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पहला नवरात्र आज, ऐसे करें मां शैलपुत्री को प्रसन्न-होगी हर मनोकामना पूरी

पहला नवरात्र आज, ऐसे करें मां शैलपुत्री को प्रसन्न-होगी हर मनोकामना पूरी

चैत्र नवरात्रि इस बार 6 अप्रैल से शुरु हो रही है। इस दौरान मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। दुर्गा के पहले स्वरूप को 'शैलपुत्री' के नाम से जाना जाता हैं। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम 'शैलपुत्री' पड़ा। नवरात्र-पूजन में पहले दिन इनकी पूजा और उपासना की जाती है। मां का स्वरूप बेहद ही शुभ फलदायी है। एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में कमल धारण किए ये देवी वृषभ पर विराजमान हैं जो संपूर्ण हिमालय पर राज करती हैं

ऐसे करें कलश स्थापना
1. नवरात्रि के पहले दिन नहाकर मंदिर की सफाई करें या फिर जमीन पर माता की चौकी लगाएं. 
2. सबसे पहले भगवान गणेश जी का नाम लें।
3. मां दुर्गा के नाम की अखंड ज्योत जलाएं और मिट्टी के पात्र में मिट्टी डालें. उसमें जौ के बीच डालें।
4. कलश या लोटे पर मौली बांधें और उस पर स्वास्तिक बनाएं। 
5. लोटे (कलश) पर कुछ बूंद गंगाजल डालकर उसमें दूब, साबुत सुपारी, अक्षत और सवा रुपया डालें।
6. अब लोटे (कलश) के ऊपर आम या अशोक 5 पत्ते लगाएं और नारियल को लाल चुनरी में लपेटकर रखें। 
7. अब इस कलश को जौ वाले मिट्टी के पात्र के बीचोबीच रख दें।
8. अब माता के सामने व्रत का संकल्प लें।

मां दुर्गा के स्वरूप शैलपुत्री की पूजा विधि

मां शैलपुत्री की तस्वीर रखें और उसके नीचें लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछायें। इसके ऊपर केसर से शं लिखें और उसके ऊपर मनोकामना पूर्ति गुटिका रखें। इसके बाद हाथ में लाल पुष्प लेकर शैलपुत्री देवी का ध्यान करें। 
ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ओम् शैलपुत्री देव्यै नम:।
मंत्र के साथ ही हाथ के पुष्प मनोकामना गुटिका एवं मां के तस्वीर के ऊपर छोड दें। इसके बाद भोग प्रसाद अर्पित करें तथा मां शैलपुत्री के मंत्र का जाप करें। यह जप कम से कम 108 होना चाहिए।

 

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जयपुर: नवरात्रि के चौथे दिन आज मां कुष्मांडा की पूजा की जाती है. अपनी हल्की हंसी से ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इनका नाम कुष्मांडा हुआ है. मां कुष्मांडा अष्टभुजा देवी के नाम से भी विख्यात है. इनका निवास सूर्यलोक में है. इन्हीं के तेज और प्रकाश से दसों दिशाएं प्रकाशित हो रही हैं. 

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मां कूष्मांडा पूजा मंत्र- 
करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी
शुभानि भद्राण्यभिहन्दु चापदः

मां कुष्मांडा की पूजा का महत्व: 
- देवी कुष्मांडा की पूजा अर्चना करके नाक कान गले से संबंधित बीमारियां दूर होती है.
- देवी कुष्मांडा की विशेष पूजा से वाणी प्रभावित होती है और आपकी वाणी द्वारा कार्य सिद्ध होता है.
- माता कूष्मांडा भक्तों को रोग, शोक और विनाश से मुक्त कर आयु, यश, बल और बुद्धि प्रदान करती हैं.

