नाबार्ड कर रहा किसानों के साथ छलावा ! अभी तक जारी नहीं की सहकारी साख नीति

Nirmal Tiwari Published Date 2019/04/16 04:25

जयपुर। कर्ज माफी और ब्याज मुक्त ऋण के वितरण से लोकसभा चुनाव में पॉलीटिकल माइलेज लेने के प्रदेश की कांग्रेस सरकार के मंसूबों पर पानी फिर गया है। नाबार्ड ने सहकारी साख नीति जारी नहीं की है ऐसे में केंद्रीय सहकारी बैंकों के पास न तो कर्ज माफी और न ही ब्याज मुक्त फसली ऋण देने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन बचे हैं। ऐसे में नाराज किसान चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। 

- नाबार्ड कर रहा किसानों के साथ छलावा..!
- अभी तक जारी नहीं की सहकारी साख नीति
- वर्ष 2019-20  के लिए जारी करनी थी साख नीति
- ऐसे में सहकारी बैंकों को नहीं मिलेगी पुनर्वित्त सुविधा
- नाबार्ड से मिलता है 40 फीसदी पुनर्वित्त
- करीब 4 हजार करोड़ रुपए होती है पुनर्वित्त राशि
- इस राशि से ही सहकारी बैंक देते हैं फसली ऋण
- अब सहकारी बैंकों को खुदके संसांधन करने हैं इस्तेमाल
- किसानों को नहीं मिल रहा कर्ज माफी और ऋण वितरण का लाभ

राज्य में गहलोत सरकार के गठन में सबसे अहम भूमिका रही थी। राहुल गांधी के उस वादे की जिसमें उन्होंने सत्ता में आते ही किसानों का संपूर्ण कर्ज माफ करने का वादा किया था। इस वादे का असर ये रहा कि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी और गहलोत सरकार ने भी सत्ता में आते ही कर्ज माफी की घोषणा कर दी और बिना आर्थिक संसाधन जुटाए ही कर्जमाफी शिविर लगा प्रमाण पत्रों का वितरण भी कर दिया। 18000 करोड़ की कर्ज माफी होनी थे लेकिन वित्तीय संसाधनों की कमी के चलते करीब 7000 करोड़ की है अभी तक कर्ज माफी हो पाई है। लोकसभा चुनाव की आचार संहिता लगने से पहले सरकार ने अन्य विभागों के वित्त पोषण को रोकते हुए खर्चों में कटौती कर कर्ज माफी योजना के वित्तपोषण के भरसक प्रयास भी किया। 

बहरहाल किसान अभी सरकार की मंशा को समझ पाते और सरकार के पक्ष में अपना मानस बनाते इससे पहले ही देश में लोकसभा चुनाव का बिगुल बज गया। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले यानी 1 अप्रैल से प्रदेश के किसानों को ब्याज मुक्त फसली ऋण के वितरण का कार्यक्रम शुरू किया गया। राज्य सरकार के मंशा थी कि 10 हजार करोड रुपए का किसानों को ब्याज मुक्त फसली ऋण दिया जाएगा और 10 लाख नए किसानों को इस योजना से जोड़ा जाएगा, लेकिन सरकार की मंशा पर पानी फेर दिया नाबार्ड ने। नाबार्ड को वर्ष 2019-20 के लिए सहकारी साख नीति की घोषणा फरवरी-मार्च में ही करनी थी, लेकिन नाबार्ड ने नीति की घोषणा नहीं की। 

नाबार्ड के इस खेल से राज्य सरकार की मंशा के मंसूबों पर पानी फिर गया। दरअसल नाबार्ड ब्याज मुक्त फसली ऋण के लिए प्रदेश की सहकारी बैंकों को 45 फ़ीसदी पुनर्वित्त की सुविधा देता है। इसका सीधा मतलब है की 10 हजार करोड़ के ब्याज मुक्त फसली ऋण के लिए सहकारी बैंकों को नाबार्ड से साढे चार हजार करोड़ रुपए मिलने थे जो अब नहीं मिलेंगे। किसानों को इंतजार था कि उन्हें 1 अप्रैल से अल्पकालीन ब्याज मुक्त फसली ऋण की राशि मिलने लग जाएगी लेकिन यह राशि अभी किसानों तक नहीं पहुंची है जबकि चुनाव बहुत करीब आ गए हैं। अल्पकालीन फसली ऋण के लिए केंद्रीय सहकारी बैंक अभी तक तक 10 हजार करोड़ रुपए का इंतजाम नहीं कर पाई हैं। कर्ज माफी के चलते वर्ष 2018-19 में दिए गए 8 हजार करोड़ रुपए की रिकवरी नहीं हुई। यह राशि कर्ज माफी योजना में माफ कर दी गई है। कर्ज माफी की जो राशि सरकार को केंद्रीय सहकारी बैंकों को देनी थी वह भी अभी नहीं दी गई है। पिछले दो वर्ष में सहकारी बैंकों का डिपोजिट भी घटा है। ऐसे में अगले वित्त वर्ष के लिए फसली ऋध राशि का जुगाड़ सहकारिता विभाग कहां से करेगा यह किसी यक्ष प्रश्न से कम नहीं। 

अब जरा फसली ऋण वितरण के रजिस्ट्रार नीरज के पवन के आदेश की भाषा देखें तो सबकुछ गोलमाल नजर आता है। रजिस्ट्रार ने पत्र में लिखा है कि सभी बैंकों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे उपलब्ध वित्तीय संसाधनों का विवेकपूर्ण इस्तेमाल करेंगे। इसके लिए बाकायदा सात बिंदुओं का एक परिपत्र भी जारी किया गया है। बहरहाल सरकार की मंशा जो भी हो लेकिन यह जरूर है कि फसली ऋण के लिए 10 हजार करोड़ रुपए का इंतजाम कहां से होगा इसे लेकर संदेह है। सहकारी बैंक इतनी राशि देकर रिजर्व बैंक के सीआरएआर के नॉर्म्स में भी पिछड़ने की आशंका है। चुनाव में भी इसका सीधा असर देखा जा सकता है।
 

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