सुनहरी कोठी के सुनहरे इतिहास पर भारी वर्तमान, कई सरकारें बदली पर नहीं बदले दिन-मान

Ravish Tailor Published Date 2018/03/06 01:30

टोंक। टोंक मे पर्यटन की अपार संभावनाओं के बावजूद यहां पर विरासतों को सहेजने और उनका प्रचार-प्रसार करने मे जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों का रवैया उदासीन ही है। यहां पर पर्यटन के रूप मे आने वाला राजस्व शून्य है। कुछ पर्यटन सभावनाओं को समेटे टोंक की सुनहरी कोठी अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है।

टोंक के नजरबाग क्षेत्र में स्थित सुनहरी कोठी का निर्माण जिस शानो-शौकत से करवाया गया था, उसका एक उद्देश्य यह भी जरूर रहा होगा कि भविष्य में इसे देखकर नवाबी काल की यादें सुनहरी हो जाए। लेकिन आज यहां पर हालात बद से बदतर हो चले हैं। यही कारण है कि इसके आस-पास जहां गदंगी के ढेर लगे रहते हैं, वहीं असामाजिक तत्वों की मौजूदगी हमेशा ही इसकी सुरक्षा के प्रति संदेह पैदा करती है।

पिछले 15 सालों मे तीन बार पहले ही पर्यटन और पुरातत्व विभाग की अनदेखी के चलते इस विश्वस्तरीय कोठी के लिये कोई पर्यटक नहीं जुटा पाये और दीवार ऊंची करवाने के बाद स्थानीय पर्यटक और यहां वाशिंदे इसे देख नहीं पायेंगे।

दअरसल, राजस्थान का लखनऊ और एकमात्र नवाबों की नगरी कहे जाने वाले शहर टोंक के पहले नवाब अमीरूद्दोला के शासन काल मे शुरू हुआ सुनहरी कोठी का निर्माण 1824 में जाकर पूरा हुआ था। इसकी दीवारों और मेहराबों पर सोने की नक्काशी से लेकर बेशकीमती रत्न जड़ित काम उसकी शोभा बढाते रहे, लेकिन जितना सुनहरा इस सुनहरी कोठी के निर्माण का इतिहास रहा है, उससे कई बुरा हाल शासन और प्रशासन की लापरवाही के चलते आज है।

यही कारण है विश्वस्तरीय पहचान होने के बावजूद यह बदहाली का शिकार हो रही है। जानकारों की मानें तो इस कोठी की मरम्मत के लिये कई बार बजट स्वीकृत भी हुआ है, लेकिन सुरक्षा दीवार के निर्माण मे ही पूरा बजट खपा दिया जाता रहा है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर सूबे की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की ओर से जहां विदेश नीति के जरिये देश-प्रदेश मे रोजगार और पर्यटन को बढ़ावा देने के प्रयास किए जा रहे हैं, वहीं टोंक मे नवाबी काल के सुनहरे पन्नों की गवाह सुनहरी कोठी की वर्तमान में जीर्ण-शीर्ण हालत और उपेक्षा कई दशकों से चली आ रही है। सरकारें और प्रशासन बदलते रहे, लेकिन नहीं बदली तो इस कोठी दुर्दशा की कहानी। वहीं पिछले 15 सालों मे लाखों का बजट स्वीकृत खर्च होने के बावजूद आज कोठी की हालत मे रत्तिभर भी सुधार नहीं हुआ है।

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