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गणगौर पूजन में भी दिख रहा है कोरोना वायरस का असर, मास्क लगाकर गणगौर पूजन कर रहीं महिलाएं

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बिसाऊ(झुंझुनूं): कोरोना के चलते दुनिया में दशहत है. लोग घरो में दुबके हुए है लेकिन शेखावाटी की युवतियां अपनी सैप्टी के साथ ईसर गणगौर की पूजा कर रही है. हाल ही राज्य सरकार द्धारा 144 की धारा लगने के बावजूद महलिाओं और लड़कियों के साथ सखी सहलियों का गुट कम हो गया है. लेकिन इतिहान के तौर पर अब युवतियां एवं बालिकायें मास्क और रुमाल लगाकर अपनेे सुहाग के लिए गणगौर की पूजा कर रही है. झुंझुनूं जिले के बिसाऊ कस्बे में भी एक वाकया ऐसा ही देखने को मिला यहां अनु सैनी और पूजा जागिंड़ की शादी कुछ ही महिनों पहले हुई थी उनकी पहली गणगौर की पूजा है और कोरोना संक्रमण के चलते है उनको डर भी है और एक उदासी भी प्रसाशन द्धारा गणगौर का मैला रदद का दिया गया है.

हालांकी उनको खुशी की बात इस बात की है वो मास्क लगाकर घर में गणगौर पूजा कर रही है. पुजा, अनु के साथ रेखा,सपना, रिषी के साथ साथ महिलाओं ने भी गणगौर के लोक गीत गायें. कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए शुरू की गई जंग में महिलाएं भी पीछे नहीं है. गणगौर पूजन के दौरान सतर्कता बरत रही हैं. महिलाएं हाथ धोकर मुंह पर मास्क लगाकर गणगौर पूजन के कार्यक्रम में शामिल हो रही हैं.

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त्योहार उत्साह और उमंग की अभिव्यक्ति:
तीज और त्योहार हमारे जीवन के उत्साह और उमंग की अभिव्यक्ति है. इससे हमारा सामाजिक जीवन तो झलकता ही है, संस्कारों के एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांरित करने का अवसर भी. सदियों से चली आ रही इस सांस्कृतिक विरासत को सहेजकर रखना हैं चुनौती भी है तो संभावना भी. आज के भौतिकवादी परिवेश में सामाजिक संबंधों को परिभाषित करते ये तीज और त्योंहार सूखे मन उपवन में हरितिमा का संचार करते हैं. सौभाग्य की देवी पार्वती को यूं तो सारे देश में स्त्रियां मंगल कामना के लिए विधि विधान से पूजा अर्चना करती है, लेकिन राजस्थान में गणगौर के रूप में गौरी पूजन की अनूठी परम्परा है.

होली के दूसरे दिन से मनाए जाने वाले इस त्योहार को लेकर नव विवाहित महिलाओं और कुंवारी युवतियों में उत्साह बना हुआ है. ये प्रतिदिन सुबह गणगौर माता के मंगल गीत गाते हुए पूजा अर्चना कर रही है. सोलह दिन तक चलने वाले इस त्योहार में नव विवाहित महिलाएं और गणगौर पूजने वाली युवतियां नए परिधानों में सजधज कर सौभाग्य कर सौभाग्य की देवी पार्वती के मंगल गीत गाती हुई प्रतिदिन हरी दूब से पूजा कर रही है. विवाह के प्रथम वर्ष में इस पूजन का विशेष महत्व होता है। सोलहवें दिन गणगौर की पूजा अर्चना कर इसे जलाशय में विसर्जित किया जाता है.

