VIDEO: संगठन की ट्रेनिंग के बाद वैभव गहलोत की 'अग्निपरीक्षा'

FirstIndia Correspondent Published Date 2019/03/31 04:11

जयपुर। वैभव गहलोत के चुनावी समर में उतरने के साथ ही जोधपुर की सियासत में उफान आ गया है। भले ही वैभव का यह पहला चुनाव है, लेकिन गहलोत परिवार के राजनीतिक मुख्यालय के तौर पर जोधपुर को जाना जाता रहा है। वैभव के पिता अशोक गहलोत जोधपुर की सरदापुरा सीट से चुनकर ही विधायक बने और मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे, जोधपुर में विकास के कई सोपान उन्हीं की देन कहे जाते है। कांग्रेस के युवा चेहरे वैभव गहलोत के लिये यह नई पारी का आगाज है, लेकिन संसद में वे तभी पहुंचेंगे जब चुनाव जीतेंगे, क्योंकि मुकाबला है बीजेपी के कद्दावर चेहरे और केन्द्रीय मंत्री  गजेन्द्र सिंह शेखावत से।  खास रिपोर्ट:

युवा कांग्रेस से राजनीतिक पारी की शुरुआत:

युवा कांग्रेस की सियासत से वैभव गहलोत ने अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की थी। इसके बाद वो पीसीसी में आये और सबसे पहले नाथद्वारा से पीसीसी के सदस्य बने थे। उस समय डॉ सीपी जोशी पीसीसी के अध्यक्ष थे और उन्होंने ही वैभव को अपने गृह क्षेत्र नाथद्वारा से पीसीसी का सदस्य बनाया। यूं कह सकते है कि वे नाथद्वारा से प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सदस्य के तौर पर निर्वाचित हुये। इसके बाद वे सचिन पायलट की टीम में प्रदेश कांग्रेस के महासचिव बनाये  गए। सबसे पहली कठिन चुनावी चुनौती मिली उन्हें धौलपुर में जब उन्होंने उपचुनाव में चुनावी मैनेजमेंट संभाला। सरकार भाजपा की थी और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, धौलपुर उनका गृहक्षेत्र है। वैभव ने कांग्रेस पार्टी के धौलपुर प्रभारी के नाते उन्होंने मोर्चा संभाला, यह वैभव का पहला टेस्ट था। हालांकि पार्टी चुनाव नहीं जीती, लेकिन वैभव गहलोत की संगठनात्मक दक्षता को सराहना मिली। 

सियासत को समझने के लिये चुना डॉ सीपी जोशी को:

आगे चलकर वैभव गहलोत ने दो लोकसभा उपचुनावों अजमेर और अलवर में भी काम किया। बाद में रामगढ़ चुनावों में मोर्चे पर तैनात रहे और कांग्रेस पार्टी को जीताने में योगदान दिया। रामगढ़ से चुनावी जीत में वैभव गहलोत की दक्षता से तारीफ हुई। खास बात यह है वैभव गहलोत ने बतौर कार्यकर्ता ही कांग्रेस में अपनी शुरुआत की, नेता बनकर नहीं। कभी झलकने नहीं दिया कि वे कद्दावर नेता अशोक गहलोत के पुत्र है। एन एस यू आई और युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के बीच वे उनके सखा के तौर पर नजर आये तो वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं के सामने एक राजनीतिक विधार्थी की तरह। गहलोत पाठशाला से बढकर राजस्थान की कांग्रेस में दूसरी कोई पाठशाला नहीं कही जाती। इसके बावजूद वैभव ने सियासत को समझने के लिये डॉ सीपी जोशी की अंगुली को थामा। डॉ सीपी जोशी ने ही जिद करके उन्होंने पहली बार पीसीसी डेलिगेटस की सूची में शामिल किया था। 

सचिन पायलट ने भी की वैभव की टिकट में पैरवी:

