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एक ऐसा मंदिर जहां मातारानी करती है ढाई प्याला शराब का सेवन

एक ऐसा मंदिर जहां मातारानी करती है ढाई प्याला शराब का सेवन

मेड़ता सिटी(नागौर): भारत भूमि ऋषि मुनियो और देवी देवताओ की पावन भूमि है. जहां प्राचीन काल से ऋषि मुनियो ने परमार्थ और मानव मात्र की सेवार्थ कठोर तपस्या और साधना से जन जन को अभिभूत किया. वहीं यहां ऐसे देवी देवताओ के मन्दिर और स्थान है जो आज भी अपने चमत्कारो से आज के इस वैज्ञानिक युग में भी श्रदालुओं की आस्था के केंद्र बने हुए है. 

दिखावा या खोटी नियत से चढ़ाया प्रसाद नहीं लेती माता रानी: 
यह मंदिर लगभग 11वीं सदी में निर्मित माना जाता है. जहां माता जी ढाई प्याला शराब प्रसाद के रूप में ग्रहण करती है. सुनने में भले ही यह अजीब लगता है लेकिन यह सच है की माता रानी को सच्चे मन से प्रसाद चढ़ाया जाता है तो वो उसे ग्रहण करती है लेकिन दिखावा या खोटी नियत से चढ़ाया प्रसाद वो नहीं लेती. कई बार ऐसा भी होता है की एक ही परिवार के कुछ सदस्यों से माता रानी ने प्रशाद स्वीकार किया तो कुछ सदस्यों से प्रशाद को नकार दिया. 

मंदिर का जीणोदार अजमेर के चौहान वंशीय राजाओ ने करवाया: 
इतिहास की दृष्टि से स्थानीय निवसियों के अनुसार मंदिर का जीणोदार अजमेर के चौहान वंशीय राजाओ ने रुद्राणी और ब्रह्माणी माता की दो प्रतिमाये स्थापित की इनकी रक्षार्थ काले और गौरे भेरू की दो प्रतिमाये भी स्थापित की जहां रुद्राणी माता की प्रतिमा भक्तों से चांदी के बने प्याले से ढाई प्याले मदिरा ग्रहण करती है. आधा शेष प्याला समीप स्तिथ भैरव को चढ़ाया जाता है. ब्राह्मणी माता को भक्त जन नारियल और चूरमा बाटी चढ़ाते है और मनोकामना पूरी होने पर रात्रि जागरण और दाल बाटी चूरमे का भोग लगते है. 

शारदीय और चैत्र नवरात्र में श्रदालुओं की भारी भीड़: 
यूं तो मन्दिर में साल भर भक्तों का तांता लगा रहता है लेकिन शारदीय और चैत्र नवरात्र में श्रदालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है. लगभग पूरे उत्तर भारत से भक्त यहां आते है. इसी वजह इन दिनों में आश्विन के नवरात्रा में घट स्थापना के साथ मन्दिर में विधिवत धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा के साथ 9 दिवसीय उत्सव चल रहा है. 

नवरात्र के मौके पर यहां भक्तों का भारी जमावड़ा लगता है: 
इस पावन पर्व पर भक्तजन मां के दर्शन के लिए मंदिर में जाते हैं और प्रसाद चढ़ाते हैं. यहां प्रसाद के रूप में लड्डू, फल या फिर पेड़े नहीं बल्कि ढाई प्याला शराब चढ़ाई जाती है. नवरात्र के मौके पर यहां भक्तों का भारी जमावड़ा लगता है. लोग दूर-दराज से इस चमत्कारिक मंदिर के दर्शन करने आते हैं. इस मंदिर की मान्यता है कि यहां माता ढाई प्याला शराब ग्रहण करती हैं. साथ ही बचे हुए प्याले की शराब को भैरव पर चढ़ाया जाता है.  