गणगौर पूजन की यह परम्परा:
गणगौर को विधि पूर्वक रोली, काजल और मेंहदी की 16-16 बिंदिया बनाकर पूजा जाता है. पूजन में हरी घास की कोपलें पुष्प,कनेर के पते आदि काम में लिए जाते हैं. 16 बार किए गए पूजन में हर बार हरी दूब उन्हें अर्पण की जाती है. गीत भी गाया जाता है. गौर और गणपति, ईसर पूजे पार्वती, पार्वती का आल्यागोल्या, गौर का सोना का टीका दे. राजस्थान में कहीं पर गणगौर 15 दिन पहले बनाई जाती है, तो कहीं पर आठ दिन पहले.गणगौर होली जलने के दूसरे दिन से ही होली की राख और गोबर से अथवा काली मिट्टी से गणगौर बनाई जाती है. कहीं-कहीं आठ पिंडी राख और आठ पिंडी गोबर को बनाकर डलियों में दूब पर रख कर दी जाती हैं.

आठवें दिन घर लाते हैं गणगौर - गणगौर पर्व को लेकर नव विवाहित महिलाओं में उत्साह रहता है. सोलह दिन तक चलने वाले गणगौर के आठवें दिन नव विवाहित महिलाएं छोटे-छोटे बच्चों को दुल्हा-दुल्हन का वेश धारण कर ढोल ढमाकों के साथ गणगौर को विधि विधान से अपने घर लेकर आती है. वर्तमान में शहरों में रेडीमेड गणगौर और ईसर भी मिलते हैं जिन्हें गणगौर के दिन वस्त्राभूषण धारण करवाए जाते हैं. सदियों से चली आ रही गणगौर पूजन की यह परम्परा दरअसल त्योंहार हमारे सामाजिक जीवन को मजबूत करता है.

आज नवरात्रि का तीसरा दिन, घर-घर हो रही है मां चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना

मातृ शक्ति का अभिनव लोक पर्व:
गौरतलब है कि होलिका दहन की राख से बने पिंडों को शिव पार्वती के अंश के रूप में प्रतिष्ठापित करने के साथ ही शेखावाटी अंचल में करीब एक पखवाड़े तक चलने वाला गणगौर पूजन का कन्याओं और नवविवाहिताओं ने विधिविधान के साथ शुरू किया. अल सुबह होलिका दहन की राख के शिव शक्ति के प्रतीकात्मक अंश के रूप में बनाए पिंडों की गणगौर पूजा शुरू की. उन्होंने गीतों के माध्यम से गौरा, उनकी सहेलियों और ईशर का आहवान किया. गौरा को गीतों के माध्यम से आने का आमंत्रण देती कन्याओं के उनके स्वागत में बधावा गीत गाए. मातृ शक्ति के इस अभिनव लोक पर्व के शुभारम्भ पर गणगौर पूजने वाली कन्याओं ने प्रकृति की गीतों के माध्यम से आराधना की. प्रभातकालीन वेला में घरों से गूंजते गीतों को सुनकर प्रकृति झूमी-झूमी तो यहाँ का वातावरण सरस हो गया.

गौर पूजन के समय गाए जाने वाले गीतों की गूंज बाड़ी हाली बाड़ी खोल, बाड़ी की किंवाड़ी खोल, म्हैं आय ए फलसां रै बाहर, गौर ए गणगौर माता खोल किंवाड़ी, ऊंचो चंवरो चैंक्यूटो, जल यमुना रो नीर मंगाओ जी आदि गीतों की स्वरलहरियां बरबर की ध्यान आकर्षिक करने लगी हैं. अच्छे वर की कामना और पति की दीर्घआयु का पर्व महिलाओं ने बताया कि सुहागिनों के पूजा करने की परंपरा वर्षों से चल रही है. पहले अपने मायके में पूजा की और अब ससुराल में आकर भी उसी परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं. उन्होंने बताया कि गणगौर व ईसर को शिव-पार्वती के रूप में पूजा जाता है वहीं अच्छे वर की कामना के लिए भी गणगौर की पूजा की जाती है तो वहीं पति की दीर्घआयु की कामना की जाती है.

