पहाड़ी क्षेत्रों के विकास का पारिस्थितिकी सम्मत स्थानीय मॉडल बने: अनिल कुमार गुप्ता

पहाड़ी क्षेत्रों के विकास का पारिस्थितिकी सम्मत स्थानीय मॉडल बने: अनिल कुमार गुप्ता

पहाड़ी क्षेत्रों के विकास का पारिस्थितिकी सम्मत स्थानीय मॉडल बने: अनिल कुमार गुप्ता

नई दिल्ली: हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्यों में पिछले दिनों भूस्खलन, अचानक बाढ़ आने की अनेक घटनाएं सामने आई हैं जिसमें काफी जानमाल का नुकसान भी हुआ है. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि इतनी अधिक भूस्खलन, अचानक बाढ़, और पहाड़ दरकने की घटनाएं क्यों हो रही हैं ? राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान में जलवायु परिवर्तन एवं आपदा प्रबंधन विभाग के प्रमुख प्रो. अनिल कुमार गुप्ता से इस संबंध में किए गए भाषा के पांच सवाल और उनके जवाब.

सवाल: हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड जैसे पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन एवं अचानक बाढ़ आने की बढ़ती घटनाओं के क्या कारण हैं ?

जवाब : पहाड़ों पर अचानक बाढ़ आई हो, या भूस्खलन हुआ हो. ऐसी बात नहीं है . बारिश की तीव्रता में बदलाव एक बड़ा कारण होता है. पिछले कुछ साल थोड़ी कम बारिश हुई, इस बार वर्षा अधिक हुई है. लेकिन ये तात्कालिक कारण हैं. बुनियादी कारण अंदर की गड़बड़ी से जुड़़ा होता है. हमें यह समझना होगा कि पहाड़ों के लिये हमारे विकास के मॉडल में कमियां हैं जिसके कारण पर्यावरण के साथ संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. विकास की सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक आंकाक्षाएं तेजी से बढ़ रही हैं. लोगों को बड़ा घर, अधिक सुविधाएं चाहिए, इसके लिये ज्यादा जमीन लेते हैं. लेकिन हमें यह ध्यान रखना होगा कि पर्वतीय क्षेत्र इस तरह के विकास के लिये नहीं बने हैं. उत्तराखंड में पहाड़ों पर चार लेन की सड़क बनाई गई है. सुविधा प्रदान करना अच्छी बात है लेकिन इसके दुष्प्रभावों को भी ध्यान में रखना होगा. सड़कों के लिये पहाड़ों पर मिट्टी काटने से ऊपर और नीचे दोनों क्षेत्रों में पहाड़ कमजोर हो जाते हैं. इसका प्रभाव अचानक नहीं दिखता बल्कि प्रक्रिया चलती रहती है और कुछ सालों में भूस्खलन के रूप में सामने आती है.

सवाल: भूस्खलन के पर्यावरण प्रभाव क्या हैं और पर्वतीय इलाकों में विकास का कैसा मॉडल होना चाहिए ? 
जवाब: हिमाचल, उत्तराखंड सहित पर्वतीय क्षेत्रों के विकास का मॉडल अलग होना चाहिए. पिछले 20-25 वर्षो में इसमें बिगाड़ आया है. इन पहाड़ी इलाकों में पेड़ों की कटाई तो हुई ही हैं लेकिन नए पेड़ नहीं उगे. प्राकृतिक रूप से भी दोबारा पेड़ नहीं उगे हैं. इसका कारण यह है कि एक तो लोगों ने जमीन खाली नहीं छोड़ी है और दूसरा बारिश के पानी के तेज बहाव में उर्वर भूमि की परत बह गई. ऐसे में नये पेड़ कहां पैदा होंगे ? घास, झाड़ियां, पौधे और पेड़ पत्थरों को बांध कर रखते हैं लेकिन पहाड़ों के बंजर होने एवं उन पर वनस्तियों की कमी से पत्थर ढीले पड़ गए, ढ़लान पर पानी के बहाव में ये चट्टान एवं पत्थर खिसक जाते हैं. भूस्खलन का असली कारण चट्टान एवं पत्थरों पर मिट्टी एवं वनस्पतियों की पकड़ कमजोर होना है. पहाड़ों को लेकर हमारे विकास का मॉडल पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी सम्मत होना चाहिए. हर क्षेत्र का स्थानीय मॉडल तैयार करने की जरूरत है . ऐसा संभव है कि उना का विकास मॉडल कुल्लू में लागू नहीं हो.