बाद में डॉ चंद्रभान और फिर सचिन पायलट के साथ काम करने का अवसर मिला। सचिन पायलट ने वैभव के लिये साफ कहा था कि उन्हें चुनावी अवसर मिलना चाहिये वो चुनाव लड़ने के काबिल है। कारण साफ है कि संगठन में रहते वक्त सचिन पायलट ने वैभव की संगठनात्मक कार्यशैली को समझा और जाना। साथ ही जिस टास्क पर भेजा उसे पूरा करने की शिद्दत दिखाई। यहीं कारण है कि सचिन पायलट ने वैभव की टिकट में पैरवी की। वैभव गहलोत को जोधपुर के चुनावी समर में उतार दिया है। पिता के चुनाव लड़ते वक्त उन्होंने जोधपुर के चुनावों को करीब से देखा। बाल्यकाल से ही वैभव ने पिता को चुनाव लड़ते देखा और जोधपुर की गलियों की सियासत को भी समझा है। वैभव गहलोत एक नये और युवा चेहरे के तौर पर जोधपुर के चुनावी समर में है और उनका मुकाबला है मौजूदा सांसद और केन्द्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत से। 

गजेन्द्र शेखावत-वैभव गहलोत आमने-सामने:

गजेन्द्र सिंह शेखावत:
--भाजपा के जोधपुर से उम्मीदवार
--मोदी सरकार में केन्द्रीय कृषि राज्य मंत्री

मजबूत पक्ष: मौजूदा सांसद, कुशल संगठनकर्ता, सोशल मीडिया में दक्ष
आर एस एस का साथ
जातीय समीकरण: राजपूत, ब्राह्मण और वैश्य भाजपा के परम्परागत वोट बैंक माने जाते रहे है

वैभव गहलोत:
--कांग्रेस के जोधपुर से उम्मीदवार
--मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पुत्र
--पहली बार लड़ रहे है चुनाव
मजबूत पक्ष: युवा चेहरा,मिलनसार व्यक्तित्व,जोधपुर में पहले कई चुनावों में चुनावी कार्य संभाला,पिता अशोक गहलोत रह चुके है जोधपुर से सांसद
जातीय समीकरण: माली वोट, ओबीसी वोटों खासतौर पर जाट और विश्नोई परम्परागत तौर पर कांग्रेस के प्रति झुकाव के कारण जाने जाते है
मुस्लिम और दलित यहां ट्रम्प कार्ड बन सकते है वैभव के लिये 

बेहद कम समय में  गजेन्द्र सिंह शेखावत ने राष्ट्रीय राजनीति में पहचान बना ली और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की नजरों में चढ़ गये। बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष पद के लिये उनका नाम चला और उन्हीं के कारण 72 दिनों तक बीजेपी को प्रदेश अध्यक्ष नहीं मिल पाया था। यहीं कारण है बीजेपी की जोधपुर की आंतरिक राजनीति और गुटबाजी के बावजूद गजेन्द्र सिंह शेखावत को पार्टी ने फिर से जोधपुर के समर में ही उतारा। जबकि जसवंत विश्नोई भी यहां बीजेपी टिकट के बड़े दावेदार है। राजपूत कार्ड उनकी सियासी ताकत है और कांग्रेस वोट बैंक में सेंध लगाना उनके समक्ष चुनौती। दूसरी ओर वैभव गहलोत बिलकुल नये चेहरे और किसी से कोई पुराना सियासी गिला शिकवा नहीं है। चुनौती वैभव के सामने यही है कि उनके पिता के राज्य की राजनीति मे आने और विधायक बनने के बाद से जोधपुर की लोकसभा सीट पर बीजेपी का निरंतर ग्राफ बढ़ा है। चंद्रेश कुमारी ने प्रभाव जरुर कम किया था। इतना ही नहीं उन्हें नरेन्द्र मोदी के प्रभाव का भी सामना करना पड़ेगा, जिसके कारण पिछले चुनावों में गजेन्द्र सिंह शेखावत को आसानी से जोधपुर में विजय प्राप्त हो गई थी। यह जरुर है कि जोधपुर की विजय प्राप्त करने के लिये उम्मेद भवन का रुख भी काफी अहम है। महाराजा गजसिंह का क्या सियासी संदेश होगा, इस पर भी यहां का चुनावी समीकरण टिका है। 

... राजीव गौड़ के साथ योगेश शर्मा की रिपोर्ट

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