...फर्स्ट इंडिया के लिए अशोक सोनी की रिपोर्ट

Chaitra Navratri 2020: आज नवरात्रि का तीसरा दिन, घर-घर हो रही है मां चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना

Chaitra Navratri 2020: आज नवरात्रि का तीसरा दिन, घर-घर हो रही है मां चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना

जयपुर: आज नवरात्रि का तीसरा दिन है. देशभर में लॉकडाउन के बीच लोग घरों में मां  चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना कर रहे है. इनके सर पर घंटे के आकार का चन्द्रमा है. इसलिए इनको चंद्रघंटा कहा जाता है. इनके दसों हाथों में अस्त्र-शस्त्र हैं और इनकी मुद्रा युद्ध की मुद्रा है. मां चंद्रघंटा तंत्र साधना में मणिपुर चक्र को नियंत्रित करती हैं. मान्यताओं के मुताबिक शेर पर सवार मां चंद्रघंटा की पूजा करने से भक्तों के कष्ट हमेशा के लिए खत्म हो जाते हैं. इन्हें पूजने से मन को शक्ति और वीरता मिलती है. ज्योतिष में इनका संबंध मंगल नामक ग्रह से होता है.

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ऐसे कीजिए मां चंद्रघंटा की आराधना:
मां चंद्रघंटा की पूजा लाल वस्त्र धारण करके करना श्रेष्ठ होता है. मां को लाल पुष्प, रक्त चन्दन और लाल चुनरी समर्पित करना उत्तम होता है. इनकी पूजा से मणिपुर चक्र मजबूत होता है और भय का नाश होता है. अगर इस दिन की पूजा से कुछ अद्भुत सिद्धियों जैसी अनुभूति होती है, तो उस पर ध्यान न देकर आगे साधना करते रहनी चाहिए. आज की पूजा लाल रंग के वस्त्र धारण करके करें. मां को लाल फूल, ताम्बे का सिक्का या ताम्बे की वस्तु और हलवा या मेवे का भोग लगाएं.

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जीवन के सभी दुखों का होगा अंत:
हर देवी के हर स्वरूप की पूजा में एक अलग प्रकार का भोग चढ़ाया जाता है. कहते हैं भोग देवी मां के प्रति आपके समर्पण का भाव दर्शाता है. मां चंद्रघंटा को दूध या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाना चाहिए. प्रसाद चढ़ाने के बाद इसे स्वयं भी ग्रहण करें और दूसरों में बांटें. देवी को ये भोग समर्पित करने से जीवन के सभी दुखों का अंत हो जाता है.

कोरोना महामारी की आपदा को लेकर ज्योतिषियों की भविष्यवाणी, मिल गई खात्मे की डेट

जयपुर: देशभर में कोरोना महामारी की आपदा को लेकर ज्योतिषियों का आकलन है कि मध्य अप्रैल महीने के बाद से इस आपदा से निजात मिलना शुरू होगा. हिंदू पूजा पद्धति और आध्यात्म के लिहाज से नवरात्र के इन दिनों में लगातार घर पर ही बैठ कर पूजा-अर्चना से सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी होता है.

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ज्योतिष का भी अपने आप में एक बड़ा महत्व:
प्राचीन भारतीय ज्योतिष का भी अपने आप में एक बड़ा महत्व है विज्ञान के इस दौर में ज्योतिषीय गणनाओं को भी साफ नकारा नहीं जा सकता. कारण साफ है कि ज्योतिष को भी विज्ञान का ही रूप दिया गया है. दूसरी तरफ ज्योतिष भी वैज्ञानिक मान्यताओं में विश्वास करता है भले ही विज्ञान ज्योतिष में विश्वास करें या ना करें.

