लोकसभा चुनाव में टिकटों को लेकर राजस्थान में जाति का जयकारा !

Naresh Sharma Published Date 2019/03/17 03:36

जयपुर (नरेश शर्मा)। लोकसभा चुनाव का बिगुल बजते ही देश में एयर स्ट्राइक, राफेल डील, गाय व मंदिर, किसान व बेरोजगारी जैसे मुद्दे तेजी से गूंजने लगे हैं, लेकिन राजस्थान का सियासी नक्शा तो जाति के रंग से ही रंगा जाएगा। दोनों ही प्रमुख दल अभी अपने उम्मीदवार तय करने के संघर्ष करने में जुटे हैं, लेकिन राज्य का जातिगत तानाबना इस कदर बुना हुआ है कि यहां पहले से तय है कि किस सीट पर किस जाति का उम्मीदवार जीत सकता है। यानी राजस्थान में जाति से ही जय जयकार होगी। खास रिपोर्ट-

करीब सात करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले इस प्रदेश में अगर किसी जाति का 10 फीसदी वोट बैंक भी बन रहा है, तो यह किसी की सरकार बनाने और गिराने के लिए काफी है। तीन महीने पहले विधानसभा चुनाव में जाति की राजनीति देख चुके हैं और अब लोकसभा चुनाव भी जातिगत आधार पर लड़ने की तैयारी हो रही है। बात जब टिकट के बंटवारे की आती है, तो पहले उस सीट का जातिगत समीकरण देखा जाता है। चुनावी नजरिए से देखा जाए, तो  राजस्थान की जनसंख्या में करीब एक तिहाई हिस्सा पांच जातियों का माना जाता है। ये जातियां हैं ब्राह्मण, गुर्जर, मीणा, जाट और राजपूत। सत्ता की चाबी किसके पास रहेगी, इसका फैसला करने में ये जातियां काफी मायने रखती हैं। 

राजस्थान का जातिगत तानाबाना:

वैसे तो राजस्थान में कुल 272 जातियां हैं।  इनमें 51 फीसदी अन्य पिछड़ा वर्ग है। इस वर्ग में 91 जातियां हैं। जिनमें जाट 9 फीसदी, गुर्जर 5 फीसदी, माली 4 फीसदी है। 18 फीसदी अनुसूचित जाति है। इस वर्ग में 59 उप-जातियां हैं जिनमें मेघवाल 6 फीसदी व बैरवा 3 फीसदी है। 13 फीसदी अनुसूचित जनजाति है यानी एसटी। इस वर्ग में 12 उप-जातियां हैं जिनमें मीणा सबसे ज्यादा 7 फीसदी व भील 4 फीसदी है। एससी एसटी के लिए राजस्थान की 25 में से 7 सीटें आरक्षित हैं। 18 फीसदी अन्य जातियां हैं, इनमें  ब्राह्मण 8 फीसदी, राजपूत 6 फीसदी व वैश्य 4 फीसदी है।

राजस्थान की 25 में से सात लोकसभा सीट रिजर्व है यानी इन पर तो एससी या एसटी के उम्मीदवार ही जीतेंगे। 18 सीटें अनारक्षित हैं, लेकिन इन अनारक्षित सीटों का जातिगत समीकरण इस तरह का है कि सियासी दल भी व्यक्ति नहीं जाति देखकर टिकट देती है। इन 18 में से 5 सीटों पर अमूमन जाट प्रत्याशी ही जीत रहे हैं।

प्रदेश की हर एक सीट पर जाति का गणित:

—शेखावाटी की चार लोकसभा सीट सीकर, चुरू, झुंझुनू व नागौर जाट बाहुल्य सीट हैं और यहां पर 1991 से अब तक लगातार जाट प्रत्याशी ही जीतते आए हैं। झुंझुनू में जरूर एक बार मुस्लिम प्रत्याशी अयूब खान ने 1991 में जीत दर्ज की थी। खास बात यह है कि भाजपा हो या कांग्रेस दोनों ने ही इन सीटों पर जाट प्रत्याशी को ही उतारा है। 

—इसी तरह जैसलमेर-बाड़मेर सीट पर पिछले सात में से छह चुनाव में जाट प्रत्याशी जीता है। 2004 के चुनाव में राजपूत समाज के मानवेंद्र सिंह सांसद बने थे। नए परिवेश में धोरों की राजनीति का रंग चटख हो गया है। कुल 14 लाख में से दो लाख मुसलमान मतदाता निर्णायक होंगे। वैसे यहां सबसे ज्‍यादा करीब तीन लाख मतदाता जाट हैं। 

—राजधानी जयपुर की बात करें, तो 1984 से लेकर अब तक ब्राह्मण प्रत्याशी ही जीत पाया है, चाहे भाजपा का हो या कांग्रेस का। इस दौरान कांग्रेस ने राजपूत व मुस्लिम चेहरे भी उतारे, लेकिन उनको हार का सामना ही करना पड़ा। इस बार भी दोनों पार्टी ब्राह्मण उम्मीदवार पर ही विचार कर रही है।

—बारां-झालावाड़ सीट की बात करें, तो यहां से लगातार राजपूत उम्मीदवार जीतते आए हैं। पांच बार वसुंधरा राजे सांसद रही, तो तीन बार से उनके पुत्र दुष्यंत सांसद हैं। वैसे इस पर जाति से ज्यादा प्रभाव राजे का है।

