राजस्थान में एक ऐसी दरगाह जहां श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर लगता है मेला, कौमी एकता की जीवंत मिसाल

FirstIndia Correspondent Published Date 2019/08/22 11:17

सुल्ताना(झुंझुनू): जिला मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर दूर स्थित शक्कर बार पीर बाबा की दरगाह में कौमी एकता की जीवंत मिसाल देखने को मिलती है. यहां सभी धर्मो के लोगों द्वारा अपने रीति रिवाजों से पूजा-अर्चना देखने को मिलती है. कौमी एकता के प्रतीक के रूप में यहां प्राचीन काल से ही कृष्ण जन्माष्टमी के दिन विशाल मेले का आयोजन किया जाता है. जोकि तीन दिन तक चलता है. जिसमें देश के विभिन्न हिस्सों से हिंदुओं के साथ मुस्लिम भी पूरी श्रद्धा से शामिल होते है. इस बार 23 अगस्त से 25 अगस्त तक मेला आयोजित होगा. इसकी तैयारियां भी शुरु हो चुकी है.  

किसी समय इसके गुबंद से शक्कर बरसती थी:
झुंझुनू जिले के नरहड़ स्थित इस दरगाह के बारे में कहा जाता है कि किसी समय इसके गुबंद से शक्कर बरसती थी. इसी कारण यह दरगाह शक्कर बार बाबा के नाम से जानी जाती है. शक्कर बार शाह अजमेर की सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के समकालीन थे. यहां जायरिन मजार पर चादर, वस्त्र, नारियल, मिठाइयां आदि चढ़ाते है. लोगों के मुताबिक इस मेले की रस्म 700 वर्षो से भी ज्यादा पुरानी है. लोग पीढ़ी दर पीढ़ी इसे निभा रहे है. 1947 में जब भारत-पाक विभाजन के दौरान पूरे देश में तनाव था, तब भी नरहड़ में शांति का माहौल रहा और लोग इस मेले में शरीक हुए.  

सांस्कृतिक और धार्मिक समागम की अनोखी मिसाल: 
दरगाह में भगवान कृष्ण के जन्म पर आयोजित होने वाला जन्माष्टमी उत्सव सांस्कृतिक और धार्मिक समागम की अनोखी मिसाल है. दरगाह में अजान के साथ-साथ आरती भी गूंजती है. नरहड शरीफ भारत की ऐसी पहली दरगाह है जहां पर श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर मेला आयोजित होता है जिसमें हिन्दु और मुस्लिम दोनो समुदाय के लोग बिना किसी समुदाय के भेदभाव से एक साथ जन्माष्टमी पर्व मनाते है. नरहड़ दरगाह में हिन्दू एवं मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग आपस में मिलजुल कर रहते है. दिलचस्प बात तो ये है कि ये मेला दरगाह कमेटी की देखरेख में होता है और मेले को सफल बनाने के लिए हिंदू एवं मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग आपस में सहयोग करते है. 

जन्माष्टमी के मेले में देशभर से लोग करने आते है जियारत: 
जन्माष्टमी के मेले में देशभर से लोग जियारत करने आते है. जियारत के लिए हरियाणा, यूपी, बिहार, गुजरात, पंजाब, कलकत्ता से लोग आते है और मन्नते मांगते है और मन्नत पूरी होने पर जियारत करने आते है. जन्माष्टमी पर कव्वाली के कार्यक्रम चलते है तो वहीं मुस्लिम भाई लंगर लगाते है तथा हिंदू समुदाय के लोग भण्डारे का आयोजन करते है. सबसे बड़ी बात तो ये है कि मेले का काफी पुराना इतिहास है लेकिन आज तक एक बार भी ऐसी घटना नहीं हुई कि हिंदू एवं मुस्लिम दोनों समुदाय में कभी टकराव की स्थिति बनी हो.  

छप्पन भोग की झांकी सजाई जाती है: 
मेले पर विशेष तौर पर दरगाह की सजावट होती है और छप्पन भोग की झांकी सजाई जाती है. ढ़ोल-नगाड़े के साथ इस मेले की शुरुआत होती है जोकि पूरे दिन चलते रहते है. इसके बाद तीन दिन तक दूर-दराज से जायरिनो का आना शुरु हो जाता है.  

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