जयपुर VIDEO: नगर नियोजन सेवा के अव्यावहारिक नियमों में बदलाव की बड़ी तैयारी, बैचलर इन प्लान डिग्री वाले अभ्यर्थियों को मिलेगी बड़ी राहत

VIDEO: नगर नियोजन सेवा के अव्यावहारिक नियमों में बदलाव की बड़ी तैयारी, बैचलर इन प्लान डिग्री वाले अभ्यर्थियों को मिलेगी बड़ी राहत

जयपुर: आपको शायद जानकर हैरानी होगी कि पूरे देश में राजस्थान एकमात्र ऐसा राज्य है जहां नगर नियोजक के पद के लिए नगर नियोजन पढ़ने वाले अभ्यर्थी ही पात्र नहीं हैं.  लेकिन अब प्रदेश की अशोक गहलोत सरकार सालों से लागू अव्यावहारिक नियमों में बदलाव कर देशभर में सैकड़ों की तादाद में बैचलर इन प्लान डिग्री वाले अभ्यर्थियों को राहत देने वाली है. 

प्रदेश के प्राधिकरण और नगर सुधार न्यासों में सहायक नगर नियोजकों के पद पर भर्ती की जाती रही है. नगर नियोजन विभाग के मौजूदा अव्यावहारिक नियमों के चलते इस पद के लिए बैचलर इन प्लान (नगर नियोजन में स्नातक) डिग्री लेने वाले अभ्यर्थी योग्य नहीं है. बल्कि बैचलर इन आर्किटैक्चर डिग्री लेने वाले अभ्यर्थियों को पात्र माना जाता है. ऐसे में सवाल उठता है कि जिस पद पर नगर नियोजन का काम करना है उस पद पर उसमें डिग्री वाले अभ्यर्थी आखिर क्यों उस पद के लिए योग्य नहीं हैं. आपको विस्तार से बताते हैं कि इस तरह के नियमों की पहले क्यों बनाए गए और बाद में किस तरह परिस्थितियां बदली है, उसके बावजूद यही नियम लागू होने के कारण योग्य युवाओं को सरकारी नौकरी के लिए भटकना पड़ रहा है. 

-देश की आजादी के बाद लम्बे समय तक बैचलर इन प्लान का पाठ्यक्रम कोई शिक्षण संस्थान संचालित नहीं करता था

-ऐसे में निकायों में नगर नियोजक के पदों की भर्ती के लिए बैचलर इन आर्किटेक्चर डिग्री की अनिवार्यता रखी गई

-साथ में यह भी जरूरी किया गया कि चयनित अभ्यर्थियों को टाउन प्लानिंग को दो साल का कोर्स करना पड़ेगा

-आईआईटी खड़गपुर और दिल्ली का स्कूल ऑफ प्लानिंग ये काेर्स कराते थे

-बाद में भर्ती में टाउन प्लानिंग का कोर्स करने की अनिवार्यता स्वत: ही समाप्त कर दी गई

-वर्ष 1996 से तीन महाविद्यालयों में बैचलर इन प्लान का पाठ्यक्रम शुरू किया गया

-आज देशभर के 1 दर्जन से अधिक नामचीन शिक्षण संस्थानों में बैचलर इन प्लान का पाठ्यक्रम संचालित किया जा रहा है

-इन संस्थानों से डिग्री लेने वाले युवा व्यावहारिक तौर पर योग्य होने के बावजूद निकायों में नौकरी से वंचित है

बैचलर इन प्लान की डिग्री लेने वाले युवाओं की उपलब्धता होने के चलते देश के कई राज्यों ने काफी पहले अपने नियम बदल दिए हैं. लेकिन राजस्थान इकलौता ऐसा राज्य है जो नियमों की विसंगति को अब तक झेल रहा था. लेकिन अब प्रदेश की अशोक गहलोत सरकार ने नियमों की इस विसंगति को दूर करने का फैसला किया है. आपको बताते हैं कि इसको लेकर सरकार की क्या तैयारी है और आखिर क्यों जरूरी है इसे खत्म करना

-भविष्य की आवश्यकता के अनुसार शहर का मास्टरप्लान बनाना और उसमें लैंड यूज तय करने के लिए नगर नियोजन का तकनीकी ज्ञान आवश्यक है

-शहरों की बढ़ते विस्तार को संतुलित और नियोजित करने के लिए भी योग्य नगर नियोजकों की जरूरत है

-स्मार्ट सिटी और अमृत जैसी केन्द्र सरकार की योजनाओं के क्रियान्वयन में नगर नियोजन की बड़ी भूमिका है

-केन्द्र सरकार ने भी राज्यों को कहा था कि सहायक नियोजक पद के लिए बैचलर इन प्लान और अनुभव अथवा मास्टर इन प्लान की योग्यता तय की जाए

-नगर नियोजन की मानक संस्था इंस्टीट्यूट ऑफ टाउन प्लानर्स इंडिया,नई दिल्ली भी इसके लिए राज्य सरकार को समय-समय पर पत्र लिखती रही है

-मौजूदा भर्ती नियमों में बदलाव के नगरीय विकास विभाग के प्रस्ताव को राज्य के कार्मिक विभाग,वित्त विभाग और राजस्थान लोक सेवा आयोग से मंजूरी मिल चुकी है

-कैबिनेट स्तर पर मामले में फैसला कराने के लिए कैबिनेट मीमो भी विभाग ने तैयार कर लिया है

-प्रस्तावित बदलाव के अनुसार भविष्य में सहायक नगर नियोजक पद के लिए बैचलर इन प्लान या बैचलर इन आर्किटेक्ट डिग्रीधारी जिन्हें दो वर्ष का अनुभव हो,वे पात्र होंगे

-इसी तरह मास्टर इन प्लान डिग्रीधारी भी सहायक नगर नियोजक पद के लिए पात्र होंगे

-सहायक नगर नियोजक से निम्न गैर राजपत्रित पदों  के लिए साक्षात्कार की अनिवार्यता भी खत्म होगी

संभवत: कैबिनेट की आगामी बैठक में नियमों में बदलाव को मंजूरी मिल जाएगी. ऐसा होने से वाकई जहां योग्य युवाओं को मौका मिलेगा वहीं यह कहावत भी चरितार्थ हो सकेगी जो प्रदेश के लिए कहती है "जहां नगर नियोजन एक परम्परा है"
 

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