कीर्तिमान: जापान के डॉक्टरों का कमाल, जीवित व्यक्ति के फेफड़े के हिस्से कोरोना मरीज को ट्रांसप्लांट

कीर्तिमान: जापान के डॉक्टरों का कमाल, जीवित व्यक्ति के फेफड़े के हिस्से कोरोना मरीज को ट्रांसप्लांट

टोक्यो: कहते है आवश्यकता आविष्कार की जननी है. और विज्ञान के आगे सब कुछ फेल है. विज्ञान ने आज वो मुकाम हासिल कर लिया है जिसका कोई साहनी नही है. या यू कहें की विज्ञान से इस दुनिया में कुछ भी असंभव या नामुमकिन नही है. एक बता और भी है कि वैज्ञानिक इस बात को दोहराते रहते है कि विज्ञान की डिक्सनरी में नही शब्द का कही कोई जिक्र नही है. ऐसा ही एक नामुमकिन कारनामा कर दिखाया है विज्ञान ने. जापान के डॉक्टरों ने दुनिया में पहली बार कोरोना से गंभीर रूप से पीड़ित मरीज को जीवित डोनर से फेफड़ों के टिश्यू ट्रांसप्लांट करने में सफलता हासिल की है. महिला को उसके पति और बेटे ने अपने फेफड़ों के हिस्से दिए. क्योटो यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में 11 घंटे तक चली सर्जरी के बाद डॉक्टरों का दावा है कि महिला कुछ महीनों में पूरी तरह ठीक हो जाएगी.

जीवित डोनर्स से ट्रांसप्लांट भी एक नया विकल्प है:
इस सर्जरी का नेतृत्व करने वाले डॉ. हिरोशी डेट बताते है कि इस सर्जरी के जरिए दुनिया को हमने यह बताने की कोशिश की है कि जीवित डोनर्स से ट्रांसप्लांट भी एक नया विकल्प है. कोरोना के कारण खराब हो चुके फेफड़ों वाले मरीजों के लिए यह बड़ी उम्मीद है. सर्जरी के बाद मरीज और डोनर तीनों स्थिर हैं. पति ने बाएं और बेटे ने दाएं फेफड़े के सेगमेंट्स दिए. 30 सदस्यों की टीम ने सर्जरी की.

डोनर युवा हो और मरीज 65 से कम उम्र का हो:
दो महीने बाद महिला को अस्पताल से छुट्‌टी मिल जाएगी. इसलिए दुर्लभ है यह सर्जरी: डॉ. हिरोशी के की माने तो मरीज की उम्र 65 साल से कम होनी जरूरी है. डोनर की उम्र 20-60 साल होनी चाहिए. डोनर को 13 तय मानक पूरे करना जरूरी है. इस प्रक्रिया में दो लोब प्रत्यारोपित किए जाते हैं. इसलिए डोनर और रेसिपिएंट के ऑर्गन की साइज भी मैच होनी जरूरी है.

 

सर्जरी के लिए तीन मुख्य टीम और एक बैक टेबल टीम की जरूरत:
या यू कहें कि किसी बच्चे के लिए वयस्क के लोब बड़े हो जाएंगे. बड़ी साइज के ग्राफ्ट प्रत्यारोपण के बाद सीने को दोबारा बंद करना मुश्किल हो सकता है. ऐसा होने पर एयरवे पर प्रतिरोध बढ़ने के साथ ही श्वासरोध और खून बहने में अनियमितता हो सकती है. वयस्कों को छोटे ग्राफ्ट लगा दिए जाएं तो उन्हें भी समस्या हो सकती है. सर्जरी के लिए तीन मुख्य टीम और एक बैक टेबल टीम की जरूरत होती है.

कोरोना मरीजों के लिए उम्मीद की किरण:
डॉक्टरों की टीम का नेतृत्व कर रहे डॉ. हिरोशी के अनुसार कोरोना से पीड़ित मरीज, जिनके फेफड़े खराब हो चुके हैं. उनके लिए यह आशा की किरण है. उन्होंने कहा कि हमने यह दिखा दिया कि जीवित डोनर से अंग का कुछ हिस्सा दान लेकर भी फेफड़ों को दुरुस्त किया जा सकता है.

 

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