—बात जब झालावाड़ की है, तो जोधपुर का जातिगत समीकरण भी देख लेते हैं। पिछले 10 चुनाव में यहां माली, राजपूत व विश्नोई समाज का दबदबा रहा है। पांच बार यहां माली, तीन बार राजपूत व दो बार विश्नोई ने चुनाव जीता है। पिछले दो बार से राजपूत उम्मीदवार चुनाव जीत रहे हैं। इस बार जोधपुर सीट पर राजपूत व माली के बीच मुकाबला होने की संभावना है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पुत्र का इस सीट से चुनाव लड़ना लगभग तय है, वहीं भाजपा मौजूदा सांसद गजेंद्र सिंह शेखावत को मैदान में उतारने का मन बना चुकी है।

—जातिगत समीकरण ही तो हैं, जो आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवारों को सामान्य सीटों पर उतारे जाने को मजबूर कर रहे हैं। वे सियासी दबदबे वाली सबसे बड़ी बिरादरी बन गए हैं। टोंक सवाई माधोपुर सीट सामान्य सीट हैं, लेकिन यहां पर मीणा या गुर्जर ही चुनाव जीतते हैं। कांग्रेस यहां मुस्लिम कार्ड खेल चुकी, लेकिन सफल नहीं हो सकी।  

—वहीं अलवर सीट पहले ओपन मानी जाती थी, लेकिन परिसीमन के बाद अब यह यादव सीट हो गई है। राजपूत समाज के भंवर जितेंद्र यहां से एक बार जीत चुके हैं, लेकिन अमूमन राजनीतिक पार्टियां यहां पर यादव को ही तरजीह देती है। उपचुनाव में तो दोनों ही पार्टियों ने यादव को ही मैदान में उतारा था। 

—जयपुर ग्रामीण को राजपूत-जाट सीट माना जाता है। पिछले दो चुनाव में यहां पर एक बार जाट व एक बार राजपूत ने चुनाव जीता है। कांग्रेस ने पिछली बार यहां ब्राह्मण उम्मीदवार के रूप में सीपी जोशी को उतारा था, लेकिन यह कार्ड चल नहीं पाया।

—पाली सीट को जैन बाहुल्य माना जाता है। इस सीट पर पिछले सात में से पांच चुनाव में जैन उम्मीदवार ने जीत दर्ज की है, लेकिन जाट व कलबी जाति का भी दबदबा रहा है। पाली में शामिल जाट बेल्ट ओसियां, भोपालगढ़ और बिलाड़ा के मतदाता भी हार-जीत में अपनी सीधी दखल रखेंगे। जातिगत समीकरणों को ध्यान में रख फिर जाटों को महत्व देते हुए कांग्रेस फिर से बद्रीराम जाखड़ को मैदान में उतार सकती है। 

—टिकट वितरण में जातिवाद सब ओर हावी है, जालौर-सिरोही में कलबी मतों की बहुलता के कारण दोनों पार्टी कलबी जाट उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है। चार जिलों के जोड़-तोड़ से बनी नई लोकसभा सीट राजसमंद को राजपूत सीट माना जा रहा है। परिसीमन के बाद बनी यह सीट दोनों ही बार राजपूत ने जीती है। पिछले चुनाव में भाजपा ने अजमेर के सांसद रासासिंह रावत को खड़ा किया वहीं कांग्रेस ने नागौर के राजपूत जमींदार परिवार गोपालसिंह इड़वा को यहां से प्रत्याशी बनाया।

—भीलवाड़ा लोकसभा सीट पर भी जातिगत समीकरण भी निर्णायक भूमिका में रहे हैं। लोकसभा के अब तक हुए 16 चुनाव में से 8 बार ब्राह्मण प्रत्याशी ने लोकतंत्र की सबसे ऊंची सदन की चौखट चूमी है। सर्वाधिक 3 लाख ब्राह्मण मतदाता है, जो कुल मतदाताओं के 15 प्रतिशत के आसपास है। इसके बाद डेढ़ लाख गुर्जर मतदाता लोकसभा क्षेत्र में है। नाथद्वारा से आकर सीपी जोशी भी यहां से सांसद रहकर केंद्र में मंत्री बन चुके हैं। कोटा सीट पर भी जातिगत समीकरणों का ख्याल साफ नजर आता है। इस सीट को ब्राह्मण राजपूत सीट माना जाता है। 

जातिगत समीकरण राजस्थान में किस कदर हावी है, इसकी झलक विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिली थी। पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा ने 31 सीटों पर एक ही जाति के उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे। 15 सीटों पर जाट समाज के उम्मीवारों में सीधा मुकाबला रहा, वहीं सात सीटों पर ब्राह्मण समाज के उम्मीदवारों, चार सीटों पर राजपूत समाज के उम्मीदवारों और दो-दो सीटों पर गुर्जर और यादव समाज के उम्मीदवारों के बीच सीधा मुकाबला रहा। अब लोकसभा चुनाव में भी टिकट का बंटवारा जाति के आधार पर ही होगा और मुद्दे व व्यक्ति गौण रह जाएंगे, ऐसे में देखना यह है कि जाति के जयकारे की यह परिपाटी जारी रहती है या नहीं।

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