VIDEO: 119 साल पहले बना था 'शाही' स्टेशन, अनदेखी के चलते बदरंग हो रही विरासत 

Nirmal Tiwari Published Date 2019/04/10 01:45

जयपुर। आइए अब आपको बताते हैं तत्कालीन जयपुर रियासत के उस विमान भवन के हाल, जो कभी जयपुर महाराज का खुदका रेलवे स्टेशन था। जिसके मेहमान देश विदेश के खास लोग हुआ करते थे। जी हां...तब का विमान भवन आज भू प्रबंध विभाग का हैडक्वार्टर है। जिसमें हैरिटेज से खुलेआम छेड़छाड़ की जा रही है। पेश है 'फर्स्ट इंडिया न्यूज़' की खास रिपोर्ट:

ब्रिटिश रेलवे ने वर्ष 1874 में बांदीकुई से आगरा ट्रेन चलाई और अगले वर्ष यानी 1875 में जयपुर रेलवे स्टेशन तैयार किया। तब रेलवे का इस्तेमाल करने के लिए जयपुर राज परिवार को भी रेलवे स्टेशन जाना पड़ता था। इस पर जयपुर रियासत के ततकालीन महाराजा माधोसिंह ने ब्रिटिश वायसराय से बात कर खुदका रेलवे स्टेशन तैयार करवाया। यह रेलवे स्टेशन आज से 119  साल पहले यानी वर्ष 1900 में बनकर तैयार हुआ, जिसे विमान भवन नाम दिया। डाक बंगले के पीछे और खासा कोठी से ठीक पहले बने इस भवन तक जयपुर महाराज की शाही ट्रेन आती थी। महाराजा माधोसिंह कई दिन तक खासाकोठी मे रहकर ढूंढाड़ के जयपुर राज्य का शासन चलाते थे। इसकी वजह यह रही कि माधोसिंह द्वितीय अपना हर काम शुभ मुहूर्त के अनुसार करते थे। जब भी उनको जयपुर के बाहर रेल से जाना या आना होता तब वे मुहूर्त के मुताबिक कई दिन पहले सिटी पैलेस से रवानगी ले कर खासाकोठी में रहने लग जाते। रेल आने में जितने दिन का फर्क रहता तब तक वे कोठी में रहकर शासन चलाते। 

1902 में उन्होंने इंग्लैण्ड जाने के लिए मुहूर्त के हिसाब से कई दिन पहले ही सिटी पैलेस को छोड़ दिया। सवाई राम सिंह की मृत्यु के बाद माधोसिंह को महाराजा बनाने के लिए टोंक रिसाला से लाया गया तब उनके साथ आए रिसाला के सैनिक खासा कोठी में रहे। उन मुसलमान सैनिकों की टोंक रिसाला मस्जिद खासा कोठी के बाहर बनी हुई है। रेलवे स्टेशन से खासा कोठी के विमान भवन तक पटरियां डाल शाही रेलवे स्टेशन कायम किया गया। इसमें राजा का जनाना व मर्दाना शाही सैलून खड़ा रहता। गर्मी में कोठी परिसर की तपती बालू रेत पर मशकों से भिश्ती पानी छिड़़कते। तब मिट्टी की सौंधी सुगंध महाराजा को गर्मी से निजात दिलाती।  बहरहाल आजादी के बाद वर्ष 1949 में इस विमान भवन को भू प्रबंध विभाग के मुख्यालय में तब्दील कर दिया गया। तबसे आज तक विमान भवन इसी विभाग के पास है जो अब इस विमान भवन के हैरिटेज स्वरूप को बदरंग करता जा रहा है। विमान भवन की छत पर नीले रंग की चद्दर डाल दी गई हैं। यहां के कंगूरे टूट गए हैं शाही चिन्ह बदरंग हो गया है। अंदर पार्टीशन लगा दिए हैं। पटरियां जमीदोज कर दी गई हैं और कुएं व कुंड को कचरे से पाट दिया है। 