सवाल: भूस्खलन जैसी घटनाओं से निपटने के लिये वर्तमान रणनीतियों में क्या कमियां हैं?

जवाब: जलवायु परिवर्तन पर छठी मूल्यांकन रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर हमने पर्यावरण, पारिस्थितकी से जुड़े विषयों पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया तब आने वाले 20-25 वर्षो में हालात काफी खराब हो जायेंगे. बाढ़ या भूस्खलन जैसी घटनाओं में जानमाल के नुकसान होने के कारणों में एक प्रमुख बात यह सामने आई है कि स्थानीय स्तर पर आपात तैयारी में कमी रही. वर्ष 2013 में उत्तराखंड की घटना में भी यह एक प्रमुख कमी के रूप में सामने आया था. स्थानीय स्तर पर अगर तैयारी दुरूस्त हो तब प्रतिक्रिया तेज होगी. योजनाएं अच्छी बनती हैं लेकिन कई बार बहुत सारी चीजें कागजों पर ही रह जाती है और उन पर अमल नहीं हो पाता है.

सवाल : आपदा के लिहाज से भूस्खलन जैसी घटनाओं से निपटने के लिये कैसी रणनीति की जरूरत है? 
जवाब: हमें इस बात पर ध्यान देना होगा कि भूस्खलन की संभावना वाले क्षेत्रों में क्या बदलाव आ रहे हैं. इन क्षेत्रों की नियमित रूप से निगरानी एवं सर्वेक्षण करने की जरूरत है ताकि पहले से ही तैयारी की जा सके. स्थानीय स्तर पर व्यवस्था को मजबूत बनाना होगा. पर्वतीय इलाकों के लिये विकास के मॉडल को पर्यावरण सुरक्षा के साथ लोगों को आजीविका की वैकल्पिक सुविधा के साथ जोड़ना होगा. इन प्रयासों में जनभागीदारी जरूरी है. जिला, तालुका एवं ग्राम स्तर पर आपदा का मानचित्र तैयार करना होगा क्योंकि प्रकृति ने समस्या दी है तब समाधान भी वहीं है. पर्वतीय इलाकों के लिये लोगों को आवास का मॉडल भी देना होगा.

जिल क्षेत्रों में पिछले 5-10 वर्षो में भूस्खलन की घटनाएं अधिक हुई हैं, वहां आपदा प्रबंधन के लिये एक नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाए. इसमें विश्वविद्यालयों, कालेजों, नेहरू युवा केंद्र की भी मदद ली जा सकती है. यह प्रयास सरकार बनाम समुदाय होने की बजाए सरकार प्लस समुदाय होना चाहिए.

सवाल: भूस्खलन एवं पहाड़ों पर मिट्टी धंसने जैसी घटनाओं को लेकर क्या वर्तमान नीति पर्याप्त है, इसमें क्या सुधार करने की जरूरत है? 
जवाब: नीति के स्तर पर कोई कमी नहीं है. अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय एवं राज्यों के स्तर पर अच्छी नीति बनी है . लेकिन हमें इन्हें लागू करने के विषय पर ध्यान देने की जरूरत है. ऐसा इसलिये क्योंकि अलग अलग जगहों की जरूरतें अलग हैं, उन स्थानों पर नीतियों पर अमल के दौरान उतार चढ़ाव आते हैं लेकिन आपदाएं समान रूप से नुकसान पहुंचाती हैं.

राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने भी जिला स्तर पर पर्यावरण कार्य योजना तैयार करने का आदेश दिया है . यह कार्य योजना उन जिलों के जोखिम को ध्यान में रखते हुए एवं जनभागीदारी के साथ तैयार की जाए. (भाषा) 

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