Euthanasia: 42 साल कोमा में रही थी अरुणा शानबाग, लेकिन कोर्ट ने मौत नहीं दी थी

Published Date 2018/03/09 04:18,Updated 2018/03/09 04:44, Written by- FirstIndia Correspondent

नई दिल्ली बयालिस साल तक कोमा में रहने वाली अरुणा शानबाग भी सम्मानजनक मौत पा सकती थी, अगर कोर्ट ने Euthanasia पर यह फैसला उसके जीते जी ले लिया होता। अगर ऐसा होता तो अरूणा को भी पूरी जिंदगी बिस्तर पर नहीं बिताना पड़ता, उसे इस नर्क भरे जीवन से कबका छुटकारा मिल चुका होता।

पूरी जिंदगी अंधेरे में गुजार देने वाली अरूणा रेप की शिकार हुई थी, उन्हें इच्छा या दया मृत्यु देने की मांग करती जर्नलिस्ट पिंकी वीरानी ने उठाई थी। लेकिन वो इसमे कामयाब नहीं हो सकी, कोर्ट ने उनके मांग को ठुकरा दिया था। 

यह था पूरा मामला:

मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल (केईएम) हॉस्पिटल में बतौर नर्स अरूणा शानबाग काम करती थी। इस हॅास्पिटल में दवाइयों का कुत्तों पर एक्सपेरिमेंट करने का डिपार्टमेंट था, जिसमे नर्स कुत्तों को दवाई देती थीं।  27 नवंबर 1973 की रात वो रात थी जिसके बाद अरुणा ने कभी दिन नहीं देखा।

अरूणा उस दिन अपनी ड्यूटी पूरी करने के बाद जब घर जाने से पहले कपड़े बदलने के लिए बेसमेंट में गईं, तो वार्ड ब्वॉय सोहनलाल पहले से वहां छिपा बैठा था। उसने अरुणा के गले में कुत्ते बांधने वाली चेन लपेटकर हमला किया। छूटने के प्रयास से अरुणा ने खूब ताकत लगाई, जिससे उसकी गले की नसें दब गई और वो बेहोश हो गईं। अरुणा कोमा में चली गईं और फिर कभी ठीक नहीं हो सकी।

सुप्रीम कोर्ट ने ठुकरा दी थी पिटीशन:

अरूणा ऐसा जीवन जी रही थी जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल है, वह पूरी तरह कोमा में न होते हुए दवाई और भोजन ले रही थीं। डॉक्टरों की रिपोर्ट के आधार पर अरुणा को इच्छा मृत्यु देने की इजाजत नहीं मिली। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में अरुणा को मौत नहीं दिया। 

Euthanasia आखिर है क्या?
जब कोई मरीज बहुत ज्यादा पीड़ा से गुजर रहा होता है और उसके बचने की कोई उम्मीद नहीं रहती तो उन मामलों में कुछ देशों में इच्छा मृत्यु दी जाती है। भारत में यह धार्मिक और सामाजिक वजहों से गलता माना जाता है।  

कितनी तरह की होती है इच्छा मृत्यु?

1.Active Euthanasia- इसमे मरीज को डॉक्टर जहर वाला इंजेक्शन लगाता है जिससे उसकी कार्डिएक अरेस्ट में मौत हो जाती है।
2.Passive Euthanasia- इसमे डॉक्टर्स मरीज को लाइफ सपोर्ट सिस्टम से हटा देते हैं, जिससे उसके जीने की उम्मीद खत्म हो जाती है।
3.Physician-assisted suicide- यह मामला जरा अलग है, इसमे मरीज खुद जहरीली दवाएं लेता है, जिससे मौत हो जाती है।

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