आम ग्रामीणों के लिए ये शिविर उनकी जिन्दगी भर के लिए राहत की फुहारें बरसाकर जिन्दगी में शान्ति और आनन्द की बहारें लाने का सुकून देने वाले सिद्ध हुए है। इन शिविरों में ऐसे-ऐसे काम हुए हैं,  जिन्हें कर पाना आसान नहीं था,  किन्तु शासन-प्रशासन की आत्मीय भागीदारी से सफलता मिली है।

52 साल बाद भगवान के नाम दर्ज हुई जमीन :
राजसमन्द पंचायत समिति के राज्यावास में 52 साल बाद भगवान भैरवनाथ की भूमि वास्तविक स्वामी भैरवजी के नाम हुई। नेकदिल भक्तों के आपसी राजीनामे से भगवान के नाम प्रदत्त भूमि पाँच दशकों बाद भगवान के खाते में दर्ज होने का यह अनूठा मामला है जो अनन्य श्रद्धा, न्याय और समर्पण का त्रिवेणी संदेश देता नज़र आता है। इस सारे मामले के पीछे रोचक कहानी है। इसके अनुसार दशकों पहले राज्यावास ग्राम पंचायत अन्तर्गत फतहनगर गांव में भैरूजी के स्थान के लिए भैरूजी के नाम पर फतहनगर ठिकाने की ओर से 5 बीघा 4 बिस्वा भूमि सेवा-पूजा के लिए दी गई। 

श्री भैरूजी मन्दिर की सेवा-पूजा परंपरा से कुमावत और गाड़री समाज के भक्तगत करते आ रहे हैं। यह क्रम लम्बे समय से चला आ रहा था कि इस बीच सन् 1966 में सेटलमेंट के समय भूमि पर भैरूजी का नाम हट गया और उसकी जगह यह जमीन दोनों समाजों के पुजारियों के वारिसों के नाम चढ़ गई और रिकार्र्ड में भैरूजी की बजाय वे खातेदार के रूप में दर्ज हो गए। 

कालान्तर में दोनों समाजों के पुजारियों का कुनबा बढ़ता रहा। इसके फलस्वरूप विरासत से बहन-बेटियों व अन्य सदस्यों की बढ़ोतरी की वजह से जमीन को लेकर आपसी मनमुटाव और झगड़े होने लगे। समझाइश के बाद अभियान में पुजारियों के परिवारजन समूह के रूप में आए और अपनी खातेदारी समाप्त कर भैरूजी के नाम वापिस खातेदारी दर्ज करा दी।

चार लोगों को 29 वर्ष बाद मिले सही नाम :
दूदू तहसील के तहत ग्राम गुढा बैरसल में बाबू खां, नवाब खां, सराज व सैयद परवेज हकीम के लिए 29 वर्षों बाद राजस्व रिकॉर्ड में अपना सही नाम दर्ज कराने का सुअवसर बन गया। 

शिविर में बाबू खां, नवाब खां, सराज व सैयद परवेज हकीम ने बताया कि वर्षों पूर्व विरासत के नामांतरण में उनके घर पर प्रचलित नाम दर्ज हो गये थे जो वर्तमान में हमारे रिकॉर्ड में दर्ज सही नामों से मेल नही खाते है। इसके कारण हमे काफी परेशानी का भी सामना करना पड़ रहा है। इस पर कैम्प प्रभारी ने सुनवाई करते हुए मौके पर मौजूद राजस्व टीम को धारा 88 में प्रकरण तैयार कर प्रस्तुत करने के निर्देश दिये। शिविर में हाथों हाथ जांच के बाद बाबू खां, नवाब खां, सराज व सैयद परवेज हकीम के सही नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज कर डिक्री जारी कर दी गई।

60 वर्ष बाद मिले खातेदारी अधिकार :
दूदू तहसील के ही गाडोता में एक प्रकरण में परिवादियों को 60 वर्ष बाद खातेदारी अधिकार मिले। इसी तरह एक महिला को बीस साल बाद सही नाम मिला। सुवादेवी ने परिवाद प्रस्तुत करते हुए बताया कि उसके पति की विरासत के नामांतरण में उसका नाम सरजू दर्ज हो गया, जो गलत है। शिविर में राजस्व रिकॉर्ड में सही नाम सुवादेवी धर्म पत्नी बालू राम दर्ज कर उसे बीस वर्ष बाद सही नाम की सौगात दी गई।

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