नई दिल्ली उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू बोले- बाल कुपोषण और लैंगिक असमानता भारत की प्रगति में बाधक हैं

उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू बोले- बाल कुपोषण और लैंगिक असमानता भारत की प्रगति में बाधक हैं

उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू बोले- बाल कुपोषण और लैंगिक असमानता भारत की प्रगति में बाधक हैं

नई दिल्ली: उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने बुधवार को कहा कि बाल कुपोषण, लैंगिक असमानता, स्वच्छ पानी तक एकसमान पहुंच न होना और पर्यावरण प्रदूषण कुछ ऐसे कारक हैं जो भारत की प्रगति में बाधक हैं. उन्होंने कहा कि सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) संबंधी एजेंडा 2030 को प्राप्त करने के लिए देश को काफी प्रयास करने की आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि पृथ्वी ग्रह को बचाने के लिए सभी देशों को सामूहिक प्रयास करना चाहिए और उन्होंने ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की प्रासंगिकता को याद दिलाया.

उन्होंने यह भी चिंता व्यक्त की कि भारत 2021 में सतत विकास लक्ष्य सूचकांक में 120 वें स्थान पर था जिसमें फिनलैंड, स्वीडन और डेनमार्क जैसे देश सूची में सबसे ऊपर हैं. उन्होंने कहा कि यह ऐसा मामला है जिसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए. उपराष्ट्रपति ने यह टिप्पणी यहां ‘एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज’ की वार्षिक बैठक का ऑनलाइन माध्यम से उद्घाटन करने के मौके पर की. उन्होंने कहा कि हमें इस तथ्य को याद रखना चाहिए कि ग्रह को बचाना सभी देशों का सामूहिक प्रयास होना चाहिए. हम इस संदर्भ में ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ सूत्र वाक्य की प्रासंगिकता को नजरअंदाज नहीं कर सकते. उन्होंने कहा कि दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला भारत उन महत्वपूर्ण देशों में से एक है जहां अगले दशक में 2030 एजेंडे को साकार करने के लिए एसडीजी की उपलब्धि आवश्यक होगी. उपराष्ट्रपति ने विभिन्न सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने में गरीबी तथा निरक्षरता जैसी चुनौतियों से निपटने की आवश्यकता पर बल देते हुए शैक्षिक संस्थाओं सहित सभी हितधारकों से संयुक्त प्रयास करने को कहा.

उन्होंने कहा कि एसडीजी हासिल करना किसी विशेष संगठन, मंत्रालय या सरकार की जिम्मेदारी नहीं है. उन्होंने कहा कि इसके लिए नागरिक समाज, उद्योगों, गैर सरकारी संगठनों और सबसे महत्वपूर्ण शैक्षणिक संस्थानों सहित सभी हितधारकों को ठोस प्रयास करने की जरूरत है. नायडू ने कहा कि इस संबंध में कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को एक बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है. वे 21वीं सदी की चुनौतियों के लिए छात्रों को तैयार करने के अलावा, जागरूकता पैदा करने और सतत विकास रणनीतियों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए अनुसंधान, नीति विकास और समाज के साथ जुड़ाव जैसे कई तरीकों से योगदान दे सकते हैं. नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को दूरदर्शी दस्तावेज बताते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि सच्ची भावना के साथ इसे लागू करने से सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद मिलेगी. सोर्स- भाषा

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