इस मंदिर का निर्माण डाकूओं ने करवाया था: 
कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण डाकूओं ने करवाया था. किसी जमाने में इस मंदिर की पहाड़ी से घी बहता था. शिलालेख से पता चलता है कि मंदिर का निर्माण विक्रम संवत् 1380 को हुआ था. मंदिर के चारों ओर देवी-देवताओं की सुंदर प्रतिमाएं व कारीगरी की गई है. मंदिर के ऊपरी भाग में गुप्त कक्ष बनाया गया था, जिसे गुफा भी कहा जाता है. संसद जैसा दिखने वाला यह मंदिर तांत्रिक यूनिवर्सिटी कहलाता था. यहां माता काली व ब्राह्मणी दो स्वरूप में पूजी जाती हैं. मंदिर में आने वाले भक्तजन ब्रह्माणी देवी को मिठाई और काली को शराब का भोग चढ़ाते हैं. स्‍थानीय लोग बताते हैं कि यह मंदिर काफी चमत्कारिक भी है, यहां से कोई भी भक्त कभी खाली हाथ नहीं जाता. विशेष तौर पर नवरात्र के अवसर पर हजारों लोग मनोकामना के लिए दूर-दूर से आते हैं, माता के चमत्कार से मनवांछित फल पाते हैं.  

मुगलों ने इस मंदिर में दर्शन बंद कर दिए थे: 
बताया गया है कि मुगलों ने इस मंदिर में दर्शन बंद कर दिए थे, बाद में कई वर्षों बाद माता के दर्शन बहाल हुए. कहा जाता है कि भुवाल माता एक खेजड़ी के पेड़ के नीचे पृथ्वी से स्वयं प्रकट हुई थीं. इस स्थान पर डाकुओं के एक दल को राजा की फौज ने घेर लिया था. मृत्यु को निकट देखकर उन्होंने मां को याद किया. मां ने अपनी शक्ति से डाकूओं को भेड़-बकरी के झुंड में बदल दिया. इस प्रकार डाकूओं के प्राण बच गए और उन्होंने मंदिर का निर्माण करवाया.  

माता को मदिरा का भोग लगते देख हैरान रह जाते कई लोग: 
कोई भक्त मंदिर में मदिरा लेकर आता है तो पुजारी उससे चांदी का ढाई प्याला भरता है. इसके बाद वह देवी के होठों तक प्याला लेकर जाता है. इस समय देवी के मुख की ओर देखना वर्जित होता है. माता अपने भक्त से प्रसन्न होकर तुरंत ही वह मदिरा स्वीकार कर लेती हैं. प्याले में एक बूंद भी बाकी नहीं रहती. माता को मदिरा चढ़ाने का एक नियम भी है. श्रद्धालु ने जितना प्रसाद चढ़ाने की मन्नत मांगी है, मां को उतने ही मूल्य का प्रसाद चढ़ाना होता है न उससे कम और न उससे अधिक. नवरात्र में इस दौरान यहां देश-विदेश से कई लोग आते हैं और माता को मदिरा का भोग लगते देख हैरान रह जाते हैं. माता के इस दरबार के कई चमत्कारिक किस्से इस क्षेत्र के लोग सुनाते हैं. कहा जाता है कि जो भी भक्त मन से इस मंदिर में अपनी मुराद लेकर आया कभी खाली हाथ नहीं लौटा. यूं तो और कई चमत्कारिक मंदिर हैं मगर इस मंदिर की कुछ अलग ही विशेषता है. 

...सुनील पुरी फर्स्ट इंडिया न्यूज मेड़ता सिटी, नागौर
 

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दोनों ही जगहों पर प्रशासन की ओर से केवल 5—5 नमाजियों को नमाज की अनुमति दी गयी थी. प्रशासन की गुजारिश पर ईदगाह में सुबह 6 बजे तो वही जामा मस्जिद में सुबह सवा 6 बजे नमाज अदा करायी गयी. नमाज के बाद मुल्क और मुल्म की अवाम को कोरोना से निजात के लिए खास दुआ भी की गयी. वहीं नमाज के नमाजियों ने मौके पर मौजुद पुलिसकर्मियों को ईद की मुबारकबाद देते हुए उनके जज्बे लिए सलाम किया.