15 अप्रैल तक इसका प्रभाव रहेगा:
ज्योतिष के लिहाज से सूर्य के मीन राशि में प्रवेश करने की वजह से बीमारी या विपदा जैसे जैसे हालात पैदा होते हैं.15 मार्च को मीन राशि में प्रवेश हुआ था तो लगभग 1 महीने यानी 15 अप्रैल तक इसका प्रभाव रहेगा और धीरे-धीरे खत्म भी होता चला जाएगा. ज्योतिषियों की दलील है कि नवरात्र के समय में लोग घर से बाहर नहीं निकलते थे प्राचीन काल में घर में ही पूजा-अर्चना और साधना में जुटे रहते थे काफी हद तक धर्म और वैज्ञानिकता का सम्मिश्रण था.

किसानों का नुकसान होना भी यही एक कारण:
दूसरी तरफ दिसंबर महीने में सूर्य ग्रहण भी था तभी से ही इस तरीके के वातावरण होने के हालातों की शुरुआत हो गई थी. लगातार मौसम खराबी की वजह से किसानों का नुकसान होना भी यही एक कारण है. पूर्वी राजस्थान के भरतपुर के प्रसिद्ध ज्योतिष पंडित सुरेंद्र नाथ पंच का कहना है कि प्रधानमंत्री का साथ दें और ईश्वर या आराधना में भी जुटे रहे.

किसी विशेष किस्म की जनहानि नहीं होगी:
भीलवाड़ा के भविष्यवक्ता और प्राचीन ज्योतिष के लिहाज से अपनी गणना करने वाले पंडित गोपाल व्यास का कहना है कि कोरोना से किसी विशेष किस्म की जनहानि नहीं होगी सरकार का साथ अवश्य दें. ज्योतिषीय आकलन के लिए गोपाल व्यास ने दावा किया है कि 16 अप्रैल के बाद से हालात सामान्य होना शुरू हो जाएंगे जून तक छोटा-मोटा प्रभाव रहेगा इस दौरान दान पुण्य का विशेष ध्यान रखा जाए और साथ ही राज्य सरकार का भी सहयोग किया जाए.

कोरोना को लेकर जल्द टलेगा खतरा, काली माता अखाड़े के पांडुलिपि में उल्लेख 

ज्योतिषीय आकलन की भी प्रमाणिकता को नकारा नहीं जा सकता:
बरहाल कुल मिलाकर कहा जाए तो भारत देश की सभ्यता और संस्कृति एक ऐसी जीवन पद्धति से जुड़ी हुई रही है जिससे कि व्यक्ति अपने आपको स्वस्थ रख कर बीमारियों से दूर रह सकता है. ऐसे में ज्योतिषीय आकलन की भी प्रमाणिकता को नकारा नहीं जा सकता क्योंकि ज्योतिषी भी फिलहाल प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की अपील का पालन करने की बात कह रहे हैं. और संभावना जता रहे हैं कि 15 अप्रैल के बाद स्थितियां ठीक होना शुरू होगी बशर्ते जरूरत है समाज के हर एक नागरिक को सरकार का सहयोग देने की.

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कोरोना को लेकर जल्द टलेगा खतरा, काली माता अखाड़े के पांडुलिपि में उल्लेख

कोरोना को लेकर जल्द टलेगा खतरा, काली माता अखाड़े के पांडुलिपि में उल्लेख

नागौर: कोरोना महामारी घोषित की जा चुकी है और कोरोना का कहर धीरे धीरे कई देशों तक फैलकर लोगों की जाने ले चुका है भारत भी इससे अछूता नही है. भारत में अब तक कोविड 19 यानी कोरोना की वजह से 15 मौतें हो चुकी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशभर में 21 दिनों के लिए लोक डाउन कर दिया है लोगों को स्टे एट होम के निर्देश दिए गए है ताकि संक्रमण का खतरा ताला जा सके और भारत मे कम से कम लोगो की जान जाए और जो संक्रमित है उनकी जाने बचाई जा सके. वहीं कोरोना को लेकर संवत्सरी पांडुलिपि में कई गई भविष्यवाणी के अनुसार खतरा जल्द टलेगा मगर सरकार की एडवाइजरी को नागरिकों को मानना होगा ताकि संक्रमण से बचा जा सके. 

