Campus War : छात्र राजनीति में पाया मुकाम, लेकिन मूल राजनीति में मिली मायूसी

FirstIndia Correspondent Published Date 2019/08/20 06:05

जैसलमेर: कहते हैं कि सक्रिय राजनीति की राह छात्र जीवन से आरम्भ हो जाती है. छात्र जीवन में लीडरशिप के गुणों को डवलप करने के लिये कॉलेज चुनाव एक महत्वपूर्ण जरिया माना जाता है, जिसमें तप कर भविष्य के नेता तैयार होते हैं. देश व प्रदेश की राजनीति में ऐसे कई उदाहरण होंगे जो अपने छात्र जीवन में अपनी कॉलेज या विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनावों में सक्रिय हुए और उसके बाद से प्रदेश व देश की राजनीति के चमकते सितारे भी बने, लेकिन बात करें अगर सरहदी जिले जैसलमेर की तो यहां ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. 

छात्रसंघ चुनाव के पौधे नहीं बन सके भविष्य के पेड़:
छात्र राजनीति के पौधे यहां के रेगिस्तान में उतना नहीं पनप पाये, जितना उनका आगे बढ़ना चाहिये था. ऐसे में छात्र राजनीति में एक अच्छा मुकाम पा लेने के बाद भी भविष्य के इन नेताओं को मायूसी ही हाथ लगी. चूंकि छोटा जिला होने के कारण और राजनीति में अधिक स्कोप नहीं होने के चलते छात्र जीवन में अच्छे नेता रहे कई युवा अब सक्रिय राजनीति से दूर ही दिखाई दे रहे हैं. 

महीने के आखिर में चुनाव:
प्रतिवर्ष होने वाले महाविद्यालयी छात्रसंघ चुनाव की कड़ी में इस बार भी महीने के आखिर में चुनाव होने वाले हैं. इसमें जोर.आजमाइश करने के लिए कई छात्र-छात्राएं कमर भी कस चुके हैं, लेकिन सीमावर्ती जिले में कोई ढाई दशक से लगातार हो रहे इन चुनावों में भाग लेने वालों का मूल राजनीति में सितारा उतना नहीं चमक पाया है, जैसा विश्वविद्यालयों में देखने में आता है. जिले में प्रतिवर्ष निर्वाचित होने वाले छात्र नेताओं में से कुछ को ही आगे चलकर ज्यादा से ज्यादा राजनीतिक पार्टियों में काम करने का ही अवसर मिला है और उनमें से कुछेक संगठनों में पदाधिकारी ही बन सके हैं. छात्र राजनीति का कोई नाम विधायक, जिला प्रमुख और नगरपरिषद सभापति तो दूर पंचायत समिति प्रधान तक भी नहीं बन सका. अधिकांश तो सार्वजनिक जीवन में कहीं नजर ही नहीं आते. 

छात्रसंघ चुनाव चार दिन की चांदनी:
छात्रसंघ चुनाव कम से कम जैसलमेर के संदर्भ में तो चार दिन की चांदनी ही साबित होते रहे हैं. चुनाव से कुछ दिन पहले और उसके कुछ दिन बाद तक इसकी चर्चा होती है. दो प्रमुख छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और एनएसयूआई के उम्मीदवारों की सूची पर भी दिलचस्पी रहती है. चुनाव परिणाम आने पर विजयी जुलूस और कुछ दिन तक महाविद्यालयों में सरगर्मियों के बाद जीते हुए पदाधिकारी भी लगभग निष्क्रिय होकर रह जाते हैं. अगले साल नए पदाधिकारी निर्वाचित होते हैं और यह सिलसिला ही लगातार चल रहा है. यह और बात है कि कुछ दिनों की सरगर्मियों का हिस्सा बनने के लिए भी कई छात्र पूरे मनोयोग से प्रयास करते हैं. 

आगे बढ़े कुछ ही चेहरे:
जैसलमेर में छात्र राजनीति के रास्ते सार्वजनिक जीवन में सफलता के कुछ सोपान तय करने वालों में कुछ ही नाम याद आते हैं. इनमें शुरुआती समय में एसबीके कॉलेज छात्रसंघ के अध्यक्ष बने शरद व्यास वर्तमान में सीमाजन कल्याण समिति में जिलामंत्री हैं. ऐसे ही 2011 में उपाध्यक्ष पद पर निर्वाचित हुए जयंत व्यास, जो पिछले लम्बे समय से छात्र राजनीति में सक्रिय हैं और भाजपा के युवा मोर्चा में भी अपनी महत्ती भूमिका निभा रहे हैं. वहीं छात्र जीवन में कभी चुनाव न लडऩे वाले लालूसिंह सोढ़ा प्रतिवर्ष सक्रिय दिखते हैं और बजरंग दल के विभाग संयोजक बने हुए हैं. 

सक्रिय राजनीति में नहीं कोई सरोकार:
2003 में अध्यक्ष बने महेश पुरोहित ने कुछ अर्से तक अभाविप और भाजयुमो में काम किया. 2004 में अध्यक्ष निर्वाचित मनोहरसिंह दामोदरा वर्तमान में भाजयुमो के जिलाध्यक्ष हैं. साल 2010 से निर्वाचित अध्यक्षों में जालमसिंह मनोहरसिंह भादरिया, नरेंद्रसिंह सोढ़ा, पुश्पेंद्रसिंह, श्रवणसिंह सोढ़ा, गोपसिंह सिंहड़ार, ललित गर्ग, दुर्जनसिंह क्रम से 2018 तक अध्यक्ष बने. इनमें से ज्यादातर अब कॉलेज चुनावों में भी सक्रिय नहीं दिखते और न ही इनका सक्रिय राजनीति में कोई सरोकार नजर आता है. 

... जैसलमेर से सुर्यवीर सिंह तंवर की रिपोर्ट 
                      

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