जनसंख्या विस्फोट पर प्रधानमंत्री, छोटा परिवार रखना भी राष्ट्रभक्ति

FirstIndia Correspondent Published Date 2019/08/16 03:21

 नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ( Prime Minister Narendra Modi ) ने जनसंख्या विस्फोट ( Population Explosion ) को बड़ी चुनौती बताते हुए कुछ अहम सुझाव दिए हैं. उन्होंने किसी तरह के रेगुलेशन की घोषणा तो नहीं की लेकिन ये संकेत जरूर दिया कि उनकी सरकार इसको लेकर संजीदा है.लाल किले से अपने छठे संबोधन में प्रधानमंत्री ने दो ऐसी पहल के संकेत दिए हैं, जिन पर कोई भी समझदार इंसान सवाल नहीं उठा सकता। पहला प्लास्टिक पर बैन और दूसरा जनसंख्या नियंत्रण
प्रधानमंत्री की बातों से यही लगा कि जनसंख्या नियंत्रण केंद्र सरकार की अगली बड़ी पहल हो सकती है.प्रधानमंत्री ने जनसंख्या की भयावह होती जा रही स्थिति से खुद लोगों को होने वाली परेशानियों का जिक्र किया। जनसंख्या नियंत्रण को देश प्रेम और देश भक्ति से जोड़ा.लेकिन साथ ही ये भी कहा कि ये काम सबसे ज्यादा जागरूकता से ही संभव है
2016 के मई महीने में एक रिपोर्ट आई थी। तब इस पर ज्यादा चर्चा नहीं हुई। लेकिन आज प्रधानमंत्री ने जनसंख्या विस्फोट के विस्फोटक मुद्दे को छेड़ ही दिया है, तो करीब सवा तीन साल पहले आए उन आंकड़ों को फिर से खंगालने की जरूरत है। आंकड़ों के मुताबिक 2001 में भारत में एक परिवार में सदस्यों की औसत संख्या 4.67 थी, जो 2011 में घटकर 4.45 पर आ गई।

2011 के इन आंकड़ों के मुताबिक एक दशक में एक भारतीय परिवार के औसत आकार में 5.3 प्रतिशत की कमी आ गई. लेकिन सबसे खास तथ्य इससे आगे है. इसी एक दशक में (2001 से 2011) एक भारतीय मुस्लिम परिवार (पुरुष प्रमुख वाले) के औसत आकार में 11.1 प्रतिशत की बड़ी कमी आई. यानी देश के औसत के दोगुने से भी ज्यादा. जबकि पूरे मुस्लिम समुदाय की बात करें, तो इन दस वर्षों में भारतीय मुस्लिम परिवारों के अंदर सदस्यों की संख्या औसतन 8.19 प्रतिशत कम हो गई. 2001 में एक मुस्लिम परिवार में सदस्यों की संख्या का औसत  5.61 था, जो 2011 में 5.15 रह गया 

यानी देश के लोग अब उतने नादान नहीं, जितना कई बार हम उन्हें समझते हैं.लोग खुद जनसंख्या को नियंत्रित कर रहे हैं. यानी अगर छोटा परिवार रखना भी एक किस्म की देशभक्ति है.तो ये काम अब ज्यादातर लोग कर रहे हैं. हिन्दू भी, मुसलमान भी.तो रही बात धर्मों के आधार पर बांटकर देखने की, तो यहां इसका कोई औचित्य ही नजर नहीं आता
जनसंख्या पर काबू रखना लोगों की जिम्मेदारी है.जागरूकता फैलाने से लेकर सरकारें (केंद्र और राज्य) इसमें कई तरह की पहल कर सकती हैं. लेकिन एक सीमा के आगे सरकार की भूमिका (दखल) भी इस संवेदनशील मोर्चे पर सीमित ही हो जाती है। मगर जो जनसंख्या है उसे क्वालिटी लाइफ (गुणवत्ता वाली जिंदगी) देना सरकार का काम है. क्या सरकारें ये कर पा रही हैं? एक गरीब के लिए बेहतर स्वास्थ्य, साफ पानी, उचित शिक्षा की व्यवस्था क्या सरकारें कर पा रही हैं? एक पूरा चक्र है.अशिक्षा-अभाव-गरीबी का चक्र. याद रहे कि जनसंख्या विस्फोट को इस चक्र का सह उत्पाद भी माना गया है
फिर भी अगर आंकड़े कह रहे हैं कि लोग जनसंख्या को नियंत्रित कर रहे हैं, तो इसकी भी वजह है. ये वह वर्ग है, जो अपने बच्चों के लिए बेहतर स्वास्थ्य और शिक्षा से समझौता करने को तैयार नहीं है.ये वर्ग देख रहा है कि हद से ज्यादा महंगी हो चुकी शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था उसकी पहुंच से बाहर हो रही है. ऐसे में समाज का बहुत बड़ा वर्ग मजबूर है कि अपना परिवार या तो न बढ़ाए या फिर बेहद सीमित तरीके से बढ़ाए. लेकिन ये च्वाइस नहीं है। हालात से समझौता है. भारी मन से लिया गया फैसला है. इसी से बचना है. कोशिश ये होनी चाहिए कि लोग स्वत: और खुशी-खुशी फैसले लें कि चाहे तो वह कितने भी समृद्ध हों, परिवार में एक या दो बच्चे ही लाएंगे. सिस्टम और सरकारों को लोगों के बीच इस भाव को गहराई से बिठाना होगा कि वे प्रधानमंत्री की बातों को समझें. मानना शुरू करें कि छोटा परिवार रखना भी एक तरह से देश भक्ति है

First India News से जुड़े अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करे!
हर पल अपडेट रहने के लिए अभी डाउनलोड करें First India News Mobile Application
लेटेस्ट वीडियो के लिए हमारे YOUTUBE चैनल को विजिट करें

और पढ़ें

Most Related Stories

Stories You May be Interested in