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नई दिल्ली: जम्मू-कश्मीर और केरल में आज ईद मनाई जा रही है. लोगों ने घरों में ही ईद की नमाज अदा की. वहीं केरल में भी आज ईद मनाई जा रही है. मालापुरम में लोगों ने ईद की नमाज घर पर ही अदा की. वहीं जम्मू-कश्मीर से अलग हुए लद्दाख में शनिवार को ईद मनाई गई. लद्दाख, करगिल क्षेत्र में शुक्रवार को चांद देखा गया था, इसलिए लद्दाख में 23 मई को ईद-उल-फितर मनाया गया.

देश के अन्य हिस्सों में कल मनाई जाएगी ईद:
जबकि देशभर के अन्य हिस्से में ईद सोमवार को मनाई जाएगी. दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम अहमद बुखारी और फतेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम मुफ्ती मुकर्रम ने शनिवार देर शाम को ऐलान किया कि देशभर में कहीं से चांद दिखने की इत्तला नहीं हुई है लिहाजा ईद-उल-फितर सोमवार को होगी.

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सोशल डिस्टेंसिंग की पालना:
इस बार कोरोना संकट के बीच पूरे देशभर में ईद मनाई जाएगी, जिसमें लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए घर में ही ईद की नमाज अदा करनी पड़ेगी. दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम ने कोरोना वायरस और लॉकडाउन को लेकर लोगों से अपील की है कि बेहद सादगी के साथ घरों में रहकर ईद मनाएं. नमाज भी घर में ही अदा करें. लॉकडाउन में मस्जिदों में आम लोगों के जाने पर पाबंदी है, इसलिए एहतियात बरतें.आपको बता दें कि ईद की नमाज जमात में अदा की जाती है. हालांकि इस बार कोरोना संकट को देखते हुए सभी धार्मिक स्थल बंद हैं, इसलिए मस्जिद में नमाज अदा करने की इजाजत नहीं है.

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नई दिल्ली: लॉकडाउन का उल्लंघन करने के आरोप में दाती महाराज पर केस दर्ज किया गया है. कोरोना वायरस के संकट से निपटने के लिए देशव्यापी लॉकडाउन लागू है. लॉकडाउन के दौरान लोगों से सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने की अपील की गई है. साथ ही लॉकडाउन में धार्मिक कार्यक्रम और लोगों की भीड जुटने पर भी प्रतिबंध है. हालांकि अब दिल्ली में एक धार्मिक कार्यक्रम के आयोजन का मामला सामने आया है.

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लॉकडाउन पर सरकारी दिशा निर्देश के उल्लंघन का आरोप:
सोशल मीडिया पर कुछ तस्वीरें वायरल हो रही हैं. यह फोटोज दिल्ली में असोल के शनिधाम मंदिर की हैं. यहां लॉकडाउन की गाइडलाइन का पालन न करते हुए धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया. इतना ही नहीं, लोगों ने इस कार्यक्रम में सोशल डिस्टेंसिंग का भी ध्यान नहीं रखा.

22 मई की शाम एक मंदिर में कार्यक्रम करने पर केस दर्ज:
पुलिस की शुरुआती जांच के दौरान यह पता चला कि शनिधाम मंदिर के मुख्य पुजारी दाती महाराज के साथ कुछ लोगों ने 22 मई की शाम 7:30 बजे मंदिर में एक कार्यक्रम का आयोजन किया था. मंदिर में लॉकडाउन पर सरकारी दिशानिर्देशों का उल्लंघन किया गया.फिलहाल मामला दर्ज कर जांच की जा रही है. 

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शनि जयंती आज, जानें न्याय के देवता शनि देव के जन्म की कहानी

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जयपुर: ज्‍येष्‍ठ मास की अमावस्‍या यानी आज देशभर में शनि जयंती मनाई जा रही है. ज्योतिषशास्त्र के अनुसार शनि न्यायधीश या कहें दंडाधिकारी की उपाधि से नवाजा गया है. शनिदेव के पास हमारे सभी कर्मों का लेखाजोखा रहता है. वह हर व्‍यक्ति को उसके कर्मों का फल देते हैं. धार्मिक परंपराओं में बताया गया है कि इस दिन शनिदेव का जन्‍म हुआ था. इस अमावस्‍या को ही महिलाएं अपने पति की दीर्घायु का व्रत रखती  हैं और बड़ अमावस्‍या का त्‍योहार मनाती हैं. 

