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121 साल प्राचीन हरियाली अमावस का मेला जहां पुरूषों की रहती है नो एंट्री
121 साल प्राचीन हरियाली अमावस का मेला जहां पुरूषों की रहती है नो एंट्री

उदयपुर: देश में सालभर में कई मेले लगते है जो किसी देव या देवी को समर्पित है. लेकिन उन सब से अलग मेवाड़ का 121 साल प्राचीन हरियाली अमावस का मेला जो समरसता की मिठास घोल रहा है. साथ ही यह अपने आप में सबसे अलग और अनूठा भी है. इस दो दिवसीय मेले के दूसरे दिन केवल महिलाओं और युवतियों का ही प्रवेश रहता है और पुरूषों की नो एंट्री रहती है. आखिर ऐसी क्या खासियत है इस मेले की. आईए आपकों को भी बताते है महिलाओं के उत्थान के साथ मेवाड़ की संस्कृति के लिए देशभर में मिसाल बने इस मेले की कुछ हकीकत.

मैनेजमेंट भी महिलाओं के हाथों में: 
आदिवासी अंचल के साथ ही शहर से अपनी सखी सहेलियों के साथ आने वाली महिलाएं इस मेले में अपने आप को स्वतंत्र महसूस करते हुए जमकर आनंद लेती है. महिलाओं की माने तो इस दिन कोई भी पुरूष उनके साथ या आस-पास नहीं होता है जिससे वे डोलर-चकरी के साथ ही गर्म और स्वादिष्ट पकवानों का भी लुत्फ ले पाती है. हर रोज घरेलू कामकाज में अपने आप को व्यस्त रखने वाली महिलाओं की इस मेले में खुशी भी परवान पर होती है और वे बिना किसी हिचकिचाहट और रोकटोक के मेले में सौंदर्य, साज-सज्जा सहित जरूरत की चीजे भी खरीदती है. अमूमन इस मेले की पूरी बागड़ोर और मैनेजमेंट भी महिलाओं के हाथों में ही होता है. नगर निगम की ओर से भी मेले में रियायती दरों पर दुकाने आवंटित की जाती है ताकि प्रदेश के साथ ही आसपास के राज्यों से आने वाली इन महिला दुकानदारों को अच्छी खासी आमदनी हो सके. 

महाराणा फतहसिंह ने प्रारंभ किया था मेला: 
लोककलाविदों की माने तो यह मेला महाराणा फतहसिंह ने सन् 1899 में प्रारंभ किया था. जब फतहसागर की पाल बन गई तब महाराणा ने इसके अवलोकन का एक दिन मानस बनाया और उस दिन संयोगवश हरयाली अमावस ही थी. महाराणा फतहसिंह गजे-बाजे  के साथ दरबारियों सहित पाल पर पधारे. इस खुशी के पल का साक्षी बनने के लिए बडी संख्या में पाल पर शहरवासी भी उमड़े और एक खास मेले सा नजारा बन गया. यही नहीं इस दिन मौसम भी बेहद सुहावना भी था. इस मौके पर महाराणा जनता जनार्धन को दर्शन देकर अपनी रानी चावडी के साथ पाल की उंची पहाडी पर स्थित नीमच माता के दर्शन के लिए गए तो लौटते समय महारानी ने महाराणा से निवेदन किया कि केवल एक दिन से उनका मन नहीं भरा. रानी के इसी निवेदन पर दरबार ने मेले की अवधि दो दिन कर दी और कहा कि दूसरे दिन केवल जनानियों यानी महिलाओं का ही प्रवेश मेले में रहेगा. बस इसी दिन से महिलाओं के लिए इस अनूठे मेले की शुरूआत हो गई. 

बहरहाल घूंघट प्रथा के बावजूद इस सराहनीय आयोजन ने महिला अधिकारिता को एक विशेष स्थान दिलाया है, यही वजह है कि मेवाड के इस पारंपरिक मेले को दुनियाभर में और पहचान मिल सके इसकों लेकर भी नगर निगम की ओर से गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकोर्ड में भी आवेदन किया गया है.

...पंकज शर्मा, फर्स्ट इंडिया न्यूज, उदयपुर

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