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संवत्सरी नाम की इस पांडुलिपि में भविष्यवाणी की गई: 
नागौर जिले के डीडवाना के भाटी बास स्थित प्राचीन काली माता अखाड़े में कई पुराने और प्राचीन ग्रंथ रखे है जिनमे लगभग 200 साल पुरानी एक पांडुलिपि भी है. संवत्सरी नाम की इस पांडुलिपि में भविष्यवाणी की गई है कि भारतिय संवत्सर 2076 में वायरस जनित बीमारी से महामारी फैलेगी और इससे विश्वभर में लगभग एक लाख पच्चास हजार मौतें हो सकती है! पांडुलिपि की भविष्यवाणीया लगभग सटीक निकलती है.

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कोरोना को देखते हुए जारी एडवायजरी की पूर्ण पालना कि जाए:
काली माता मंदिर के महंत योगी सोहननाथ के अनुसार कोरोना वायरस जनित संक्रमण वाला रोग है इससे सबको बचना होगा. काली माता मंदिर में आज चैत्र नवरात्रि में भी सिर्फ अकेले ही पूजा की गई है. भक्तों और श्रद्धालुओं को दर्शन के लिए मनाही है. योगी ने लोगों से अपील की है कि कोरोना को देखते हुए जारी एडवायजरी की पूर्ण पालना कि जाए नियमों का पालन किया जाए ताकि संक्रमण से बचा जा सके. योगी ने यह भी कहा है कि संवत्सर 2076 में शुरू हुई यह बीमारी 2077 के शुरुआती दौर में खत्म हो जाएगी और आने वाला नव संवत्सर देशवासियों के लिए मंगलकारी होगा और खुशहाली लेकर आएगा.

Chaitra Navratri 2020: आज नवरात्रि का दूसरा दिन, घर-घर हो रही है माता ब्रह्मचारिणी की पूजा 

Chaitra Navratri 2020: आज नवरात्रि का दूसरा दिन, घर-घर हो रही है माता ब्रह्मचारिणी की पूजा 

जयपुर: चैत्र नवरात्रि 25 मार्च से शुरू हो गए है. आज चैत्र नवरात्रि का दूसरा दिन है और इस अवसर पर मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है. मां ब्रह्मचारिणी की पूजा तप और जप की शक्ति के रूप में की जाती है. मां के नाम में ही उनकी महिमा का वर्णन है. ब्रह्म का अर्थ है तपस्‍या और चारिणी का अर्थ है आचरण करने वाली. यानी मां ब्रह्मचारिणी का अर्थ है तप का आचरण करने वाली मां को शत-शत नमन है. चलिए जानते है मातारानी की कैसे विशेष पूजा अर्चना की​ जाये. 

गुजरात के अंबाजी मंदिर में हुई घट स्थापना, भक्तों के लिए शुरू हुए ऑनलाइन दर्शन

गंगाजल से पवित्रीकरण:
नवरात्रि के दूसरे दिन प्रातः सुबह उठकर स्नान करें. इसके बाद साफ-सुथरे वस्त्र धारण करें. पूजा घर में झाड़ू-पोछा करें. इसके बाद गंगाजल से पवित्रीकरण करें. इसके बाअद बैठकर पूजा करें. पूजा करते हुए हाथ जोड़कर मां ब्रह्मचारिणी के बीज मंत्र का पाठ करते हुए घट (कलश) में मां का आह्वाहन करें. देसी घी का दिया प्रज्वलित कर मां की पूजा अर्चना करें. मां को मिश्री, शक्कर और पंचामृत अर्पित करें.

ऐसे करें माता की पूजा
ऐसा माना गया है कि मां ब्रह्मचारिणी को चमेली का फूल काफी पसंद है. दूसरे दिन नवरात्रि पूजा करते समय चमेली के फूल अर्पित करें और माता का आशीर्वाद पाएं. पूजा करते समय माता ब्रह्मचारिणी के दिव्य रूप का ध्यान किया जाता है और पूजा समाप्त करने के लिए आरती के बाद सोलह तरह के प्रसादों का भोग लगाया जाता है.