यहां के रिटायर्ड अधिकारी हरीश अग्रवाल की माने तो तत्कालीन अधिकारी डीसी जैन ने इस भवन में म्यूजियम बनाने की कवायद शुरू की थी, जो आज तक पूरी नहीं हुई है। पुराने समय के सर्वे के पारंपरिक उपकरण रखे जाने थे। ऐसा हैदराबाद में भी है। साथ ही सभी कलक्टर से वसीयतों को एकत्रित कर डेटा रखने की योजना थी। अब मॉडर्न रिकॉर्ड रूम बनवाया है, जिसमें सभी रिकॉर्ड को स्कैन कराकर रखा जाएगा।  हरीश अग्रवाल कहते हैं, मैं यहां 1988 से यहां कार्य कर रहा हूं। 153 साल पहले के रेवेन्यू रिकॉर्ड में भवन का जिक्र है, जो उर्दू-फारसी में है। यही कारण है, आज भी इसका स्वरूप वैसा ही बना हुआ है। वही पीला रंग और बड़े दरवाजा आज भी यहां कार्य करने वालों को आकर्षित करती है। बस अंदर दीवारें बनाकर पार्टिशन कर दिया गया है। उस समय का लिखा बिमाण भवन आज भी देखने को मिलता है, क्योंकि उस समय तेजी से चलने वाले वाहनों को बिमाण भी कहा जाता था। 

इसी परिसर में वह स्थान भी है, जहां शाही बग्घियां आदि रखी जाती थीं। पूर्वराजमाता स्व. गायत्री देवी ने शादी के बाद अपना पहला कदम यहीं रखा। यहीं से वे तैयार होकर राजमहल के लिए रवाना हुई। अजमेर रोड गोपालबाड़ी स्थित करीब सवा सौ साल पुराना विमान भवन आज भी लगभग उसी रूप में दिखाई देता है। हालांकि इसे म्यूजियम बनाया जा सकता था, जिसके लिए कवायद भी हुई लेकिन सफलता नहीं मिली। यह शाही रेलवे स्टेशन हुआ करता था। कभी राजा-महाराजाओं की ट्रेनों के सैलून (डिब्बे) यहां खड़े होते थे। आज भी स्मृतियां यहां दिखाई देती हैं। यहां सेटलमेंट ऑफिस और जागीर विभाग के साथ जलदाय कार्यालय भी है, जहां सरकारी तंत्र कार्य करता है। यहां कार्य करने वाले लोग इसे करीब सवा सौ साल पुराना बताते हैं। सैलूनों, जिसे बिमाण भी कहा जाता है रखने के काम आता था। करीब 1949 तक यहां सैलून आते रहे और उसके बाद यहां से पटरियां हटाई गईं। कुछ पटरियां आज भी फर्श के नीचे दबी हैं। शाही चिह्न, गोपाल विलास और गंगा विलास नाम के कमरे शाही कुआं आज भी यहां मौजूद है। 

आजादी के बाद स्टेट राज खत्म होने के बाद यह शाही स्टेशन खत्म हो गया और सरकारी ऑफिस खोल दिया गया। 1949 स्थापित हुआ कार्यालय। एक आईएएस, चार आरएएस, छह तहसीलदार सहित करीब 200 कर्मचारी यहां कार्यरत हैं। पातालतोड़ कुआं (अब सूख चुका), शाही बावड़ी, शाही चिन्ह, विशाल पुराने दरवाजा, यार्ड आदि सभी यहां आज भी हैं। लेकिन हालत बदरंग हो चुकी है। बेहतर होगा सरकार इस विमान भवन के हैरिटेज स्वरूप को बरकरार रखने के लिए यहां हैरिटेज संरक्षण करवाकर हमारी विरासत को संजीवनी दे।

... संवाददाता निर्मल तिवारी की रिपोर्ट 


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