VIDEO: सरिस्का टाइगर रिजर्व में खुलेआम तस्करी का खेल, जंगल के राजा का हो रहा सस्ता सौदा!

VIDEO: सरिस्का टाइगर रिजर्व में खुलेआम तस्करी का खेल, जंगल के राजा का हो रहा सस्ता सौदा!

VIDEO: सरिस्का टाइगर रिजर्व में खुलेआम तस्करी का खेल, जंगल के राजा का हो रहा सस्ता सौदा!

जयपुर: आखिर एक बाघ की कीमत कितनी है...पांच मन अनाज और दो किलो देशी घी..! या फिर दस हजार रुपए..! सुनने में भले ही अचरज भरा लगे लेकिन सरिस्का को बाघविहीन करने की कीमत ये ही थी. और हां...करीब एक वर्ष पूर्व सरिस्का में जिस बाघ को फंदा लगाकर मारा गया उसके पीछे भी चंद पैसे ही थे. आज हम आपको बता रहे हैं सरिस्का में शिकार को धंधा मामने वाले बावरिया लोगों का एक ऐसा सच जो आपको हैरान कर देगा. 

यहां 30 से ज्यादा बाघ थे जो शिकारियों के हाथों अपनी जान गंवा बैठे थे: 
उत्तर भारत के सबसे बड़े टाइगर रिजर्व सरिस्का को वर्ष 2005 से पहले बाघविहीन कर दिया गया था. वर्ष 2005 से पहले यहां 30 से ज्यादा बाघ थे जो शिकारियों के हाथों अपनी जान गंवा बैठे थे. सरिस्का की इस दिल दहला देने वाली घटना को अंजाम दिया था वन्यजीवों की तस्करी करने वाले अंतरराष्ट्रीय गिरोह ने. लेकिन एक सच और भी है जिसे जानना आप सबके लिए जरूरी है. जी हां...इस गिरोह के लिए शिकार करते थे यहां के बावरिया जाती के वो लोग जो गरीब, भुखमरी, प्रशासनिक अनदेखी का शिकार थे. इन बावरिया जाती के लोगों को अंतरराष्ट्रीय गिरोह के शातिर तस्कर चंद पैसों या फिर अनाज आदि उपलब्ध कराने का लालच देते थे और ये बावरिया लोग बाघ को फंदा लगाकर या टोपीदार बंदूकों से मार दिया करते थे. पिछले वर्ष भी सरिस्का में एक बाघ को फंदा लगाकर मार दिया था. इस मामले में भी बावरिया लोगों का ही हाथ, गिरफ्तारी भी हुई और कानूनी खानापूर्ति भी लेकिन शिकार क्यों किया और किसके लिए किया इसकी तह तक कोई नहीं गया. फर्स्ट इंडिया न्यूज़ के वरिष्ठ संवाददाता निर्मल तिवारी ने इस सच को जानने के लिए जोखिम उठाने का फैसला किया और कैमरा साथी के जा पहुंचे सरिस्का के उस क्षेत्र में जहां बावरिया परिवार दुनिया की नजरों से दूर और एक पेड़ और झाड़ियों से ढके टीले पर रह रहा था. 

रिजर्व क्षेत्र में बसे 29 गांव शिकारियों को शरण देते रहे: 
सरिस्का के बाघविहीन और और उसके बाद बाघों के पुनर्वास में आ रही समस्या का कारण है रिजर्व क्षेत्र में बसे वो 29 गांव जो या तो शिकारियों को शरण देते रहे हैं या फिर उनके रिजर्व क्षेत्र में रहने से निगरानी, सुरक्षा और संरक्षा सब के लिए जंगलात महकमा जूझता रहा है. असल में यह कहना ज्यादा सही होगा कि शिकारियों या वन्यजीवों की तस्करी करने वाले शातिर लोगों द्वारा इन ग्रामीणों को लोभ लालच दिया जा रहा जिसके चलते ये जंगल छोड़कर मुख्य धारा में आने को तैयार नहीं. क्योंकि ये गांव जंगल से बाहर निकल गए तो शिकारियों के लिए जंगी में घुसना और छुपना असंभव हो जाएगा. राज्य सरकार ने जंगल में बसे इन गांवों के लिए अच्छा खासा पैकेज दे रखा है. इस पैकेज के तहत 25 वर्ष से उससे अधिक के ग्रामीण को विस्थापन की एवज में छह बीघा भूमि, 600 वर्गगज का रिहायशी प्लॉट और ढाई लाख रुपए. इसके बावजूद ये ग्रामीण बाहर जाने को तैयार नहीं. इन ग्रामीणों को शिकारियों और तस्करों ने इस कदर गुमराह कर रखा है कि वो अपनी आने युवा पीढ़ी और आने वाली नस्ल को आधुनिक भारत से जोड़ने को तैयार ही नहीं. यहां के बिजली नहीं है, स्कूल और अस्पताल तो दूर की बात है. बच्चे टेलीविजन, कंप्यूटर और इंटरनेट जैसे नामों से वाकिफ ही नहीं है. अशिक्षा का अंधेरा पसरा पड़ा है. 

सरिस्का की त्रासदी ही यही है कि गांवों का विस्थापन नहीं हो पा रहा: 
सरिस्का की त्रासदी ही यही है कि गांवों का विस्थापन नहीं हो पा रहा. इसी कारण यहां न तो बाघ सुरक्षित हैं और न ही आधुनिक भारत की वो भावना जिसमें कहा जाता है कि युवा तो देश का भविष्य हैं. शिकारी अभी भी मौजूद हैं, बाघों से खतरा टला नहीं है. जंगलात महकमा चौकन्ना है और साधन संपन्न भी लेकिन बिना गांवों के विस्थापन के वो भी कुछ करने की स्थिति में नहीं है. अब देखना होगा कि बाघों की शरणस्थली से गांवों को कब बाहर भेजा जाएगा. 

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