अक्सर शनि का नाम सुनते ही डर लगने लगता है, शनि के प्रकोप का खौफ खा जाते हैं. कुल मिलाकर शनि को क्रूर ग्रह माना जाता है लेकिन असल में ऐसा है नहीं. शनिदेव अच्छे का परिणाम अच्छा और बूरे का बूरा देने वाले ग्रह हैं. अगर कोई शनिदेव के कोप का शिकार है तो रूठे हुए शनिदेव को मनाया भी जा सकता है. शनि जयंती का दिन तो इस काम के लिये सबसे उचित माना जाता है. 

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शनिदेव के जन्‍म की क‍था: 
स्‍कंदपुराण में शनिदेव के जन्‍म की कथा के बारे में विस्‍तार से बताया गया है. राजा दक्ष की कन्या संज्ञा का विवाह सूर्यदेवता के साथ हुआ. सूर्यदेवता का तेज बहुत अधिक था जिसे लेकर संज्ञा परेशान रहती.  वह सोचा करती कि किसी तरह तपादि से सूर्यदेव की अग्नि को कम करना होगा. जैसे तैसे दिन बीतते गये संज्ञा के गर्भ से वैवस्वत मनु, यमराज और यमुना तीन संतानों ने जन्म लिया. संज्ञा अब भी सूर्यदेव के तेज से घबराती थी फिर एक दिन उन्होंने निर्णय लिया कि वे तपस्या कर सूर्यदेव के तेज को कम करेंगी लेकिन बच्चों के पालन और सूर्यदेव को इसकी भनक न लगे इसके लिये उन्होंने एक युक्ति निकाली उन्होंने अपने तप से अपनी हमशक्ल को पैदा किया जिसका नाम संवर्णा रखा और बच्‍चों की देखरेख का जिम्‍मा उसको सौंपकर खुद अपने पिता के घर चली गई.  पिता के साथ न देने पर संज्ञा घोड़ी का रूप लेकर वन में जाकर तपस्‍या करने लगी. वहीं छाया रूप होने के कारण सवर्णा को भी सूर्य के तेज से कोई परेशानी नहीं हुई. सूर्य और संवर्णा के मिलन से फिर 3 संतानें हुईं-मनु, शनिदेव भद्रा.

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एक अन्य कथा के अनुसार शनिदेव छाया के पुत्र होने के कारण वर्ण में काले थे.  जब शनिदेव का जन्म हुआ तो रंग को देखकर सूर्यदेव ने छाया पर संदेह किया और उन्हें अपमानित करते हुए कह दिया कि यह मेरा पुत्र नहीं हो सकता. मां के तप की शक्ति शनिदेव में भी आ गई थी उन्होंने क्रोधित होकर अपने पिता सूर्यदेव को देखा तो सूर्यदेव बिल्कुल काले हो गये, उनके घोड़ों की चाल रूक गयी. परेशान होकर सूर्यदेव को भगवान शिव की शरण लेनी पड़ी इसके बाद भगवान शिव ने सूर्यदेव को उनकी गलती का अहसास करवाया. सूर्यदेव अपने किये का पश्चाताप करने लगे और अपनी गलती के लिये क्षमा याचना कि इस पर उन्हें फिर से अपना असली रूप वापस मिला. लेकिन पिता पुत्र का संबंध जो एक बार खराब हुआ फिर न सुधरा आज भी शनिदेव को अपने पिता सूर्य का विद्रोही माना जाता है. 


