पायलट परिवार की सियासी विरासत, पिता नहीं बन पाये पीसीसी चीफ पुत्र ने कर दिखाया

FirstIndia Correspondent Published Date 2018/06/11 08:02

जयपुर (योगेश शर्मा)। पिता के पद्चिन्हों पर बढ़कर राजनीति के शीर्ष तक पहुंचना किसी सपने से कम नहीं है। विरासत में मिली सियासत की राह को चुनकर सचिन पायलट ने अपना मुकाम हासिल किया है। देश के कद्दावर राजनेता स्वर्गीय राजेश पायलट के पुत्र सचिन पायलट को राजनीति विरासत में मिली। पिता की असमय मृत्यु ने सचिन पायलट को किशोरावस्था में ही आत्मविश्वासी बना दिया। माता रमा पायलट के बाद सचिन पायलट ने पिता के कदमों पर चलते हुये संसद में प्रवेश किया। पिता की तरह दौसा उनकी पहली सियासी कर्मस्थली बना। पूर्व केन्द्रीय मंत्री सचिन पायलट आज प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष हैं। फर्स्ट इंडिया के जरिये दिखाते हैं पिता राजेश पायलट की पुण्यतिथि पर उनकी विरासत को लेकर खास राजनीतिक पेशकश...

सियासी पारी को विरासत में संजोना आसान काम नहीं है। विरासत जब राजेश पायलट की हो तो उसे उस लेवल पर संभाल पाना वाकई आसान नहीं कहा जा सकता, लेकिन सचिन पायलट अपवाद है। उन्होंने पिता के नाम को आगे ही नहीं, बढ़ाया बल्कि चमकाया भी है। सचिन पायलट आज राजस्थान की कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष हैं। सबसे युवा अध्यक्ष के तौर पर पीसीसी अध्यक्ष के रुप में उनकी ताजपोशी हुई थी। विरासत की कहानी को कहने से पहले हम पहले बात करते हैं राजेश पायलट की।

गगनचुंबी आसमां में हवाई जहाज उड़ाने वाले राजेश्वर सिंह ने कभी सोचा नहीं था वे एक दिन राजेश पायलट के तौर पर सियासी बुलंदियों को भी छुएंगे। मगर जब दोस्त राजीव गांधी जैसा हो तब कुछ संभव था। देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पुत्र राजीव गांधी भी बतौर पायलट हवाई जहाज उड़ाते थे। नीले गगन में ही उनकी और राजेश पायलट की दोस्ती परवान चढ़ी। उन्होंने ही अपनी माता इंदिरा को नाम सुझाया राजेश पायलट का, फिर क्या राजेश पायलट उतर आये राजनीति में और 1980 के लोकसभा चुनावों में भरतपुर से संसद में पहुंचने का अवसर मिला। आइये अब बताते है स्वर्गीय राजेश पायलट की शख्सियत के बारे में...

यादों के झरोखों में स्वर्गीय राजेश पायलट :
- यूपी में दिल्ली के समीप वैदपुरा के किसान गुर्जर परिवार में जन्मे राजेश पायलट
- भरतपुर से पहला चुनाव जीता लेकिन कर्मस्थली बनाया दौसा को
- दौसा को देश के राजनीतिक मानचित्र पर पहचान दिलाई
- 1980 में भरतपुर से सांसद बने ,इसके बाद दौसा से 5लोकसभा चुनाव जीते 
- राजीव गांधी की सरकार में अहम ओहदों पर रहे
- भूतल परिवहन,सूचना प्रसारण,गृह महकमें को संभाला
- राजीव गांधी के सूचना क्रांति के ड्रीम प्रोजेक्ट को सफल बनाया 
- गृह रक्षा राज्यमंत्री के तौर पर कश्मीर समस्या समाधान पर काम किया
- देश के डाक घरों को अत्याधुनिक बनाने में योगदान अविस्मरणीय था
- कांग्रेस संगठन में आंतरिक लोकतंत्र की आवाज बुलंद की 
- सरल, सहज ह्र्दय के धनी थे राजेश पायलट 
- इतने बड़े नेता थे लेकिन छोटे से छोटे कार्यकर्ता का रखते थे मान
- कार्यकर्ता और समर्थकों के नाम तो जैसे उन्हें रटे थे
- देहात की राजनीति उन्हें प्रिय थे
- साल 2000 के 11जून को दौसा के समीप सड़क दुर्घटना में निधन

