टीवी डिबेट मे जज के खिलाफ टिप्पणी करना अदालत की अवमानना नहीं- हाईकोर्ट

टीवी डिबेट मे जज के खिलाफ टिप्पणी करना अदालत की अवमानना नहीं- हाईकोर्ट

टीवी डिबेट मे जज के खिलाफ टिप्पणी करना अदालत की अवमानना नहीं- हाईकोर्ट

जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने अदालत की अवमानना से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला देते हुए कहा है कि टीवी डीबेट के दौरान हाईकोर्ट जज के खिलाफ कि गयी टिप्पणी को अदालत की अवमानना नहीं है. फ्रीडम आफ स्पीच का हवाला देते हुए जस्टिस गोवर्धन बारधार और जस्टिस सी के सोनगरा की खण्डपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के रामलील मैदान केस में दिये फैसले का जिक्र किया. खण्डपीठ ने कहा संविधान निर्माताओं ने सभी को अपनी बात कहने और पक्ष रखने का अधिकार दिया है. इसके साथ ही अदालत ने प्रेम शुक्ला को अवमानना से बड़ी राहत देते हुए याचिका को खारिज करने के आदेश दिये है.

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खण्डपीठ ने अपने फैसले में कहा कि खण्डपीठ ने कहा कि सोचने की स्वतंत्रता, विचार व्यक्त करने की आजादी, किसी के प्रति अपनी आस्था रखने की पूर्ण आजादी. देश के नागरिको को कई महत्सपूर्ण अधिकार प्राप्त है जो किसी भी लोकतंत्र की बड़ी संपंति है. खण्डपीठ ने भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रेम शुक्ला के खिलाफ दायर कि गयी अवमानना याचिका को खारिज करते हुए ये बात कही है. खण्डपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि प्रेम शुक्ला का दिया गया बयान न्यायिक प्रक्रिया में जानबूझकर हस्तक्षेप नहीं है. 

कोर्ट ने कहा कोस्ट लगायेगे.....वकिल ने कहा 5 लाख लगा दीजिये...
केस पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए याचिका पर सवाल खड़े किये. खण्डपीठ ने कहा कि क्यो नही आपकी याचिका को कोस्ट लगाने के साथ खारिज कि जाये. जिस पर याचिकाकर्ता एडवोकेट पूनमचंद भण्डारी ने कहा कि वो 5 लाख तक की कोस्ट देने को तैयार है. 

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क्या है मामला:
2 मार्च को न्यूज 24 टीवी चैनल पर रात सात बजे प्रसारित होने वाले " सबसे बड़ा सवाल" कार्यक्रम में प्रेम शुक्ला भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता के रुप में मौजुद थे. डीबेट के दौरान ही प्रेम शुक्ला ने रोस्टर को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट के तत्कालीन जज एस मुरलीधर पर संगीन आरोप लगाए हुए विवादित बाते बोली. उन्होंने कहा कि" मुरलीधर ने एक असंवैधानिक कृत्य किया उनके अधिकार क्षेत्र के बाहर का काम किया और षडयंत्र के तहत किया। मै एक्सप्लेन कर सकता हूं पांच मिनट में उन्होंने अपनी कंसेंट पर साइन कर दिया था.12 फरवरी को उन्होंने ट्रांसफर संवी कर लिया है उसके बाद पीआईएल चीफ जस्टिस और मास्टर रोस्टर नहीं थे उन्होंने कंसेंट दिया था. पंजाब एण्ड हरियाणा हाईकोर्ट वो पीआईएल सुन नहीं सकते वो मास्टर एफ रोस्टर नहीं हैं he was not master of roster वो मास्टर ओफ रोस्टर थे क्या. फिर मास्टर ओफ रोस्टर कौन होगा उन्होंने बिलकुल गलत किया. असंवैधानिक कृत्य किया है कोलिजियम की... हां और जिम्मेदारी से कह रहा हूं". जिस पर एडवोकेट पूनमचंद भण्डारी ने राज्य के महाधिक्ता को प्रार्थना पत्र पेश कर अपराधिक अवमानना याचिका दायर कर अनुमति मांगी. महाधिवक्ता द्वारा अनुमति नही देने पर राजस्थान हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर की गयी. 

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