 

राम जन्मभूमि के समतलीकरण के दौरान मिल रही देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियां, पुष्प कलश और कलाकृतियां

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नई दिल्ली: अयोध्या में धीरे-धीरे राम मंदिर का काम शुरू हो गया है. इसी बीच राम जन्मभूमि के समतलीकरण के दौरान मंदिर के अवेशष मिलने का दावा किया गया है.  इन अवशेषों में कई पुरातात्विक मूर्तियां खंभे और शिवलिंग. आमलक, कलश और चौखट शामिल हैं. बता दें कि इसी महीने 11 मई से राम जन्मभूमि परिसर में समतलीकरण का काम शुरू हुआ है.

राम मंदिर निर्माण से पहले समतलीकरण ...

अवशेषों के मिलने का सिलसिला शुरू हो चुका: 
सुप्रीम कोर्ट के राम मंदिर के पक्ष में फैसले के बाद अधिग्रहित क्षेत्र में निर्माण की शुरुआती प्रक्रिया शुरू हो गई है. जन्मभूमि परिसर में राम मंदिर निर्माण के लिए तैयारियां व ट्रेंचों को भरने, समतलीकरण और लोहे की जालियों को हटाने का कार्य जोरों पर है. कोरोना संकट को देखते हुए इन जगहों पर सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखा जा रहा है. इसी बीच अवशेषों के मिलने का सिलसिला शुरू हो चुका है.

राम मंदिर निर्माण से पहले समतलीकरण ...

देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियां, पुष्प कलश, कलाकृतियां आदि चीजें निकली: 
जानकारी के अनुसार अब तक जहां-जहां खुदाई हुई है, वहां से और आसपास की जगहों से देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियां, पुष्प कलश, कलाकृतियां आदि चीजें निकली हैं. हालांकि ट्रस्ट की ओर से दी गई जानकारी में अवशेष के बारे में कुछ विस्तार से नहीं बताया गया है. ऐसा बताया जा रहा है कि विशेषज्ञों के निरीक्षण के बाद ही इस पर विस्तार रूप से बताया जा सकता है.

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण से ...

5 फुट आकार के नक्काशीयुक्त शिवलिंग की आकृति भी प्राप्त हुई:
इन अवशेषों में देवी देवताओं की खंडित मूर्तियां, अन्य कलाकृतियां के पत्थर, 7 ब्लैक टच स्टोन के स्तंभ व 6 रेड सैंड स्टोन के स्तंभ और 5 फुट आकार के नक्काशीयुक्त शिवलिंग की आकृति प्राप्त हुई है.


 

22 मई को है वट सावित्री व्रत, जानें क्या है महत्व

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जयपुर: अपने पति की लंबी आयु के लिए हिंदू धर्म में महिलाएं कई व्रत रखती हैं. ऐसे ही व्रतों में से एक है वट सावित्रि व्रत. इस व्रत के प्रभाव से सौभाग्यवती महिलाओं की मनोकामना पूर्ण होती है. उनका सौभाग्य अखंड रहता है. यह व्रत हर साल ज्येष्ठ माह की अमावस्या के दिन मनाया जाता है. ज्येष्ठ अमावस्या को दान पुण्य, पितरों की शांति के लिए सौभाग्यशाली दिन माना जाता है. ज्येष्ठ अमावस्या को शनि देव की जयंती के रूप में मनाया जाता है. 

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उपवास करने से पिछले जन्म के पापों से भी मुक्ति मिलती है:
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो स्त्री उस व्रत को सच्ची निष्ठा से रखती है उसे न सिर्फ पुण्य मिलता है बल्कि उसके पति पर आई सभी विपदा दूर हो जाती हैं. इस दिन भगवान विष्णु की आराधना करने से सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है. अमावस्या पर उपवास करने से पिछले जन्म के पापों से भी मुक्ति मिलती है. 

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वट सावित्री व्रत का महत्व: 
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माता सावित्री अपने पति के प्राणों को यमराज से छुड़ाकर ले आई थी. अतः इस व्रत का महिलाओं के बीच विशेष महत्व बताया जाता है. इस दिन वट (बड़, बरगद) का पूजन होता है. इस व्रत को स्त्रियां अखंड सौभाग्यवती रहने की मंगलकामना से करती हैं. 

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