सिद्धू का अगला कदम अभी भी तय नहीं

Published Date 2016/10/09 18:51, Written by- FirstIndia Correspondent

चंडीगढ़। सिद्धू दंपति, क्रिकेटर से नेता बने नवजोत सिंह सिद्धू और डॉक्टर से नेता बनीं उनकी पत्नी नवजोत कौर सिद्धू, ने अंतत: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को अलविदा कह दिया है। दोनों को एक-एक कर राजनीति में लाने वाली भाजपा इस पर खेद नहीं जता रही है। कम से कम, फिलहाल तो नहीं ही जता रही है। 


गत माह पार्टी छोड़ने वाले अपने पति के पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए नवजोत कौर ने शनिवार को भाजपा से अपना इस्तीफा ऑनलाइन भेजा। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री विजय सांपला को उनका इस्तीफा स्वीकार करने में चंद ही मिनट लगे।


सिद्धू दंपति पर निशाना साधते हुए सांपला ने कहा, "पार्टी ने उन्हें (नवजोत कौर को) विधायक और मुख्य संसदीय सचिव बनाया, उन्हें (नवजोत सिंह सिद्धू को) राज्यसभा सदस्य बनाया। पार्टी ने उन्हें सर्वाधिक सम्मान देते हुए समायोजित किया। हो सकता है कि उनकी आकांक्षाएं और उम्मीदें अधिक रहीं हों।"


कौर अमृतसर पूर्व से विधायक थीं और उनके पति साल 2004 में, 2007 के उप चुनाव में और साल 2009 के आम चुनाव में अमृतसर से लगातार लोकसभा सदस्य चुने गए थे। गत एक दशक में सिद्धू दंपति की पंजाब के सत्ताधारी बादल परिवार से अनबन बनी रही। भाजपा पंजाब में शिरोमणि अकाली दल के साथ सत्ता में है। अकाली दल को बादल परिवार ही चलाता है। लेकिन, सिद्धू ने बादल परिवार पर हमला बोलने का कोई अवसर नहीं गंवाया। पंजाब में दोनों दलों की गठंधन सरकार 2007 से है।


हालांकि, नवजोत कौर सिद्धू मुख्य संसदीय सचिव थीं, लेकिन उन्होंने भी अपनी सरकार को आड़े हाथों लिया। अपने और अपने पति के निर्वाचन क्षेत्रों में विकास कार्यो की उपेक्षा का आरोप लगाया। दोनों पक्षों के बीच दो बार मेल-मिलाप भी हुआ, लेकिन वह दीर्घजीवी नहीं हो सका। अब सवाल है कि सिद्धू दंपति का अगला कदम क्या होगा?


भाजपा सरकार ने नवजोत सिंह सिद्धू को राज्यसभा का मनोनीत सदस्य बनाया था। इस साल जुलाई में उन्होंने अपनी सदस्यता छोड़ दी। इसके बाद अगले कुछ दिनों तक राजनीतिक बाजार में उनका भाव काफी अधिक था। पंजाब में हर कोई चाहे वह मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस हो या नई चुनौती पेश करने वाली आम आदमी पार्टी हो, उन्हें अपनी गोद में बैठाना चाहती थी। लेकिन, राजनीतिक रूप से अस्थिर सिद्धू ने संभावनाओं से दांवपेंच लड़ाते हुए अपने राजनीतिक मंच आवाज-ए-पंजाब की घोषणा कर दी। उन्होंने आम आदमी पार्टी (आप) और उसके संयोजक अरविंद केजरीवाल को 'बेनकाब' कर दिया और कांग्रेस नेतृत्व के सामने शर्ते रख दीं।


एक समय चर्चा शुरू हो गई थी कि सिद्धू आप के मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी होंगे। लेकिन, सिद्धू ने खुद ही बताया कि आप ने सिर्फ उनकी पत्नी को टिकट देने और जीतने पर मंत्री बनाने का वादा किया है। सिद्धू का मुख्यमंत्री बनने का सपना परवान चढ़ने से पहले ही टूट गया। पंजाब में झंझावातों से जूझ रही आप अब सिद्धू के मुद्दे पर शांत है, जबकि एक समय सिद्धू को पार्टी में शामिल करने को आतुर कांग्रेस की भी सोच बदल गई है।


दरअसल, पंजाब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह पहले कहा करते थे कि सिद्धू कांग्रेस परिवार से आते हैं। लेकिन, लगता है कि सिद्धू की राजनीतिक ठिठोली से उनका मन भी भर गया है।


अमरिंदर सिंह ने कहा, "सिद्धू काफी उलझे हुए आदमी हैं। वह अपना बयान बदलते रहते हैं। यह अच्छा है कि वह हम लोगों से दूर रहें।" कांग्रेस और आप में प्रवेश नहीं होने और चौथे मोर्चे की घोषणा का कोई असर न होने के बाद, सिद्धू ने अपने लिए और दूसरों के लिए एक अनिश्चितता की स्थिति पैदा कर दी है। इस राजनीतिक हलचल से सर्वाधिक सुख भाजपा-अकालीदल गठजोड़ उठा रहा है।

 

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