कल से शुरू हो रहा है चैत्र नवरात्र, पहले दिन इस मंत्र से करे माता शैलपुत्री को प्रसन्न 

Pawan Tailor Published Date 2018/03/17 04:51

चैत्र नवरात्रि का पहला दिन कलश स्थापना के साथ ही आरंभ हो जाता है, विधि अनुरूप सबसे पहले शक्तिस्वरूपा देवी दुर्गा के प्रथम रूप में मां शैलपुत्री की पूजा और आराधना करने की परंपरा है। हिन्दू घर्म की मान्यता अनुसार समस्त ब्रह्माण्ड का कल्याण करने वाली देवी शैलपुत्री का जन्म पर्वतराज हिमालय के घर हुआ था, इसलिए इन्हें शैलसुता भी कहा जाता है।

पौराणिक कहानियों के अनुसार अपने पूर्वजन्म में देवी शैलपुत्री ही प्रजापति दक्षराज की कन्या सती थीं जिनका विवाह भगवान शंकर से हुआ था। एक बार दक्षराज ने विशाल यज्ञ आयोजन किया था, जिसमें उसने सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया था लेकिन महादेव को नहीं निमंत्रण नहीं भेजा था। फिर भी सती दक्षराज के यज्ञ में यह सोचकर गई कि पिता के घर में जाने के लिए पुत्री को निमंत्रण की आवश्कता नहीं है। पर वहां जाकर देवी सती को दक्षराज ने अपमानित किया, इतना ही नहीं उसने भगवान शंकर के विरुद्ध भी कई अपशब्द कहे जिसे देवी सती सहन नहीं कर पाई और उन्होंने वहीं यज्ञ की वेदी में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए।

माना जाता है कि अगले जन्म में देवी सती ही शैलराज हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्मी और और शैलपुत्री के नाम से जानी गईं। माता का विवाह हर बार की तरह इस बार भी भगवान शंकर से ही हुआ। बता दे कि पार्वती और हेमवती उनके ही अन्य नाम हैं। 
माता का स्वरूप इस तरह का है 

नवदुर्गाओं में प्रथम देवी शैलपुत्री है, जो अपने दाहिने हाथ में भगवान शिव की भांति त्रिशूल धारण करती हैं। देवी शैलपुत्री इस त्रिशूल को सदैव कलयाण के लिए उपयोग करती है, जहां एक तरफ वो पापियों का नाश करती है वहीं दूसरी तरफ भक्तों को भी अभयदान भी देती है। माता के बाएं हाथ में कमल का पुष्प सुशोभित है, जो ज्ञान और शांति के साथ सभ्यता का प्रतीक भी है। कमल नए आगाज का प्रतिक भी है, क्योंकि यह हर सुबह सुरज की पहली किरण के साथ खिलता है। भगवान शिव की शक्ति होने के कारण देवी शैलपुत्री का वाहन भी वृषभ है और इसलिए माता का यह स्वरूप वृषारूढ़ देवी के नाम से भी विख्यात हैं। 

देवी शैलपुत्री के कृपा को पाने के लिए इस मंत्र का करे उच्चारण: 

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्राद्र्वकृतशेखराम।
वृषारूढ़ा शूलधरां यशस्विनीम्।

इस मंत्र का मतलब है कि देवी शैलपुत्री जो वृषभ पर विराजित हैं और जिनके दाहिने हाथ में त्रिशूल है, बाएं हाथ में कमल का पुष्प सुशोभित है, वही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं।
 

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