राजेश पायलट को लेकर दौसा की जमीं पर अनेकों किवंदतियां हैं। निधन से ठीक पहले उन्होंने दौसा से आखिरी चुनाव लड़ा था। बेहद कम अंतर से उन्होंने यह चुनाव जीता। लेकिन यहां के लोगों में उनके उस चुनाव की स्मृति जिंदा हैं। उस चुनाव में राजेश पायलट के चुनाव एंजेट थे पूर्व मंत्री चंद्रशेखर शर्मा। मतदान हो चुका था, लेकिन अति संवेदनशील क्षेत्रों में कुछ जगह तनाव के कारण री—पोल की घोषणा हुई। चूंकि राजेश पायलट देशव्यापी नेता थे, उन्हें दूसरी जगह भी चुनाव प्रचार के लिये जाना था, उन्होंने शर्मा और अपने साथियों से कहा कि वे री—पोल को संभाले मैं पार्टी के प्रति अन्य दायित्व निभाने के लिये दूसरे राज्य में प्रचार के लिये जा रहा हूं। यह कार्यक्रम तय है, सबने समझाया कि इस चुनाव में बेहद कड़ा मुकाबला है, आपका रुकना जरुरी है। लेकिन राजेश पायलट नहीं माने और चंद्रशेखर शर्मा और उनकी टीम पर भरोसा जताते हुये चल दिये। बाद में परिणामों में राजेश पायलट को जहां री—पोल हुये वहां से जीत मिली। लेकिन घटनाक्रम ने यह जाहिर कर दिया कि उनका अपने कार्यकर्ताओं पर वि़श्वास अटूट था। भले कितना ही संकट का वक्त हो।

पायलट परिवार के लिये सदैव दौसा अहम रहा है। पायलट को दौसा और यहां के लोगों से इतना लगाव था कि वे लगातार पांच लोकसभा चुनाव दौसा से जीते। कांग्रेस के कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि अन्य दलों के नेताओं से राजेश पायलट के आत्मीय सम्बंध रहे। उनके हर चुनाव में राजीव गांधी और सोनिया गांधी ने दौसा का रुख किया और चुनावी सभाएं की, यह भी एक संयोग है। अपने निर्वाचन क्षेत्र दौसा की धरती पर ही उन्होंने अंतिम सांस ली। कहा जाता है कि उस समय दौसा में शायद ही किसी घर में चूल्हा जला हो। असमय निधन से पायलट परिवार पर वज्रपात हुआ, लेकिन साहसी परिवार ने आगे चलकर विरासत को संभाला। पत्नी रमा पायलट पहले से ही राजनीति में सक्रिय थीं, बाद में पुत्र सचिन पायलट भी सियासत केे रण में कूद आये। पत्नी रमा पायलट और फिर पुत्र सचिन पायलट ने आगे चलकर विरासत संभाली।

पिता राजेश पायलट की विरासत सचिन पायलट को असमय तौर पर मिली, लेकिन वे दौसा कि सियासी कर्मभूमि से अंजान नहीं थे। सचिन पायलट ने बाल्यकाल में ही पिता को चुनाव लड़ते देखा था, वह भी अपनी बहन सारिका के साथ चुनावी रैलियों में अपने पिता और कांग्रेस के लिये वोट मांगते नजर आते थे। नन्हा सचिन कभी—कभी अपनी बहिन के साथ मंच पर बैठा नजर आता था। तब अंदाजा नहीं था कि एक दिन वह खुद देश की सबसे बड़ी पंचायत में दौसा का ही नेतृत्व करेगा। विरासत में मिली सियासी सीख को उन्होंने अभी तक बखूबी संभाला है। दौसा से पहला चुनाव लड़कर वह पहली बार में भी सबसे युवा सांसद कहलाये। वो भी 26 साल की आयु में सांसद बनकर। बाद में परिसीमन ने पायलट परिवार को दौसा से बिछुड़ा दिया और सचिन पायलट ने अजमेर से लोकसभा का चुनाव लड़ा।

यूपीए की मनमोहन सरकार में पायलट केन्द्रीय मंत्री बने और कॉरपोरेट अफेयर्स का स्वतंत्र महकमा संभाला। हालांकि पिछले लोकसभा चुनाव वे अजमेर से पराजित हो गये थे, लेकिन उपचुनाव में डॉ. रघु शर्मा का दांव चलकर उन्होंने अजमेर में फिर कांग्रेस पताका लहरा दी। आज वे कांग्रेस आलाकमन के भरोसेमंद और प्रदेश कांग्रेस के मुखिया है। पायलट परिवार के जम्मू कश्मीर के अब्दुल्ला परिवार से रिश्तेदारी है। सचिन पायलट दामाद है फारुख अब्दुल्ला के। उनका विवाह हुआ जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कांफ्रेंस के लीड़र फारुख अब्दुल्ला की पुत्री सारा से। सारा बहन है जम्मू कश्मीर के  पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की।

देश की सियासत में अब्दुल्ला परिवार को अलग स्थान प्राप्त है। दौसा के पहले चुनाव में सचिन पायलट का उनकी पत्नी सारा ने भी पूरा साथ दिया। गली गली घूमकर वोट मांगे थे, आगे अजमेर लोकसभा चुनाव में भी ऐसा नजर आया। बहरहाल विरासत में मिली पिता की सीख पर वे आज भी चल रहे हैं। पिता राजेश पायलट की विरासत को संभाल रहे सचिन पायलट की उनके पिता से कई बातें मिलती है। यह वो समानताएं हैं, जो विरासत को परिपक्व और सशक्त बनाए हुए हैं।

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