Rajasthan Lock Down: चैत्र नवरात्रि पर लगा कोरोना ग्रहण, प्रदेशभर के मंदिरों में हुई घट स्थापना, लेकिन दर्शनार्थियों के लिए पट रहे मंगल

माला और दूसरे में कमंडल: 
मां ब्रह्मचारिणी के एक हाथ में जप करने वाली माला और दूसरे में कमंडल होता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, मां ब्रह्मचारिणी ने भगवान शंकर को पति के रूप में पाने के लिए बहुत तपस्या की थी जिस कारण उन्हें तपश्चारिणी भी कहा जाता है.

गुजरात के अंबाजी मंदिर में हुई घट स्थापना, भक्तों के लिए शुरू हुए ऑनलाइन दर्शन

गुजरात के अंबाजी मंदिर में हुई घट स्थापना, भक्तों के लिए शुरू हुए ऑनलाइन दर्शन

सिरोही: गुजरात का सबसे बड़ा शक्तिपीठ अंबाजी गुजरात और राजस्थान की सीमा पर स्थित है. बुधवार से देशभर में चैत्र नवरात्र की शुरुआत हो गई है. माता अंबाजी मंदिर में घट स्थापना की गई. गुजरात के सबसे बड़े शक्तिपीठ अंबाजी में श्रद्धालुओं के पट बंद रहे. नवरात्रि पर श्रद्धालुओं से गुलजार रहने वाले अंबाजी मंदिर में सन्नाटा पसारा हुआ है. मंदिर की लाइन पूरी तरह खाली नजर आई.

Rajasthan Lock Down: चैत्र नवरात्रि पर लगा कोरोना ग्रहण, प्रदेशभर के मंदिरों में हुई घट स्थापना, लेकिन दर्शनार्थियों के लिए पट रहे मंगल

भक्तों ने घर बैठे किए दर्शन:
जहां कोरोना वायरस की महामारी के चलते पूरा देश लॉक डाउन है. ऐसे में यह प्रसिद्ध मंदिर भी भक्तों के लिए बंद है. केवल पुजारियों ने माता की पूजा अर्चना कर इस बीमारी से निजात दिलाने की कामना की. बुधवार को अंबाजी मंदिर के भट्टजी महाराज की अगुवाई में घट स्थापना की गई. कोटेश्वर से सरस्वती नदी का जल लाकर यहां मातारानी की मंत्रोच्चार से झवेरे का पूजन किया गया. कोरोना वायरस की वजह से पहली बार भक्त घर बैठे मातारानी का दर्शन कर सके. उसके लिए मंदिर प्रशासन की ओर से ऑनलाइन दर्शन शुरू किए गए है. 

Chaitra Navratri: आज से शुरू हुए चैत्र नवरात्रि, नौ दिनों तक होगी मातारानी के इन स्वरूपों की पूजा

Rajasthan Lock Down: चैत्र नवरात्रि पर लगा कोरोना ग्रहण, प्रदेशभर के मंदिरों में हुई घट स्थापना, लेकिन दर्शनार्थियों के लिए पट रहे मंगल

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जयपुर: आज से चैत्र नवरात्रि शुरू हो गए है, लेकिन कोरोना वायरस की वजह से मातारानी के मंदिरों में सन्नाटा पसरा हुआ है. प्रदेश ही नहीं बल्कि देशभर के माता मंदिरों में घट स्थापना की गई है. मातारानी के मंदिरों में कोरोना वायरस की वजह से श्रद्धालुओं के ​लिए दर्शन बंद है. कोरोना वायरस की वजह से देशभर में लॉकडाउन है. कोरोना वायरस से बचाव के लिए केन्द्र ओर राज्य सरकारों ने ये कदम उठाए है. इसी को देखते हुए चैत्र नवरात्रि पर घर-घर ही माता रानी की घट स्थापना की गई हे. वहीं प्रदेशभर के माता मंदिरों में घट स्थापना की गई है. चाहे बात हो, राजस्थान के करौली जिले की कैला देवी की, या फिर बीकानेर के देशनोक माता की, सभी जगहों पर बुधवार को घट स्थापना की गई, लेकिन दर्शन श्रद्धालुओं के लिए पूरी तरह से बंद रहे. चलिए जानते है कैसे मंदिरों में घट स्थापना की गई है... 

दर्शनार्थियों के लिए पट मंगल:
राजधानी जयपुर के आमेर स्थित शिला माता मंदिर में चैत्र नवरात्रि पर सुबह 6.35 बजे घट स्थापना की गई. लेकिन दर्शनार्थियों के लिए पट मंगल रहे. यहां चैत्र नवरात्रि पर भरने वाला मेला भी नहीं भरा. कोरोना वायरस के संक्रमण के चलते सभी प्रमुख मंदिर पहले से श्रद्धालुओं के लिए बंद है. मंदिरों में नवरात्र की पूजा के साथ घट स्थापना होगी, लेकिन लोगों की भीड़ नहीं रहेगी. मनसा माता, दुर्गापुरा के दुर्गा माता मंदिर, पुरानी बस्ती के रुद्र घंटेश्वरी में शुभ मुहूर्त पर घट स्थापना की गई. 

Chaitra Navratri: आज से शुरू हुए चैत्र नवरात्रि, नौ दिनों तक होगी मातारानी के इन स्वरूपों की पूजा

कैलामाता मंदिर में हुई घट स्थापना:
चैत्र नवरात्रि पर करौली की कैलादेवी माता मंदिर में लागुरियां की भीड नजर आती थी, लेकिन इस बार कोरोना की वजह से सन्नाटा पसरा हुआ है. कैलादेवी के दरबार में बुधवार सुबह घट स्थापना की गई. इस बार कोरोना वायरस संक्रमण के चलते श्रद्धालुओं के लिए मातारानी का मंदिर दर्शनों के लिए नहीं खोला गया. मंदिर पुजारी ने मंत्रोच्चार के साथ  अनुष्ठान किया. इस बार नवरात्र के दौरान माता के दरबार में अनुष्ठान चल रहे है. वहीं जिलेभर के मंदिरों में अनुष्ठान हुए, घरों में विधि विधान से मातारानी की पूजा-अर्चना की गई. 

बीकानेर के देशनोक माता: 
करणी माता मंदिर देशनोक में बुधवार को चैत्र नवरात्रा की घटस्थापना के साथ बसंतीय नवरात्रा का शुभारंभ किया गया. मन्दिर प्रन्यास अध्यक्ष गिरिराज सिंह बारठ ने बताया कि शास्त्रोक्त आचार्य नरेंद्र कुमार मिश्र के सान्निध्य में पारंपरिक विधि विधान के साथ घटस्थापना की गई. इस अवसर पर मां करनी की प्रतिमा का विशेष श्रृंगार किया गया. घटस्थापना की महाआरती की गई. माँ करणी को विशेष भोग लगाया गया. मंदिर परिसर के पट बन्द रखे गए हैं केवल निज मंदिर में ही पूजा की गई. पूजा अर्चना में सभी के स्वस्थ रहने की भी कामना की गई. 

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आज से शुरू हुआ हिन्दू नववर्ष:
आज से हिंदू नववर्ष शुरू हो गया है, लेकिन कोरोना वायरस की वजह से अजमेर में नवरात्रि पर सड़कों पर सन्नाटा पसरा हुआ है.सुबह घरों में नवरात्रि पर घट स्थापना की गई. बाजारों, गलियों और चौराहों पर वीरानी छाई हुई है. 

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